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Friday, 1 April 2016

તારા વગર........ * * * * કહેતા તો કહી દીધું તમે કે, જીવી લેશો મારા વગર

તારા વગર........
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કહેતા તો કહી દીધું તમે કે, જીવી લેશો મારા વગર...
પણ અમે તો રહેતા જીવ કેમ જીવાશે મારા વગર...
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નથી સાચવી શકતા, પોતાની જાતને એક પળ માટે...
તો કેમ સાચવશો ખુદને, આખી જીંદગી મારા વગર...
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હું જાણું છું કે, નથી અટકતી જીંદગી કોઈના વગર
પણ શું ચાલશે, તારી જીંદગી મારા વગર...
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શું કહેવું જરૂરી હતું હું પ્રેમ કરું છું તમને
કેમ તમે ના સમજી શકો, કંઈ કહ્યાં વગર...
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લખેલા શબ્દો તો કોઈ પણ વાંચી સંભળાવશે...
પણ તું જ કહે કોણ લખશે કવિતા મારા વગર...
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હું રાહ જોઈ રહી સમયની, કે જેમાં તમે આવીને કહો...
કે હવે નહીં જીવી શકું , હું તારા વગર....

ગઝલ : ઊગવાનું છે : ‘પ્રેમ’યાદ છે? તારે શું થવાનું છે?

ગઝલ : ઊગવાનું છે :
‘પ્રેમ’યાદ છે?

તારે શું થવાનું છે?

ભીંત તોડી ને ઊગવાનું છે.

ફ્ક્ત આંખો સુધી જવાનું છે?

કે પછી એમાં ડૂબવાનું છે?

પાને પાને છે ઝેર
પુસ્તકમાં,પાને પાનું આ
ચૂમવાનું છે.

જે છે એનું કશું જ મૂલ્ય નથી!
જે નથી એનું ઝૂરવાનું છે.

સ્હેજ આંખો હજી તું ખોલ

‘જિગર’!
આંસુને પાછું મૂકવાનું છે.

ના પૂછો મને ગમવાનું કોઈ કારણ..!! ફૂલો પણ ગમે છે મને બસ અકારણ..!!

ના પૂછો મને ગમવાનું કોઈ કારણ..!!
ફૂલો પણ ગમે છે મને બસ અકારણ..!!

નથી કોઈ છલ કે કપટ અમારે મન,
નિર્દોષ હસ્યનું ચેહરા પર છે તમારે આવરણ..!!

નિર્દોષ લાગનીયો રોજ શિકાર થાય છે અહી,
આ દિલમાં બનાવવાની જરૂર છે એક અભ્યારણ..!!

તમને હું પાગલ બનાવું એવો તો નથી ઈરાદો,
તમે સમજી બેઠા કે હું બનાવું છું એવું વાતાવરણ..!!

લાગનીયોના સહેરમાં છું હું બહુ ધનવાન,
પ્રેમના માફિયા આવીને કરી જાય છે અપહરણ..!!

મૃગજળની માયા છોડીને જળ સુધી જવું છે,

મૃગજળની માયા છોડીને જળ સુધી જવું છે,

અમને જે છેતરે છે – એ છળ સુધી જવું છે.

તૈયાર થા તું એ દિલ !
અઘરી છે આ કસોટી,

સાગર સમેટી લઇને ,
ઝાકળ સુધી જવું છે.

સદીઓના આ વજનને,
ફેંકીને કાંધ પરથી,
જે હાથમાં છે મારા,
એ પળ સુધી જવું છે.

તારો જ સ્પર્શ એમાં અકબંધ છે હજુ પણ,

મારે એ બંધ ઘરની સાંકળ સુધી જવું છે.

– ‘કાયમ’ હઝારી

Thursday, 31 March 2016

गाय के शरीर में जीना, मतलब चेतना का पशु से मनुष्य बनने के लिए स्वयं को विकसित करना।

गाय के शरीर में जीना, मतलब चेतना का पशु से मनुष्य बनने के लिए स्वयं को विकसित करना।

    

चेतना जब गाय की योनि में प्रवेश करती है, तभी से गाय की खूब सेवा की जाती है, ठीक उसी तरह, जिस तरह बेटी के गर्भवती होने पर उसकी की जाती है। हमारे धर्म में गाय को एक पशु नहीं बल्कि परिवार का एक सदस्य माना गया है। उस चेतना का स्वागत किया जाता है कि आज वह इस तल पर आ पहुंची है कि जहां से वह पशु योनि से मुक्त हो मनुष्य योनि में प्रवेश कर सके!
     

गाय के बछड़ा जनने पर इतनी खुशी हुई कि आदमी सुध-बुध खोकर, बछड़े को कंधे पर लेकर भागा गांव में डोंडी पीटते हुए कि "म्हारी गंगा ब्याणी... म्हारी गंगा ब्याणी...।" मारे खुशी के उसे होश ही नहीं रहता  है, कि इस उत्साह में भागने पर कब उसकी धोती खुलकर गीर गई है, सारा गांव हंस रहा है, और अब वह नग्न खड़ा है!

उसे होश में लाया जाता है... अचानक वह 'अवा्क' और 'किंकर्तव्यविमूढ़' खड़ा रह जाता है। "अवा्क और किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह जाना" यह स्थिति है "ध्यान" की... जहां सब ठहर जाता है। कोई विचार नहीं होता!
    

बछड़े के आने पर बेटी बहुत खुश होती। उसे तो मानो खिलोना मिल गया हो! दोनों बहनों की तरह साथ बड़ी होती। दोनों एक -दूसरे से खूब घुलमिल जाती और जब बेटी का विवाह करते, तो उसके साथ ही गाय का भी विवाह कर देते और दान के रूप में उसी के साथ भेज दिया जाता ताकि आगे भी उनका यह प्रेम सदा बना रहे और बेटी का उससे लगाव होने के कारण वह उसका आजन्म खयाल रख सके?
    

इस तरह बेटी को भी विवाह के लिए राजी कर लिया जाता, कि तेरा विवाह ही नहीं कर रहे, तेरे साथ तेरी गाय का विवाह भी कर रहे हैं! इससे बेटी को एक भरोसा रहता है, कि ससुराल में वह अकेली नहीं है, पीहर का कोई न कोई साथ है! और गाय को यह स्मरण दिलवाने को, कि 'अगले जन्म में तू भी बेटी बनके आ, हम फिर तेरा भी कन्यादान करेंगे! ' इस तरह से उस चेतना को पशु से मनुष्य की ओर विकसित होने में मदद की जाती।
    

लेकिन यह मदद अंत तक बनी रहनी चाहिए, तभी उसका जीवन सार्थक है। पशु - चेतना का, मनुष्य- चेतना में विकास तभी संभव है जब चेतना को गाय के शरीर में 'पूरी तरह' से विकसित होने दिया जाये। यानी उसके जीवन को कोई बाधा न पहुंचाई जाये, वह 'पूरी' उम्र जीये। अर्थात उसका वध, उसकी हत्या न होने पाये। वह अपनी मौत मरे। हम उसके जीवन को उसे सहज जीने दें! हम उसके जीवन के निर्धारक न बनें! उसके बूढा होने पर उसकी ठीक वैसी ही देखभाल करें जैसी अपने परिवार के बूढ़े व्यक्ति की करते हैं। गाय चेतना के पशु -योनि का परम विकास है। यहां आकर गाय का शरीर इतना पवित्र हो जाता है, कि उसकी पूजा करनी शुरू कर दी जाती है। उसका दूध और मल-मूत्र भी उपयोगी साबित होता है।
    

हमें गो-सेवा करके चेतना को गाय के शरीर में पूरी तरह से विकसित होने में मदद करनी है। और यह तभी संभव है जब वह अपनी स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त हो सके। यदि समय से पहले उसकी मृत्यु (हत्या) होती है तो उसकी चेतना मनुष्य शरीर लेने के लिए विकसित नहीं हो पायेगी। गाय के शरीर में जीना, मतलब चेतना का पशु से मनुष्य में विकसित होना।

-स्वामी ध्यान उत्सव

साक्षी साधना      ध्यान का अंतरतम और सार तत्व है यह सीखना कि कैसे साक्षी हों।     

साक्षी साधना

     ध्यान का अंतरतम और सार तत्व है यह सीखना कि कैसे साक्षी हों।
    

एक कौआ आवाज दे रहा है... तुम सुन रहे हो। यहां दो है —विषय - वस्तु (आब्जेक्ट) और विषयी (सब्जेक्ट) लेकिन क्या तुम उस दृष्टा को देख सकते हो जो इन दोनों को देख रहा है? —कौआ —सुनने वाला और फिर एक 'कोई और' जो इन दोनों को देख रहा है। यह एक सीधी सरल घटना है।
    

तुम एक वृक्ष को देखते हो —तुम हो और वृक्ष है, लेकिन क्या तुम एक और तत्व को नहीं पाते? —कि तुम वृक्ष को देख रहे हो और फिर एक दृष्टा है जो देख रहा है कि तुम वृक्ष को देख रहे हो।
    

साक्षी ध्यान है। तुम क्या देखते हो, यह बात गौण है। तुम वृक्ष को देख सकते हो, तुम नदी को देख सकते हो, बादलों को देख सकते हो, तुम बच्चों को आसपास खेलता हुआ देख सकते हो। साक्षी होना ध्यान है। तुम क्या देखते हो यह बात नहीं है, विषय-वस्तु की बात नहीं है।
    

देखने की गुणवत्ता, होशपूर्ण और सजग होने की गुणवत्ता —ध्यान है।
    

एक बात ध्यान रखें, ध्यान का अर्थ है होश। तुम जो कुछ भी होशपूर्वक करते हो वह ध्यान है। कर्म क्या है, यह प्रश्न नहीं, किंतु गुणवत्ता जो तुम कर्म में ले आते हो, उसकी बात है। चलना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक चलो। बैठना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक बैठ सको। पक्षियों की चहचहाहट को सुनना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक सुन सको। या केवल अपने भीतर मन की आवाजों को सुनना ध्यान बन सकता है, यदि तुम जाग्रत और साक्षी रह सको।
    

सारी बात यह है कि तुम सोये - सोये मत रहो। फिर जो भी हो, ध्यान होगा।

-ओशो
ध्यान योग

मंगल प्रभात एक सुबह, अभी सूरज भी निकला नहीं था और एक मांझी नदी के किनारे पहुंच गया था। उसका पैर किसी चीज से टकरा गया। झुक कर उसने

मंगल प्रभात एक सुबह,

अभी सूरज भी निकला नहीं था और एक मांझी नदी के किनारे पहुंच गया था। उसका पैर किसी चीज से टकरा गया। झुक कर उसने देखा, पत्थरों से भरा हुआ एक झोला पड़ा था।

उसने अपना जाल किनारे पर रख दिया, वह सुबह सूरज के उगने की प्रतीक्षा करने लगा। सूरज उग आए, वह अपना जाल फेंके और मछलियां पकड़े।

वह जो झोला उसे पड़ा हुआ मिल गया था, जिसमें पत्थर थे, वह एक-एक पत्थर निकाल कर शांत नदी में फेंकने लगा। सुबह के सन्नाटे में उन पत्थरों के गिरने की छपाक की आवाज सुनता, फिर दूसरा पत्थर फेंकता।

धीरे-धीरे सुबह का सूरज निकला, रोशनी हुई। तब तक उसने झोले के सारे पत्थर फेंक दिए थे, सिर्फ एक पत्थर उसके हाथ में रह गया था।

सूरज की रोशनी में देखते से ही जैसे उसके हृदय की धड़कन बंद हो गई, सांस रुक गई। उसने जिन्हें पत्थर समझ कर फेंक दिया था, वे हीरे-जवाहरात थे! लेकिन अब तो अंतिम हाथ में बचा था टुकड़ा और वह पूरे झोले को फेंक चुका था।

वह रोने लगा, चिल्लाने लगा। इतनी संपदा उसे मिल गई थी कि अनंत जन्मों के लिए काफी थी, लेकिन अंधेरे में, अनजान, अपरिचित, उसने उस सारी संपदा को पत्थर समझ कर फेंक दिया था।

लेकिन फिर भी वह मछुआ सौभाग्यशाली था, क्योंकि अंतिम पत्थर फेंकने के पहले सूरज निकल आया था और उसे दिखाई पड़ गया था कि उसके हाथ में हीरा है।

साधारणतः सभी लोग इतने सौभाग्यशाली नहीं होते हैं। जिंदगी बीत जाती है, सूरज नहीं निकलता, सुबह नहीं होती, रोशनी नहीं आती और सारे जीवन के हीरे हम पत्थर समझ कर फेंक चुके होते हैं।

जीवन एक बड़ी संपदा है, लेकिन आदमी सिवाय उसे फेंकने और गंवाने के कुछ भी नहीं करता है! जीवन क्या है, यह भी पता नहीं चल पाता और हम उसे फेंक देते हैं!

जीवन में क्या छिपा था--कौन से राज, कौन सा रहस्य, कौन सा स्वर्ग, कौन सा आनंद, कौन सी मुक्ति--उस सबका कोई भी अनुभव नहीं हो पाता और जीवन हमारे हाथ से रिक्त हो जाता है!

ओशो