તમારા વિના એકલાં,મને જીવતા નથી આવડતું.
તમારા પ્રત્યેનાં પ્રેમને વધું,મને વર્ણવતા નથી આવડતું.
કહીશ હવે બસ એટલું કે,તમે જ મારી જિંદગી છો.આનાથી વિશેષ હું શું કહું ?
મને તો હવે કંઈ કહેતા નથી આવડતું.
તમારા વિના એકલાં,મને જીવતા નથી આવડતું.
તમારા પ્રત્યેનાં પ્રેમને વધું,મને વર્ણવતા નથી આવડતું.
કહીશ હવે બસ એટલું કે,તમે જ મારી જિંદગી છો.આનાથી વિશેષ હું શું કહું ?
મને તો હવે કંઈ કહેતા નથી આવડતું.
હળવે હાથે હથેળી ઉપર જરા તમારું નામ લખી દો,
નામ ની સાથે સાથે સાજન, સરનામુ પણ ખાસ લખીદો.
થોક થોક લોકો ની વચ્ચે હવે નથી ગમતું મળવાનું,ઢેલ સરીખુ વળગુ ક્યારે, મળશો ક્યાં એ સ્થાન લખી દો.
એકલતાનુ ઝેર ભરેલા વીંછી ડંખી લે એ પહેલા,મારે આંગણ સાજન ક્યારે, લઇ આવો છો જાન લખીદો.
બહુ બહુ તો બે વાત કરી ને લોકો પાછા ભુલી જાશે,નામ તમારું મારા નામ ની પાછળ ખુલ્લે આમ લખી દો.
હળવે હાથે હથેળી ઉપર જરા તમારું નામ લખી દો,નામની સાથે સાથે સાજન, સરનામુ પણ ખાસ લખી દો.
-અરૂણ દેશાણી.
((((((एक अनूठी घटना मैंने घटते देखी, ))))))
कई बार कुछ शराबियों ने आकर मुझसे संन्यास ले लिया। फंस गए भूल में। सोच कर यह आये कि यह आदमी तो कुछ मना करता ही नहीं है,कि पीओ कि न पीओ, कि खाओ, कि यह न खाओ, वह न खाओ, कोई हर्जा नहीं। वे बड़े प्रसन्न हुए।
उन्होंने कहा कि आप की बात हमें बिलकुल जंचती है,यह किसी ने बताई ही नहीं। लेकिन जैसे—जैसे ध्यान बढ़ा, जैसे—जैसे संन्यास का रंग छाया,वैसे—वैसे उनके पैर मधुशाला की तरफ जानेबंद होने लगे,
दूसरी मधुशाला पुकारने लगी।एक शराबी ने छह महीने ध्यान करने के बाद मुझे कहा कि पहले मैं शराब पीता था क्योंकि मैं दुखी था, तो दुख भूल जाता था;अब मैं थोड़ा सुखी हूं शराब पीता हूं? तो सुख भूल जाता है।
अब बड़ी मुश्किल हो गई।सुख तो कोई भुलाना नहीं चाहता। यह आपने क्या कर दिया?मैंने कहा, अब तुम चुन लो।
वह कहने लगा कि अब शराब पी लेता हूं,तो ध्यान खराब हो जाता है,नहीं तो ध्यान की धीमी—धीमी धारा भीतर बहती रहती है, शीतल—शीतल, मंद—मंद बयार बहती रहती है।
शराब पी लेता हूं तो दो—चार दिन के लिए ध्यान की धारा अस्तव्यस्त हो जाती है; फिर बामुश्किल सम्हाल पाता हूं। अब बड़ी मुश्किल हो गई है।तो मैंने कहा, अब तुम चुन लो,तुम्हारे सामने है।
ध्यान छोड़ना है, ध्यान छोड़ दो, शराब छोड़नी है, शराब छोड़ दो।दोनों साथ तो चलते नहीं,तुम्हें दोनों साथ चलाना हो, साथ चला लो।उसने कहा, अब मुश्किल है। क्योंकि ध्यान से जो रसधार बह रही है, वह इतनी पावन है और वह मुझे ऐसी ऊंचाइयों पर ले जा रही है,
जिनका मुझे कभी भरोसा न था कि मुझ जैसा पापी और कभी ऐसे अनुभव कर पायेगा!आपको छोड़ कर किसी दूसरे को तो मैं कहता हीनहीं, क्योंकि मैं दूसरों को कहता हूं तो वे समझते हैं कि शराबी है, ज्यादा पी गया होगा।
वे कहते हैं :होश में आओ, होश की बातें करो।मैं भीतर के भाव की बात करता हूं तो वे समझते हैं कि ज्यादा पी गया होगा। उन्हेंभरोसा नहीं आता।
मेरी पत्नी तक को भरोसा नहीं आता। वह कहती है कि बकवास बंद करो। तुम ये ज्ञान—वान की बातें नहीं,तुम ज्यादा पी गए हो।
मैं कहता हूं,मैंने आज महीने भर से छुई नहीं है।तो आप से ही कह सकता हूं वह शराबी कहने लगा, आप ही समझेंगे। और अब छोड़ना मुश्किल है ध्यान।
जीवन को विधायक दृष्टि से लो। तुम सुखी होने लगो, तो जो चीजें तुमने दुख के कारण पकड़ रखी थीं, वे अपने—आप छूट जायेंगी।ध्यान आये तो शराब छूट जाती है। ध्यान आये तो मांसाहार छूट जाता है।
ध्यान आये तो धीरे —धीरे काम—ऊर्जा ब्रह्मचर्य में रूपांतरित होने लगती है।बस ध्यान आये। तो मैं ध्यान की शराब पीने को तुमसे कहता हूं;समाधि की मधुशाला में पियक्कड़ों की जमात में सम्मिलित हो जाने को कहता हूं।
अष्टावक्र महागीता, भाग-१, प्रवचन#१०
OSHO
परमात्मा को जाननेवाला तो सिर्फ रहस्य-विमुग्ध रह जाता है; मौन हो जाता है। और जिस दिन तुम परमात्मा के साथ थोड़ा सा भी संबंध जोड़ लेते हो, उस दिन परमात्मा तो ज्ञात होता ही नहीं,
यह संसार भी अज्ञात हो जाता है।
जिसने परमात्मा के साथ थोड़ा संबंध जोड़ लिया, उस दिन उसकी पत्नी भी अज्ञात हो गई, पति भी अज्ञात हो गया, अपना बेटा भी अज्ञात हो गया, क्योंकि इस बेटे की आंखों में भी परमात्मा ही झांकेगा। इस मित्र केहाथ में भी परमात्मा का ही स्पर्श होगा।
यह पत्नी भी कोई और नहीं, उसका ही एक रूप है। यह वृक्षों में भी वही हरा है। इन पक्षियों में भी वही गीत गा रहा है।
इस सूरज में वही प्रकाश है। इस अंधेरी रात में वही अंधेरी रात है।परमात्मा को जानने से परमात्मा ही अज्ञात नहीं होता; सारा जगत् पुनः अज्ञातहो जाता है।
इसको दूसरी भाषा में अगर कहें तो फिर से जगत् रहस्यपूर्ण हो जाता है; फिर से आश्चर्य का जन्म होता है; फिर से तुम्हें बच्चे की आंख मिलती है; पुनर्जन्म हुआ; द्विज बने।
यह नया जन्म ही संन्यास है।
~ ओशो ~
(अजहूं चेत गंवार, प्रवचन #18)
आनंद के विपरीत कोई अवस्था ही नहीं है। और आनंद सुख नहीं है, अगर उसे सुख बनाया तो वह बात और होगी।
वह फिर दुख की दुनिया शुरू हो गई।तो साधारणतः हम कहते हैं, वह व्यक्ति आनंद को उपलब्ध होता है, जो दुख से मुक्त हो जाता है।लेकिन इस कहने में थोड़ी भ्रांति है।
कहना ऐसा चाहिए, आनंद को वह व्यक्ति उपलब्ध होता है, जो सुख-दुख से मुक्त हो जाता है।
क्योंकि वे जो सुख-दुख हैं, वे कोई दो चीजें नहीं हैं।और इसलिए साधारणजन को निरंतर यह गलती हो जाती है समझने में, वह समझता है, दुख से मुक्त हो जाना सुख है।इसलिए बहुत से लोग सत्य की खोज में या मोक्ष की खोज में भी वस्तुतः सुख की ही खोज में होते हैं।इसलिए महावीर ने एक बहुत बढ़िया काम किया।
सुख के खोजी को उन्होंने कहा, वह स्वर्ग का खोजी है। आनंद के खोजी को उन्होंने कहा, वह मोक्ष का खोजी है।मोक्ष और स्वर्ग में जो फर्क है, वह खोज का है।
दुख का खोजी नरक का खोजी है, सुख का खोजी स्वर्ग का खोजी है, लेकिन दोनों से जो मुक्ति का खोजी है, वह मोक्ष का खोजी है।
स्वर्ग मोक्ष नहीं है।
~ ओशो ~
(महावीर मेरी दृष्टि में, प्रवचन #24)
मैंने सुना है, दो फकीर थे और उन दोनों फकीरों में एक विवाद था, बड़ा लंबा विवाद था।
उनमें एक फकीर था, जो इस बात को मानता था कि कुछ पैसे वक्त - बेवक्त के लिए अपनेपास रखना जरूरी है।
दूसरा मित्र कहता था, पैसे की रखने की क्या जरूरत है? हम संन्यासी हैं, हमें पैसे की क्या जरूरत है? पैसे तो वे रखते हैं, जो संसारी हैं।
इस जगत का बड़ा रहस्य यह है कि -- न पदार्थवादी जीतता है, न अध्यात्मवादी जीतता है।
जीत भी नहीं सकते हैं, क्योंकि वे जिंदगी को आधा - आधा तोड़कर कह रहे हैं।तो उन दोनों में बड़ा विवाद था।
वे दोनों एक दिन सांझ एक नदी के किनारे भागे हुए पहुंचे हैं। रात उतरने के करीब है। माझी नाव बांध रहा है। नाव बांधते उस मांझी से उन्होंने कहा, नाव मत बांधो, हमें उस पार पहुंचा दो, रात उतरने को है, हमें उस पार जाना जरूरी है।
हमारा गुरु मृत्यु के निकट है और खबर आई है कि सुबह तक उसके प्राण निकल जाएंगे। तो माझी ने कहा कि मैं पांच रुपए लूंगा, तो उतार दूंगा।
तो जो फकीर कहता था कि रुपए पास रखना चाहिए, वह हंसा और उसने कहा, कहो दोस्त, अब क्या खयाल है? पैसा रखना व्यर्थ है या सार्थक है? वह दूसरा फकीर सिर्फ हंसता रहा। फिर उसने पांच रुपए निकाले, मांझी को दिए।
फिर वे नाव पर सवार हुए और उस पार पहुंच गए। फिर उतर कर उसने कहा, कहो मित्र, आज नदी के पार न उतर पाते, अगर पैसे पास न होते। वह दूसरा खूब हंसने लगा। उसने कहा, हम पैसे पास होने की वजह से नदी पार नहीं उतरे हैं।
तुम पैसे छोड़ सके, इसलिए नदी केपार उतरे हैं। पैसा होने से नहीं, पैसा छोड़ने से उतरे हैं नदी के पार। दलील फिर अपनी जगह खड़ी हो गई।वे दोनों अपने गुरु के पास गए और मरते हुएगुरु से उन्होंने पूछा कि क्या करें? बड़ीमुश्किल है! हमारे दोनों के सिद्धान्त ठीक मालूम पड़ते हैं।वह गुरु खूब हंसा।
उसने कहा कि तुम दोनों पागल हो। तुम वही पागलपन कर रहे हो, जो आदमी बहुत जमाने से कर रहा है। क्या पागलपन है, उन्होंने पूछा।
गुरु ने कहा, तुम एक सत्य के आधे हिस्से को देख रहे हो।यह सच है कि पैसे छोड़ने से ही तुम नाव से उतर सके, लेकिन दूसरी बात भी उतनी ही सच है कि तुम पैसे इसलिए छोड़ सके कि पैसे तुम्हारे पास थे। और यह भी सच है कि पैसे पास होने से ही तुम नदी पार उतरे, लेकिन दूसरी बात भी उतनी ही सच है कि अगर पास ही होते तो तुम नदी उतर न सकते थे।
तुम पास से दूर कर सके, इसलिए तुम नदी उतरे। ये दोनों ही बातें सच हैं। और ये दोनों बातें ही इकट्ठा जीवन है और इनमें विरोध नहीं है।
~ ओशो ~
(मैं मृत्यु सिखाता हूँ, प्रवचन #9)
◆◆ सत्य का अवतरण कब, कैसे, किसपे हो जाए ◆◆◆◆
कुछ पता नहीं, सदा गाह्यता के लिए तैयार रहो ◆◆मैंने सुना है, एक आदमी ने चोरी की। घर के लोग जाग गए, शोरगुल मच गया, आदमी भागा। उसके पीछे घर के लोग भागे। रास्ते से पुलिस वाला भी पीछे हो लिया।वह आदमी तो बड़ी घबड़ाहट में पड़ गया।वर्षा के दिन, नदी के किनारे आया तो बाढ़, हिम्मत न पड़ी कूदने की। कुछ और नहीं सूझा,कपड़े तो फेंक दिए नदी में, नंगा होकर किनारे पर बैठ गया।जब लोग पहुंचे, उन सबने उसे झुककर नमस्कार कियाऔर कहा कि साधु महाराज, एक चोर अभी -- अभी यहां आया है, आपने जरूर देखा होगा।उस चोर के भीतर एक क्रांति हो गयी!उनका कहना साधु महाराज और उसने सोचा कि मैं तो सिर्फ धोखे का साधु हूं, मेरे चरणों में झुक रहे हैं, काश, मैं सच्चा साधु होता!एक आकांक्षा जगी, न - मालूम किन जन्मों की सोई हुई आकांक्षा रहीं होगी! फिर उसने चोरी का रास्ता ही नहीं छोड़ा, साधारण संसार का रास्ता ही छोड़ दिया। फिर तो वहीं रम गया।सम्राट भी एक दिन उसके चरण छूने आया। सम्राट ने पूछा, आप कहां से आए? आपकी प्रतिभा की बड़ी ख्याति सुनी है। वह हंसनेलगा, उसने कहा, मत पूछो।धोखा देने चला था, धोखा खा गया।उसने अपनी कहानी कही कि हूं मैं वही चोर।
अब छुपाऊंगा नहीं। अब साधुता उस जगह आ गयी जहां छुपाना मुश्किल हो जाता है। साधुता उस जगह आ गयी जहां सत्य ही प्रकट करना होता है।था तो चोर, कपड़े ही फेंके थे, कभी सोचा भी नथाकपड़े फेंकते वक्त कि साधु हो जाऊंगा।
कोईऔर उपाय न देखकर साधु का वेश बनाकर बैठ गया था,नंग - धड़ंग, राख पड़ी थी घाट पर, उसी को लपेटलिया था, लेकिन जो लोग पीछे आए थे, पैर छुए;उन्होंने मुझे दीक्षा दे दी; उन्होंने पैर छुए और मेरी दीक्षा हो गयी।
वस्त्र ही नहीं गए नदी में, चोर भी बह गया।
और जब मुझे दिखायी पड़ा कि झूठे साधु को भी इतना सम्मान है, तो सच्चे साधु को कितना सम्मान होगा!बस, मेरे भीतर कुछ मिट गया और कुछ नया उमग आया।
~ ओशो ~
(राम दुवारे जो मरे, प्रवचन #4)
★★★● अगर डूबना है तो पूरी तरह डुबो ●★★★इश्क करता है तो फिर इश्क की तौहीन न करया तो बेहोश न हो, तो न फिर होश में आ ।।
या तो डूबना है तो पूरे ही डूब जाओ, यह निकम्मा होने का जो पाठ मैं पढ़ा रहा हूं इसमें फिर पूरी तरह हो जाओ।
यही तो अकर्म है, निष्काम है।
अगर थोड़ी भी शक - शुबहा मनमें हो, थोड़ा भी संदेह हो, तो जितने जल्दी भाग सको भाग जाओ, दूर निकल सको निकल जाओ।
क्योंकि ज्यादा देर रुक गए बुरी संगत में, तो फिर बिलकुल सदा के लिए निकम्मे होजाओगे।
अगर संसार में थोड़ा भी रस है, तो यह बुरी संगत है।
अगर संसार में कोई रस न रहा, तो यह सत्संग है।निकम्मे होकर काम के हो जाओगे।
बेहोश होकर एक ऐसे होश को उपलब्ध होओगे जिसको फिर कोई बेहोशी छू नहीं सकती।दीवानगी-ए-इश्क के बाद आ ही गया होशऔर होश भी वो होश कि दीवाना बना दे ।।
~ ओशो ~
अशांति का नाम ही मन है। जब तक अशांति है तब तक मन है; नहीं तो मन भी नहीं। जहां शांति हुई वहां मन तिरोहित हुआ।
ऐसा समझें—तूफान आया है, लहरों में सागर की। फिर हम कहते हैं, तूफान शांत हो गया। जब तूफान शांत हो जाता है तो क्या सागर तट परखोजने से शांत तूफान मिल सकेगा?
हम कहते हैं, तूफान शांत हो गया तो पूछा जा सकता है, शांत तूफान कहां है? शांत तूफान होता ही नहीं। तूफान का नाम ही अशांति है।
शांत तूफान—मतलब तूफान मर गया, अब तूफान नहीं है। शांत मन का अर्थ, मन मर गया, अब मननहीं है।
चाह के छूटने का अर्थ, संसार गया,अब नहीं है।
जहां चाह नहीं, वहां परमात्मा है।
जहां चाह है, वहां संसार है। इसलिए परमात्मा की चाह नहीं हो सकती और अनचाहा संसार नहीं हो सकता।
यह दो बातें नहीं हो सकतीं।मैं कहता आँखन देखी -
32ओशो
ખુશી ને સમજવા માટે દુઃખ નું હોવું જરૂરી છે,
મૌન ને સમજવા માટે શોર નું હોવું જરૂરી છે,
સારપ ને સમજવા માટે ખરાબ નું હોવું જરૂરી છે,
પ્રેમ ને સમજવા માટે નફરત નુ હોવું જરૂરી છે,
અને જિંદગી ની અહેમિયત ને સમજવા માટે મૌત નું હોવું જરૂરી છે
મીંચેલી આંખે મળ્યો જ્યારે જાગરણનો અર્થ,
ત્યારે ખબર પડી કે છે શું આવરણનો અર્થ.
સંકોચ શું છે એની ખરી ત્યારે જાણ થઇ,
મૃગજળને જઇને પૂછ્યો મેં વહેતાં ઝરણનો અર્થ.
આબોહવા તો હોય છે – આબોહવાનું શું?
વાતાવરણ જો હોય તો વાતાવરણનો અર્થ ?!
છેવટનો અંત આવી ગયો સૌ પ્રયાસનો,
મારી નજીક એ જ છે મંગળાચરણનો અર્થ ?
નિષ્ઠુર છું – હું ચાહું તો તો હમણાં હસી શકું,
પણ એમાં દિલ ન લાગે તો શું આચરણનો અર્થ?
છૂટા પડી ગયા તો સમજદાર થઇ ગયા,
સમજી ગયા કે શું હતો એકીકરણનો અર્થ.
સ્વપ્નાની વાત કોઇને કહેતા નથી હવે,
સમજી ગયા છે ‘સૈફ’ હવે અવતરણનો અર્થ.
ગુસ્સે થયા જો લોક તો પત્થર સુધી ગયા,
પણ દોસ્તો ના હાથ તો ખંજર સુધી ગયા.
જુલ્ફોય કમ નહોતી જરા એ મહેક માં,
મુરખા હતા હકીમ કે અત્તર સુધી ગયા.
એમ જ કદાપિ કોઇને લોકો ભજે નહિ,
ખપતું’તુ સ્વર્ગ એટલે ઇશ્વર સુધી ગયા.
‘ઘાયલ’ ની ભાવભીની અમારે તો દોસ્તી,
આ એટલે તો દુઃશ્મનોના ઘર સુધી ગયા.
!! निःशब्द मौन !!एक फकीर एक रास्ते से गुजरता था।सर्द रात थी और उसके हाथ—पैर ठंडे हो गए।उसके पास वस्त्र न थे।वह एक वृक्ष के नीचे रुका।सुबह जब उसकी नींद खुली,तब हाथ—पैर हिलाना भी मुश्किल था।उसने किसी किताब में पढ़ा था किजब हाथ—पैर ठंडे हो जाते हैंतो आदमी मर जाता है।किताबें पढ़ कर जो लोग चलते हैंवे ऐसी ही भूल में पड़ जाते हैं।उसने सोचा कि शायद मैं मर गया हूं।उसे पता था कि मरे हुए लोग कैसे हो जाते हैं।तो वह आंख बंद करके लेट रहा।कुछ लोग रास्ते से गुजरते थे,उन्होंने उस आदमी को मरा हुआसमझ कर उसकी अरथी बनाईऔर उसे वे मरघट की तरफ ले चले।वे एक चौरस्ते पर पहुंचे जहां चार रास्ते फूटते थेऔर वे चिंता में पड़ गए किमरघट को कौन सा रास्ता जाता है?वे अजनबी लोग थे,उस गांव के रास्तों से परिचित न थे।वे चारों विचार करने लगे किकोई मिल जाए गांव का रहने वाला तोहम पूछ लें कि मरघट को रास्ता कौन सा जाता है?फकीर तो जिंदा था।उसने सोचा कि बेचारे बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं।अब पता नहीं गांव वाला कोई आएगा कि नहीं आएगा।तो वह अरथी से बोला कि जब मैं जिंदा हुआ करता था,तब लोग बाएं रास्ते से मरघट जाते थे।हालांकि मैं मर गया हूं और अब बताने में असमर्थ हूंलेकिन इतनी बात तो कह ही सकता हूं।उन चारों ने घबड़ा कर अरथी छोड़ दी!वह फकीर नीचे गिर पड़ा!उन्होंने कहा, तुम कैसे पागल हो?तुम बोलते हो?कहीं मरे हुए आदमी बोलते हैं?उस फकीर ने कहा,मैंने ऐसे जिंदा आदमी देखे हैंजो नहीं बोलते हैं,तो इससे उलटा भी हो सकता है किकुछ मुर्दे ऐसे हों जो बोलते हों।अगर कोई जिंदा आदमी चाहे तो नहीं बोले,तो कोई मुर्दा आदमी चाहे तो बोल नहीं सकता है?इसमें इतनी आश्चर्य की क्या बात है?वह फकीर कहने लगा।मैंने जब यह कहानी सुनी तोमेरे मन में एक खयाल आयाऔर वह यह कि असलियत और भी उलटी है।यह तो हो भी सकता है कि मुर्दा आदमी बोलता हुआ मिल जाए;यह जरा मुश्किल ही है कि जिंदा आदमी और चुप हो जाए।जिंदा आदमी न बोले, यह जरा मुश्किल ही है।यही ज्यादा आसान मालूम पड़ता है किमरा हुआ आदमी बोल जाए।हम सब जिंदा हैं,लेकिन हमने जिंदगी में एक भी क्षण न जाना होगाजब किसी न किसी रूप में हम नहीं बोल रहे हैं—या बाहर, या भीतर।हमने न बोलने का, साइलेंस का,मौन का एक भी क्षण नहीं जाना है।हमने बहुत जन्म देखे होंगे,लेकिन वे सब जन्म शब्दों के जन्म हैं।और हमने इस जिंदगी में भी बहुत दिन व्यतीत किए हैं,लेकिन वे सब शब्द की यात्रा के दिन हैं।जब हम बोलते हैं; नहीं बोलते तो सोचते हैं;नहीं सोचते तो सपना देखते हैं—लेकिन शब्द, बोलनाकिसी न किसी तल पर जारी रहता है।और जिस आदमी के शब्द अभी जारी हैं,वह परमात्मा को नहीं पहचान पाएगा;क्योंकि उसकी पहचाननिःशब्द में, मौन में, साइलेंस में ही संभव है।
-जीवन-रहस्य-प्रवचन-02
गुरु का एक ही अर्थ है: जो तुम्हारी नींद तोड़ दे। इसलिए तुम गुरु से बचोगे, भागोगे क्योंकि नींद बड़ी सुखद है। और नींद का टूटना हमेशा दुखद है। जो भी तुम्हारी नींद तोड़ेगा, उस पर तुम नाराज होओगे क्योंकि वह तुम्हें बेचैनी में डाल रहा है। तुम नींद से व्यवस्थित हो गये हो। सब ठीक चल रहा था, सपना भी अच्छा था, सब ठीक था। कोई आ गया, उसने नींद झकझोर दी। अब सब अस्त-व्यस्त होगा। अब पुराना सब जायेगा और नया फिर से संयोजन करना होगा। इसलिए गुरु शुरू में तो कष्टदायी मालूम पड़ता है, दुखदायी मालूम पड़ता है।इसलिए जो गुरु तुम्हें शुरू से सांत्वना देता हो, समझना कि वह नींद की दवा होगा; गुरु नहीं है। जो तुम्हें पुचकारता, थपकारता हो और कहता हो सब ठीक है, उससे बचना। वह गुरु नहीं है। जब तुम सो रहे होओगे, वह तुम्हारी जेब काट लेगा; और कुछ इससे ज्यादा होने वाला नहीं है।जब भी तुम गुरु के पास जाओगे तो वह कहेगा, कुछ भी ठीक नहीं है, तुम बिलकुल गलत हो। तुम पागल हो। तुम नींद में हो। तुम अस्वस्थ हो। वह तुम्हारे अहंकार को कोई तृप्ति न देगा।
वह सब तरफ से तुम्हें तोड़ेगा, मिटायेगा, जलायेगा।
गुरु तो मृत्यु जैसा है।
और मृत्यु से ही गुजरकर अमृत उपलब्ध होता है।
ओशो
बिन बाती बिन तेल–
(झेन कथा)प्रवचन–7
"दृष्टा साक्षी नहीं है।"
द्रष्टा और दृश्य साक्षी के दो पहलू हैं।
जब वे एक-दूसरे में तिरोहित हो जाते हैं जब वे एक-दूसरे में लीन हो जाते हैं, जब वे एक हो जाते हैं, तो पहली बार साक्षी का उसकी समग्रता में प्रादुर्भाव होता है।
परंतु एक प्रश्न कई लोगों को उठता है।
इसका कारण है कि वे साक्षी को ही द्रष्टा समझते हैं।
उनके मन में द्रष्टा और साक्षी पर्याय हैं।
यह भ्रांतिपूर्ण है, द्रष्टा साक्षी नहींहै, बल्कि उसका केवल एक अंश है। और जब भीअंश स्वयं को पूर्ण मानता है, गलती शुरूहो जाती है।द्रष्टा का अर्थ है चेतनागत, और दृष्य का अर्थ है पदार्थगत, विषयगत।
द्रष्टा का अर्थ है :जो दृश्य के बाहर हो, और द्रष्टा का अर्थ है जो भीतर है।
भीतर और बाहर को विभाजित नहीं किया जा सकता, वे युगपत हैं, और युगपत ही हो सकते हैं।
जब इस युगपत्य का, या कहा जाये अद्वैत का अनुभव हो जाता है तो साक्षी का प्रादुर्भाव होता है।
साक्षी को तुम साध नहीं सकते। यदि तुम साक्षी को साधो, तो बस द्रष्टा को ही साध पाओगे, और द्रष्टा साक्षी नहीं है।फिर क्या करना है? पिघलना है, विलीन होना है।
जब एक गुलाब के फूल को देखो, तोबिल्कुल भूल जाओ कि एक विषय है जो देखा गया और एक चेतना है जो देखनेवाली है।
उस क्षण के सौंदर्य को, उस क्षण की धन्यता को तुम दोनों को अभिभूत कर लेनेदो, ताकि तुम और गुलाब भिन्न न रहो, बल्कि एक लय, एक गीत, एक मस्ती बन जाओ।प्रेम करते हुए, संगीत सुनते हुए, सूर्यास्त को देखते हुए, इसे बार- बार होने दो।
यह जितना हो उतना ही अच्छा, क्योंकि यह कोई कला नहीं बल्कि एक कौशलहै, एक गुर है।
तुम्हें इसका सूत्र - संकेत ग्रहण कर लेना है, एक बार तुम इसे पा लो तो इसे कहीं भी, कभी भी शुरू कर सकते हो।
जब साक्षी का प्रादुर्भाव होता है, तो नतो कोई देखने वाला बचता है, न देखा जाने वाला।
साक्षी एक निर्मल दर्पण है, जो कुछ भी प्रतिबिंबित नहीं करता।
यह कहना भी उचित नहीं है कि वह एक दर्पण है,यह कहना बेहतर होगा कि वह एक दर्पणत्व है।
वह तो पिघलने और विलीन होने की एक गत्यात्मक प्रक्रिया है, वह कोई जड़ घटना नहीं, एक प्रवाह है! तुम गुलाब तक पहुंच रहे हो, गुलाब तुममें पहुंच रहा है :यह अंतरात्मा का एक आदान-प्रदान है।
यह धारणा भूल जाओ कि साक्षी द्रष्टा है,वह द्रष्टा नहीं है।
द्रष्टा को साधा जा सकता है, साक्षी सहज घटना है। द्रष्टा तो एक प्रकार की एकाग्रता है, द्रष्टा तुम्हें अलग रखे रहता है।
द्रष्टा तो तुम्हारे अहंकार में अभिवृद्धि करेगा, उसे सशक्त करेगा।
जितने तुम द्रष्टा होते चले जाओगे उतना तुम्हें लगेगा जैसे एक द्वीप हो गए —विभाजित, एकाकी, सुदूर।युगों से, संसार भर के साधक द्रष्टा को साधते रहे हैं। वे भले ही इसे साक्षी कहते रहे हों, पर यह साक्षी नहीं है। साक्षी तो बिलकुल भिन्न है, गुणात्मक रूप से भिन्न है। द्रष्टा को साधा जा सकता है, प्रयासपूर्वक विकसित किया जा सकता है, उसे साधकर तुम बेहतर द्रष्टा बन सकते हो।वैज्ञानिक अवलोकन करता है, संत साक्षी रहता है। विज्ञान की पूरी प्रक्रिया ही अवलोकन की है : इतने तत्पर, सूक्ष्म और तीक्ष्ण ढंग से देखना होता है कि कुछ भी चूक न जाए। लेकिन वैज्ञानिक परमात्मा को नहीं जान पाता। यद्यपि उसका अवलोकन बहुत ही कुशल होता है, फिर भी वह परमात्मा से अनभिज्ञ रहता है। उसका कभी परमात्मा से मिलना नहीं होता, बल्कि वह परमात्मा के होने से इनकार करता है, क्योंकि जितना वह अवलोकन करता है —और यह पूरी प्रक्रिया अवलोकन की ही है —उतना ही वह अस्तित्व से अलग हो जाता है। सेतु टूट जाते हैं और दीवारेंखड़ी हो जाती है, वह अपने ही अहंकार में कैद हो जाता है।संत साक्षी रहता है। लेकिन स्मरण रखना, साक्षित्व एक घटना है, एक उप - उत्पत्तिहै —क्षण में, परिस्थिति में, अनुभव में समग्र होने का परिणाम है। समग्रता ही कुंजी है : समग्रता से ही साक्षी की धन्यता का जन्म होता है।अवलोकन के विषय में सब भूल जाओ, उससे तुम्हें अवलोकित विषय के संबंध में तो अधिक परिमार्जित सूचना मिल जाएगी, लेकिन तुम अपनी ही चेतना से बिलकुल अनभिज्ञ रह जाओगे।-
ओशो
ध्यान योग