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Thursday, 17 March 2016

मेरा मानना है कि आचरण से अहिंसा उपलब्ध नहीं होती। मैंने यह नहीं कहा कि अहिंसा से आचरण उपलब्ध नहीं होता। इसके फर्क को समझ लीजिए आप। हो सकता है कि मैं मछली न खाऊं। लेकिन

मेरा मानना है कि आचरण से अहिंसा उपलब्ध नहीं होती। मैंने यह नहीं कहा कि अहिंसा से आचरण उपलब्ध नहीं होता। इसके फर्क को समझ लीजिए आप। हो सकता है कि मैं मछली न खाऊं। लेकिन इससे मैं महावीर नहीं हो जाऊंगा।

लेकिन यह असंभव है कि मैं महावीर हो जाऊं और मछली खाऊं। इस फर्क को आप समझ लें। आचरण को साध कर कोई अहिंसक नहीं हो सकता, लेकिन अहिंसक हो जाए तो आचरण में अनिवार्य रूपांतरण होगा।

दूसरी बात यह कि मैंने बुद्ध और महावीरको अहिंसक कहा, लेकिन बुद्ध मांस खाते थे। बुद्ध मरे हुए जानवर का मांस खाते थे। उसमें कोई भी हिंसा नहीं है। लेकिनमहावीर ने उसे वर्जित किया किसी संभावना के कारण। जैसा कि आज जापान मेंहै।

सब होटलों के, दूकानों के ऊपर तख्तीलगी हुई है कि यहां मरे हुए जानवर का मांस मिलता है।अब इतने मरे हुए जानवर कहां से मिल जाते हैं, यह सोचने जैसा है। बुद्ध चूक गए, बुद्ध से भूल हो गई। हालांकि मरे हुए जानवर का मांस खाने में हिंसा नहींहै, क्योंकि मांस का मतलब है कि मार कर खाना। मारा नहीं है तो हिंसा नहीं है।

लेकिन यह कैसे तय होगा कि लोग फिर मरे हुए जानवर के नाम पर मार कर नहीं खाने लगेंगे! इसलिए बुद्ध से चूक हो गई है औरउसका फल पूरा एशिया भोग रहा है।बुद्ध की बात तो बिलकुल ठीक है, लेकिन बात के ठीक होने से कुछ नहीं होता; किन लोगों से कह रहे हैं, यह भी सोचना जरूरी है।

महावीर की समझ में भी आ सकती है यह बात कि मरे हुए जानवर का मांस खाने में क्या कठिनाई है। जब मर ही गया तो हिंसा का कोई सवाल नहीं है। लेकिन जिन लोगों के बीच हम यह बात कह रहे हैं, वे कल पीछे के दरवाजे से मार कर खाने लगेंगे।

वे सब सज्जन लोग हैं, वे सब नैतिक लोग हैं, बड़े खतरनाक लोग हैं। वे रास्ता कोई न कोई निकाल ही लेंगे, वे पीछे का कोई दरवाजा खोल ही लेंगे।मैं बुद्ध और महावीर दोनों को पूर्ण अहिंसक मानता हूं।

बुद्ध की अहिंसा में रत्ती भर कमी नहीं है। लेकिन बुद्धने जो निर्देश दिया है, उसमें चूक हो गई है। वह चूक समाज के साथ हो गई है। अगर समझदारों की दुनिया हो तो चूक होने का कोई कारण नहीं है।-

ओशो
महावीर या महाविनाशप्रवचन
नं. 10 से
संकलित।

रस परित्याग का अर्थ अंधापन, बहरापन नहीं है, लेकिन बहुत लोगों ने वैसा अर्थलिया है। ध्यान को इंद्रियों से तोड़ना तो कठिन, इंद्रियों को तोड़ देना बहुत आसान है। आं

रस परित्याग का अर्थ अंधापन, बहरापन नहीं है, लेकिन बहुत लोगों ने वैसा अर्थलिया है। ध्यान को इंद्रियों से तोड़ना तो कठिन, इंद्रियों को तोड़ देना बहुत आसान है। आंख जो देखती है, उससे रस को छोड़ना तो कठिन, आंख को फोड़ देना बहुत कठिन नहीं है। किन्हीं ने तो आंखें फोड़ही ली है वस्तुत:। किन्हीं ने धुंधली कर ली है।

आंख बंद करके चलने से कुछ भी नहोगा, क्योंकि आंख बंद करने की जो वृत्ति पैदा हो रही है वह जिस भय से पैदा हो रही है। वह भय त्याग नहीं है।और मन के नियम बहुत अदभुत है। जिससे हम भयभीत होते है, उससे हम बहुत गहरे में प्रभावित भी होते है।

अगर मैं सौंदर्य को देख कर आंख बंद कर लूं तो वह भी सौंदर्य से प्रभावित होना है। उससे यह पता नहीं चलता कि मै सौदर्य की जो वासना थी, उससे मुक्त हो गया।

उससे इतनाही पता चलता है कि सौदर्य की वासना भरपूर है, और मैं इतना भयभीत हूं अपनी वासना से कि भय के कारण मैंने आंख बंद कर ली हैं। लेकिन जिस भय से आंख बंद की है, वह आंख के भीतर चलता रहेगा।

आवश्यक नहीं है कि हम बाहर ही देखें, तभी रूप दिखायी पड़े।अगर रस भीतर मौजूद है तो रस भीतर भी रूप को निर्मित कर लेता है। रूप निर्मित होजाते है, कल्पना निर्मित हो जाती है। औरबाहर तो जगत इतना सुंदर कभी भी नहीं है जितना हम भीतर निर्मित कर सकते हैं।

जोस्वप्न का जगत है, वह हमारे हाथ में है। अगर रस मौजूद हो और आंख फोड़ डाली जाये तो हम सपने देखने लगेंगे, और सपने बाहर के संसार से ज्यादा प्रीतिकर हैं। क्योंकि बाहर का संसार तो बाधा भी डालता है। सपने हमारे हाथ का खेल है। हम जितना सुंदर बना सकें, बना लें। और हम जितनी देर उन्हें टिकाना चाहें, टिका लें।

फिर वे सपने की प्रतिमाएं किसी तरह का अवरोध भी उपस्थित नहीं करतीं।बहुत लोग संसार से भयभीत होकर स्वप्न के संसार में प्रविष्ट हो जाते है। जिनको स्वप्न के संसार में प्रविष्ट होना हो, उन्हें आंखें बंद कर लेना बड़ा सहयोगी होगा, क्योंकि खुली आंख सपना देखना बड़ा मुश्किल है।

लेकिन इससे रस विलीन न होगा, रस और प्रगाढ होकर प्रगट होगा।आपके दिन उतने रसपूर्ण नहीं हैं, जितनी आपकी रातें रसपूर्ण हैं। और आपकी जागृति उतनी रसपूर्ण नहीं है, जितने स्वप्न आपके रसपूर्ण है। स्वप्न में आपका मन उन्मुक्त होकर अपने संसार का निर्माण कर लेता है।

स्वप्न में हम सभीस्रष्टा हो जाते हैं और अपनी कल्पना कालोक निर्मित कर लेते हैं। बाहर का जगत थोड़ी बहुत बाधा भी डालता होगा, वह बाधा भी नष्ट हो जाती है।रस परित्याग का अर्थ—इंद्रियों को नष्ट कर देना नहीं है। रस परित्याग का अर्थ है इंद्रियों और चेतना के बीच जो संबंध है, जो बहाव है, जो मूर्छा है, उसे क्षीण कर लेना।

इंद्रियां खबर देती है, वे खबर उपयोगी है। इंद्रियां सूचनाएं लाती हैं, संवेदनाएं लाती हैं बाहर के जगत की, वे अत्यंत जरूरी हैं। उन इंद्रियों से लायी गयी सूचनाओं, संवेदनाओं पर मन की जो गहरी भीतरी आसक्ति है, वह जो मन का रसहै, वह जो मन का ध्यान है, जो मन का उन इंद्रियों से लायी गयी खबरों में डूब जाना है, खो जाना है, वहीं खतरा है।

मन अगर खोये न, चेतना अगर इंद्रियों की लायी हुई सूचनाओं में डूबे न, मालिक बनीरहे, तो त्याग है। इसे ऐसा समझें, इंद्रियां जब मालिक होती है चेतना की, और चेतना अनुसरण करती है इंद्रियों की, तो भोग है।

और जब चेतना मालिक होती है इंद्रियों की, और इंद्रियां अनुसरण करती हैं चेतना का, तो त्याग है।मैं मालिक बना रहूं इंद्रियां मेरी मालिक न हो जायें। इंद्रियां जहां मुझे ले जाना चाहें, वहां खींचने न लगें; मैं जहां जाना चाहूं जा सकूं।

और मै जहां जाना चाहूं वहां जाने वाले रास्ते पर इंद्रियां मेरी सहयोगी हों।रास्ता मुझे देखना हो तो आंख देखे, ध्वनि मुझे सुननी हो तो कान ध्वनि सुने,मुझे जो करना हो इंद्रियां उसमें मुझे सहयोगी हो जायें, इंस्ट्रूमेंटल हों—यही उनका उपयोग है।

महावीर वाणी,
भाग 1,
प्रवचन 24

ओशो।

osho अहंकार आत्मबोध का आभाव है। आत्म स्मरण का आभाव है। अहंकार अपने को न जानने का दूसरा नाम है। इसलिए अहंकार से मत लड़ों। अहंकार और अंधकार पर्यायवाची है। हां, अपनी ज्योति को जला लो। ध्यान का दीया बन जाओ।

अहंकार आत्मबोध का आभाव है। आत्म स्मरण का आभाव है। अहंकार अपने को न जानने का दूसरा नाम है। इसलिए अहंकार से मत लड़ों। अहंकार और अंधकार पर्यायवाची है। हां, अपनी ज्योति को जला लो। ध्यान का दीया बन जाओ।

भीतर एक जागरण को उठा लो। भीतर सोए-सोए न रहो। भीतर होश को उठा लो। और जैसे ही होश आया,चकित होओगे, हंसोगे—अपने पर हंसोगे। हैरान होओगे।

एक क्षण को तो भरोसा भी न आएगा कि जैसे ही भीतर होश आया वैसे ही अहंकार नहीं पाया जाता है। न तो मिटाया,न मिटा,पाया ही नहीं जाता है।इसलिए मैं तुम्हें न तो सरल ढंग बता सकता हूं। न कठिन; न तो आसान रास्ता बतासकता हूं, न खतरनाक; न तो धीमा, न तेज। मैं तो सिर्फ इतना ही कह सकता हूं:

जागों और जागने को ही मैं ध्यान कहता हूं।आदमी दो ढंग से जी सकता है। एक मूर्च्छित ढंग है, जैसा हम सब जीते है। चले जाते है। यंत्रवत,किए जाते है काम यंत्रवत, मशीन की भांति। थोड़ी सी परत हमारे भीतर जागी है।

अधिकांश हमारा अस्तित्व सोया पडा है। और वह जो थोड़ी सी परत जागी। वह भी न मालूम कितनी धूल ध्वांस, कितने विचारों, कितनी कल्पनाओं, कितने सपनों में दबी है।सबसे पहला काम है; वह जो थोड़ा सी हमारेभीतर जागरण की रेखा है।

उसे सपनों से मुक्त करो, उसे विचारों से शून्य करो। उसे साफ करो, निखारों,धोआ,पखारो। और जैसे ही वह शुद्ध होगी वैसे ही तुम्हारे हाथ में कीमिया लग जाएगी। राज लग जाएगा।

कुंजी मिल जाएगी। फिर जोतुमने उसे थोड़ी सी पर्त के साथ किया है। वहीं तुम्हें उसके नीचे की पर्त केसाथ करना है। फिर से नीचे की पर्त, फिर और नीचे की पर्त….।

धीरे-धीरे तुम्हारा अंत जगत पूरा का पूरा आलोक से,आभा से मंडित हो जाएगा। एक ऐसी घड़ी आती है। जब भीतर अलोक होता है। और जहां आलोक हुआ भीतर। अंधकार नहीं पाया जाता है। अंधकार नहीं अंहकार नहीं।–

    ओशो

osho महावीर ने कहा है, मेरे चार तीर्थ हैं। श्रावक का, श्राविका का; साधु का, साध्वी का। लेकिन पहले उन्होंने कहा, श्रावक का, श्राविका का। श्रावक का अर्थ है, जो सुनकर पहुंच जाए।

महावीर ने कहा है, मेरे चार तीर्थ हैं। श्रावक का, श्राविका का; साधु का, साध्वी का। लेकिन पहले उन्होंने कहा, श्रावक का, श्राविका का। श्रावक का अर्थ है, जो सुनकर पहुंच जाए।

साधु का अर्थ है, जो सुनकर न पहुंच सके, सुनना जिसे काफी न पड़े जिसे कुछ और करना पड़े। साधुओं ने हालत उल्टी बना दी है।

साधु कहते हैं कि साधु श्रावक से ऊपर है। ऊपर होता तो महावीर उसकी गणना पहले करते। तो उसे प्रथम रखते। महावीर कहते हैं,

ऐसे हैं कुछ धन्यभागी, जो केवल सुनकर पहुंच जाते हैं। जिन्हें कुछ और करना नहीं पड़ता। करना तो उन्हें पड़ता है जो सुनकर समझ नहीं पाते।

तो करनेवाला सुनने से दोयम है, नंबर दो है।इसे समझना।बुद्ध कहते थे, ऐसे घोड़े हैं कि जिनको मारो तो ही चलते हैं। ऐसे भी घोड़े हैं कि कोड़े की फटकार देखकर चलते हैं,

मारनेकी जरूरत नहीं पड़ती। ऐसे भी घोड़े हैं कि कोड़े की छाया देखकर चलते हैं। फटकारने की भी जरूरत नहीं पड़ती।

श्रावक को सुनना काफी है। उतना ही जगा देता है। तुमने किसी को पुकारा, कोई जग जाता है। पर किसी को हिलाना पड़ता है। किसी के मुंह पर पानी फेंकना पड़ता है।

तब भी वह करवट लेकर सो जाता है। श्रावक है वह, जिसने सुनी पुकार और जाग गया। साधु है वह, जो करवट लेकर सो गया।

जिसको हिलाओ, शोरगुल मचाओ, आंखों पर पानी फेंको। श्रवण--सम्यक-श्रवण--सुधी व्यक्ति के लिए पर्याप्त है। इशारा बहुत है बुद्धिमान को।

जिन-सूत्र, भाग-२, प्रवचन#१, ओशो

osho धन—पद की जरूरत है भोगने के लिए। बिना धन के भोगोगे कैसे? बिना धन के अच्छी स्त्री भी न पा सकोगे।

धन—पद की जरूरत है भोगने के लिए। बिना धन के भोगोगे कैसे? बिना धन के अच्छी स्त्री भी न पा सकोगे।

बिलकुल निर्धन हुए तो स्त्री भी न पा सकोगे। स्त्रियां आमतौर से धन में उत्सुक होती हैं।यह तुमने खयाल किया। धनी को सुंदरतम स्त्री मिल जाती है।

चाहे धनी सुंदर न हो। नाभी हो धनी, तो भी युवा स्त्री मिल जाती है। ओनासिस को जैकी मिल जाती है। धन हो! तो थोड़ा सोचने जैसा है कि स्त्रीको धन में इतनी उत्सुकता क्या है? स्त्री काम है।

धन के बिना काम के खिलने की सुविधा नहीं। धन तो ऐसे ही है जैसे पौधे में पड़ी खाद है। बिना खाद के फूल न खिल सकेगा।

इसलिए स्त्री की सहज आकांक्षा धन की है। वह बलशाली आदमी को खोजती है, महत्वाकाक्षी को खोजती है, धनी को खोजती है, पद वाले को खोजती है। स्त्री सीधे—सीधे चेहरे पर नहीं जाती। चेहरे —मोहरे से स्त्री बहुत हिसाब नहीं रखती।

इसलिए कभी—कभी आश्चर्य होता है, सुंदरतम स्त्री कुरूप आदमी को खोज लेती है। मगर उसकी जेबें भरी होंगी। वहबड़े पद पर होगा। राष्ट्रपति होगा। प्रधानमंत्री होगा।

सुंदर स्त्री की आकांक्षा बड़े गहरे में अर्थ की है, क्योंकि वह जानती है अगर अर्थ होगा, तो ही वह खिल पाएगी, तो ही उसका सौंदर्य निखर पाएगा। धन सुविधा है।पुरुष की आकांक्षा काम की है।

पुरुष अर्थ है। इसे तुम समझो।पुरुष महत्वाकांक्षा है, वह अर्थ है। वह धन तो कमा सकता है, धन तो उसकी मुट्ठीकी बात है, हाथ का मैल है, लेकिन सुंदर स्त्री को कैसे कमाएगा?

सुंदर स्त्री तो हो तो हो, न हो तो सौंदर्य को पुरुष पैदा नहीं कर सकता। इसलिए उसकी नजर सौंदर्य पर है। सुंदर स्त्री हो, तो वह और तेजी से दौड़कर कमाएगा।

एस धम्मो सनंतनो–भाग–6(ओशो)

જીવનનો રોગ છે આ, કોઇ પણ ઉપચાર માગે છે, દવા મળતી નથી તો મોત પણ બીમાર માગે છે.

જીવનનો રોગ છે આ, કોઇ પણ ઉપચાર માગે છે,

દવા મળતી નથી તો મોત પણ બીમાર માગે છે.

ખુદા, મારી દુઆને પણ તું એ કક્ષામાં દાખલ કર,

સુણ્યું છે તારો દરવાજે ઘણાં દાતાર માગે છે.

કહો દુઃખનો સમય કઇ રીતે વિતાયો હશે એણે?

જે સુખના કાળમાં પણ આપનો સહકાર માગે છે.

જગતમાં દરબદર ભટકું મને એવી જરુરત શી?

હું જાણું છું કે મારું ભાગ્ય કોના દ્વાર માગે છે.

ન હો જે એકલો એ દર્દ એકલતાનું શું જાણે?

દુઃખી સૌ એટલે અલ્લાહનો આધાર માગે છે?

જરા મારા હ્રદયને તું વફાદારી શિખાવી જા,

જગતમાં એ બધાની પાસ તારો પ્યાર માગે છે.

કયામતમાં ખુદા, તું ન્યાય એનો સૌ પ્રથમ કરજે,

જગતમાં જે અધીરા થઇ જીવનનો સાર માગે છે.

ઉગારો એમને પણ જીન્દગીની શુષ્કતામાંથી,

ઘણાં લોકો બિચારાં રણમાં તારણહાર માગે છે.

ભલા એ લોક તો હમદર્દ મારાં શું બની શકશે?

જે મારી પાસ ખુદનાં દર્દના ઉપચાર માગે છે.

બનાવે હમસફર મારા ખુદા એ લોકને બેફામ,

દુઆમાં જેઓ મારા માર્ગ માટે ખાર માગે છે.

- બરકત વિરાણી ‘બેફામ’

Osho कोई अपना नहीं है, यह इतना बड़ा सत्य है कि इससे लड़ना मत। यही तो दुर्दशा है साधारण जन की, जो नहीं हो सकता उसे करने की चेष्टा करता है;

कोई अपना नहीं है, यह इतना बड़ा सत्य है कि इससे लड़ना मत। यही तो दुर्दशा है साधारण जन की, जो नहीं हो सकता उसे करने की चेष्टा करता है;

जो हो सकता है, मात्रनिर्णय लेने से जो हो सकता है, उसकी चेष्टा नहीं करता।कितनी बार तुम सबको नहीं लगा है कि कितने अकेले हो, मगर फिर-फिर तुमने अपने को भुलाने की कोशिश की है! क्यों इतने डरे हो अपने से?

जो भी तुम भीतर हो उसे जानना ही होगा! सुखद-दुखद, कुछ भी हो, अपने स्वरूप से परिचय बनाना ही होगा, क्योंकि उसी परिचय के आधार पर तुम्हारे जीवन के फूल खिलेंगे।देखो! जिनके जीवन के भी फूल खिले हैं,

वेसब किसी न किसी रूप में एकांत की तलाश में चले गए थे। खिल गए फूल, तब लौट आए बाजार में। लेकिन जब फूल खिले नहीं थे–चाहे महावीर, चाहे बुद्ध, चाहे मुहम्मद, चाहे क्राइस्ट–सब चले गए थे, दूर एकांत में। बाहर का एकांत तो भीतर के एकांत की खोज का ही सहारा है।

बाहर का एकांत तो भीतर के एकांत को बनाने के लिए सुविधा जुटा देता है बस। असली एकांत तो भीतर है। लेकिन अगर बाहर भी एकांत हो तो भीतर के एकांत में डूबने में सुविधा मिलती है।

जरूरी नहीं है किकोई भागकर जाए, ठेठ बाजार में भी अकेला हो सकता है।वस्तुत: तुम्हें हर बार लगता है कि अकेले हो, मगर उस अंतर्दृष्टि को तुम पकड़ते नहीं। वह अंतर्दृष्टि तुम्हारा जीवंत सत्य नहीं बन पाती, उलटे तुम उसे झुठलाते हो। तुम कहते हो,’’ कौन कहता है मैं अकेला हूं?

पत्नी है, बच्चे हैं, सब भरा-पूरा है!’’ भीतर तो देखो, पात्र खाली का खाली पड़ा है। ये प्रवचनाएं हैं। इस प्रवचनाओं से जागो!अकेलेपन से लड़कर कभी कोई नहीं जीता।

जीतनेवाले अकेलेपन पर सवार हो गए, उन्होंने अकेलेपन का घोड़ा बना लिया, अकेलेपन को रथ बना लिया, उस पर सवार हो गए। और तब अकेलापन कैवल्य तक पहुंचा देता है, उस परम दशा तक, जिसको भगवान कहें,

परमात्मा कहें, मोक्ष कहें, निर्वाण कहें–उस परम दशा तक पहुंचा देता है। अकेले ही तुम पहचोगे।तो मैं जब तुमसे कहता हूं, अकेलेपन को स्वीकार कर लो,

तो ध्यान रखना, स्वीकार करने का मजा तो तभी होगा जब तुम स्वागत से स्वीकार करोगे। ऐसे बे-मन से कर लिया कि ठीक है, चलो, नहीं होता तो चलो यही कर लेते हैं, तो कुछ भी होगा।

तब तुम्हारे इस बे- मन के पीछे तुम्हारी पुरानी आकांक्षा अभी भी सक्रिय है। तुम कोई न कोई उपाय खोजकर फिर अपने अकेलेपन को भरोगे।

भक्ति सूत्र (नारद) प्रवचन–18