गाय के शरीर में जीना, मतलब चेतना का पशु से मनुष्य बनने के लिए स्वयं को विकसित करना।
चेतना जब गाय की योनि में प्रवेश करती है, तभी से गाय की खूब सेवा की जाती है, ठीक उसी तरह, जिस तरह बेटी के गर्भवती होने पर उसकी की जाती है। हमारे धर्म में गाय को एक पशु नहीं बल्कि परिवार का एक सदस्य माना गया है। उस चेतना का स्वागत किया जाता है कि आज वह इस तल पर आ पहुंची है कि जहां से वह पशु योनि से मुक्त हो मनुष्य योनि में प्रवेश कर सके!
गाय के बछड़ा जनने पर इतनी खुशी हुई कि आदमी सुध-बुध खोकर, बछड़े को कंधे पर लेकर भागा गांव में डोंडी पीटते हुए कि "म्हारी गंगा ब्याणी... म्हारी गंगा ब्याणी...।" मारे खुशी के उसे होश ही नहीं रहता है, कि इस उत्साह में भागने पर कब उसकी धोती खुलकर गीर गई है, सारा गांव हंस रहा है, और अब वह नग्न खड़ा है!
उसे होश में लाया जाता है... अचानक वह 'अवा्क' और 'किंकर्तव्यविमूढ़' खड़ा रह जाता है। "अवा्क और किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह जाना" यह स्थिति है "ध्यान" की... जहां सब ठहर जाता है। कोई विचार नहीं होता!
बछड़े के आने पर बेटी बहुत खुश होती। उसे तो मानो खिलोना मिल गया हो! दोनों बहनों की तरह साथ बड़ी होती। दोनों एक -दूसरे से खूब घुलमिल जाती और जब बेटी का विवाह करते, तो उसके साथ ही गाय का भी विवाह कर देते और दान के रूप में उसी के साथ भेज दिया जाता ताकि आगे भी उनका यह प्रेम सदा बना रहे और बेटी का उससे लगाव होने के कारण वह उसका आजन्म खयाल रख सके?
इस तरह बेटी को भी विवाह के लिए राजी कर लिया जाता, कि तेरा विवाह ही नहीं कर रहे, तेरे साथ तेरी गाय का विवाह भी कर रहे हैं! इससे बेटी को एक भरोसा रहता है, कि ससुराल में वह अकेली नहीं है, पीहर का कोई न कोई साथ है! और गाय को यह स्मरण दिलवाने को, कि 'अगले जन्म में तू भी बेटी बनके आ, हम फिर तेरा भी कन्यादान करेंगे! ' इस तरह से उस चेतना को पशु से मनुष्य की ओर विकसित होने में मदद की जाती।
लेकिन यह मदद अंत तक बनी रहनी चाहिए, तभी उसका जीवन सार्थक है। पशु - चेतना का, मनुष्य- चेतना में विकास तभी संभव है जब चेतना को गाय के शरीर में 'पूरी तरह' से विकसित होने दिया जाये। यानी उसके जीवन को कोई बाधा न पहुंचाई जाये, वह 'पूरी' उम्र जीये। अर्थात उसका वध, उसकी हत्या न होने पाये। वह अपनी मौत मरे। हम उसके जीवन को उसे सहज जीने दें! हम उसके जीवन के निर्धारक न बनें! उसके बूढा होने पर उसकी ठीक वैसी ही देखभाल करें जैसी अपने परिवार के बूढ़े व्यक्ति की करते हैं। गाय चेतना के पशु -योनि का परम विकास है। यहां आकर गाय का शरीर इतना पवित्र हो जाता है, कि उसकी पूजा करनी शुरू कर दी जाती है। उसका दूध और मल-मूत्र भी उपयोगी साबित होता है।
हमें गो-सेवा करके चेतना को गाय के शरीर में पूरी तरह से विकसित होने में मदद करनी है। और यह तभी संभव है जब वह अपनी स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त हो सके। यदि समय से पहले उसकी मृत्यु (हत्या) होती है तो उसकी चेतना मनुष्य शरीर लेने के लिए विकसित नहीं हो पायेगी। गाय के शरीर में जीना, मतलब चेतना का पशु से मनुष्य में विकसित होना।
-स्वामी ध्यान उत्सव
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