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Thursday, 17 March 2016

osho धन—पद की जरूरत है भोगने के लिए। बिना धन के भोगोगे कैसे? बिना धन के अच्छी स्त्री भी न पा सकोगे।

धन—पद की जरूरत है भोगने के लिए। बिना धन के भोगोगे कैसे? बिना धन के अच्छी स्त्री भी न पा सकोगे।

बिलकुल निर्धन हुए तो स्त्री भी न पा सकोगे। स्त्रियां आमतौर से धन में उत्सुक होती हैं।यह तुमने खयाल किया। धनी को सुंदरतम स्त्री मिल जाती है।

चाहे धनी सुंदर न हो। नाभी हो धनी, तो भी युवा स्त्री मिल जाती है। ओनासिस को जैकी मिल जाती है। धन हो! तो थोड़ा सोचने जैसा है कि स्त्रीको धन में इतनी उत्सुकता क्या है? स्त्री काम है।

धन के बिना काम के खिलने की सुविधा नहीं। धन तो ऐसे ही है जैसे पौधे में पड़ी खाद है। बिना खाद के फूल न खिल सकेगा।

इसलिए स्त्री की सहज आकांक्षा धन की है। वह बलशाली आदमी को खोजती है, महत्वाकाक्षी को खोजती है, धनी को खोजती है, पद वाले को खोजती है। स्त्री सीधे—सीधे चेहरे पर नहीं जाती। चेहरे —मोहरे से स्त्री बहुत हिसाब नहीं रखती।

इसलिए कभी—कभी आश्चर्य होता है, सुंदरतम स्त्री कुरूप आदमी को खोज लेती है। मगर उसकी जेबें भरी होंगी। वहबड़े पद पर होगा। राष्ट्रपति होगा। प्रधानमंत्री होगा।

सुंदर स्त्री की आकांक्षा बड़े गहरे में अर्थ की है, क्योंकि वह जानती है अगर अर्थ होगा, तो ही वह खिल पाएगी, तो ही उसका सौंदर्य निखर पाएगा। धन सुविधा है।पुरुष की आकांक्षा काम की है।

पुरुष अर्थ है। इसे तुम समझो।पुरुष महत्वाकांक्षा है, वह अर्थ है। वह धन तो कमा सकता है, धन तो उसकी मुट्ठीकी बात है, हाथ का मैल है, लेकिन सुंदर स्त्री को कैसे कमाएगा?

सुंदर स्त्री तो हो तो हो, न हो तो सौंदर्य को पुरुष पैदा नहीं कर सकता। इसलिए उसकी नजर सौंदर्य पर है। सुंदर स्त्री हो, तो वह और तेजी से दौड़कर कमाएगा।

एस धम्मो सनंतनो–भाग–6(ओशो)

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