रस परित्याग का अर्थ अंधापन, बहरापन नहीं है, लेकिन बहुत लोगों ने वैसा अर्थलिया है। ध्यान को इंद्रियों से तोड़ना तो कठिन, इंद्रियों को तोड़ देना बहुत आसान है। आंख जो देखती है, उससे रस को छोड़ना तो कठिन, आंख को फोड़ देना बहुत कठिन नहीं है। किन्हीं ने तो आंखें फोड़ही ली है वस्तुत:। किन्हीं ने धुंधली कर ली है।
आंख बंद करके चलने से कुछ भी नहोगा, क्योंकि आंख बंद करने की जो वृत्ति पैदा हो रही है वह जिस भय से पैदा हो रही है। वह भय त्याग नहीं है।और मन के नियम बहुत अदभुत है। जिससे हम भयभीत होते है, उससे हम बहुत गहरे में प्रभावित भी होते है।
अगर मैं सौंदर्य को देख कर आंख बंद कर लूं तो वह भी सौंदर्य से प्रभावित होना है। उससे यह पता नहीं चलता कि मै सौदर्य की जो वासना थी, उससे मुक्त हो गया।
उससे इतनाही पता चलता है कि सौदर्य की वासना भरपूर है, और मैं इतना भयभीत हूं अपनी वासना से कि भय के कारण मैंने आंख बंद कर ली हैं। लेकिन जिस भय से आंख बंद की है, वह आंख के भीतर चलता रहेगा।
आवश्यक नहीं है कि हम बाहर ही देखें, तभी रूप दिखायी पड़े।अगर रस भीतर मौजूद है तो रस भीतर भी रूप को निर्मित कर लेता है। रूप निर्मित होजाते है, कल्पना निर्मित हो जाती है। औरबाहर तो जगत इतना सुंदर कभी भी नहीं है जितना हम भीतर निर्मित कर सकते हैं।
जोस्वप्न का जगत है, वह हमारे हाथ में है। अगर रस मौजूद हो और आंख फोड़ डाली जाये तो हम सपने देखने लगेंगे, और सपने बाहर के संसार से ज्यादा प्रीतिकर हैं। क्योंकि बाहर का संसार तो बाधा भी डालता है। सपने हमारे हाथ का खेल है। हम जितना सुंदर बना सकें, बना लें। और हम जितनी देर उन्हें टिकाना चाहें, टिका लें।
फिर वे सपने की प्रतिमाएं किसी तरह का अवरोध भी उपस्थित नहीं करतीं।बहुत लोग संसार से भयभीत होकर स्वप्न के संसार में प्रविष्ट हो जाते है। जिनको स्वप्न के संसार में प्रविष्ट होना हो, उन्हें आंखें बंद कर लेना बड़ा सहयोगी होगा, क्योंकि खुली आंख सपना देखना बड़ा मुश्किल है।
लेकिन इससे रस विलीन न होगा, रस और प्रगाढ होकर प्रगट होगा।आपके दिन उतने रसपूर्ण नहीं हैं, जितनी आपकी रातें रसपूर्ण हैं। और आपकी जागृति उतनी रसपूर्ण नहीं है, जितने स्वप्न आपके रसपूर्ण है। स्वप्न में आपका मन उन्मुक्त होकर अपने संसार का निर्माण कर लेता है।
स्वप्न में हम सभीस्रष्टा हो जाते हैं और अपनी कल्पना कालोक निर्मित कर लेते हैं। बाहर का जगत थोड़ी बहुत बाधा भी डालता होगा, वह बाधा भी नष्ट हो जाती है।रस परित्याग का अर्थ—इंद्रियों को नष्ट कर देना नहीं है। रस परित्याग का अर्थ है इंद्रियों और चेतना के बीच जो संबंध है, जो बहाव है, जो मूर्छा है, उसे क्षीण कर लेना।
इंद्रियां खबर देती है, वे खबर उपयोगी है। इंद्रियां सूचनाएं लाती हैं, संवेदनाएं लाती हैं बाहर के जगत की, वे अत्यंत जरूरी हैं। उन इंद्रियों से लायी गयी सूचनाओं, संवेदनाओं पर मन की जो गहरी भीतरी आसक्ति है, वह जो मन का रसहै, वह जो मन का ध्यान है, जो मन का उन इंद्रियों से लायी गयी खबरों में डूब जाना है, खो जाना है, वहीं खतरा है।
मन अगर खोये न, चेतना अगर इंद्रियों की लायी हुई सूचनाओं में डूबे न, मालिक बनीरहे, तो त्याग है। इसे ऐसा समझें, इंद्रियां जब मालिक होती है चेतना की, और चेतना अनुसरण करती है इंद्रियों की, तो भोग है।
और जब चेतना मालिक होती है इंद्रियों की, और इंद्रियां अनुसरण करती हैं चेतना का, तो त्याग है।मैं मालिक बना रहूं इंद्रियां मेरी मालिक न हो जायें। इंद्रियां जहां मुझे ले जाना चाहें, वहां खींचने न लगें; मैं जहां जाना चाहूं जा सकूं।
और मै जहां जाना चाहूं वहां जाने वाले रास्ते पर इंद्रियां मेरी सहयोगी हों।रास्ता मुझे देखना हो तो आंख देखे, ध्वनि मुझे सुननी हो तो कान ध्वनि सुने,मुझे जो करना हो इंद्रियां उसमें मुझे सहयोगी हो जायें, इंस्ट्रूमेंटल हों—यही उनका उपयोग है।
महावीर वाणी,
भाग 1,
प्रवचन 24
ओशो।
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