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Sunday, 3 April 2016

મારું પાછળ ફરીને જોવું ! ને તારું પાછળ પાછળ આવવું

મારું પાછળ ફરીને જોવું !
ને તારું પાછળ પાછળ આવવું !

આ રોજના રૂટીનમાં વાત કંઈ જામતી નથી !

ને કંઇક ખૂટે છે એવો ભાસ થયા કરે છે !

માટે તું એમ કર !!

તું ચાલ મારી સાથે સંગાથે !
સંબંધોમાં જોડતા પહેલા જ આમ આગળ પાછળ ન થવાય !

અને હા એમ પણ ખરું કે.....
સંબંધોમાં આમ પણ જીવ રેડાય !

એ મરવાના વાંકે જીવી રહ્યા છે એ માટે ન રડાય !

સંબંધોને જીવતા રાખવાનો બોજો માથે લઇ ન ફરાય !!!

તેથી જ કહું છુ તું હરણફાળ ભરી ચાલ મારી સાથે સંગાથે !

પછી આપણે આગળ પણ
જોઈશું !

ને પાછળ પણ જોઈશું !
પણ સાથે સંગાથે !

एक फ्रेंच खोजी, इजिप्त के पिरामिडों मेंदस वर्षों तक खोज करता रहा है। उस आदमी कानाम है—बोविस। वह एक वैज्ञानिक और इंजीनियर है। वह यह देखकर बहुत हैरान हुआकि कभी—कभी पिरामि

एक फ्रेंच खोजी, इजिप्त के पिरामिडों मेंदस वर्षों तक खोज करता रहा है। उस आदमी कानाम है—बोविस। वह एक वैज्ञानिक और इंजीनियर है। वह यह देखकर बहुत हैरान हुआकि कभी—कभी पिरामिड में कोई चूहा भूल से या बिल्ली घुस जाती है और फिर निकल नहीं पाती—भटक जाती और मर जाती है।

पर पिरामिड के भीतर जब भी कोई चूहा या बिल्ली या कोई प्राणी मर जाता है तो सड़ता नहीं। सड़ता नहीं, उसमें से दुर्गंध नहीं आती। वह ममीफाइड हो जाता है— सूख जाता है, सडता नहीं।यह हैरानी की घटना है और बहुत अदभुत है। पिरामिड के भीतर इसके होने का कोई कारण नहीं है। और ऐसे पिरामिड के भीतर जो कि समुद्र के किनारे हैं जहां कि ह्युमिडिटी काफी है, जहां कि कोई भी चीज सड़नी ही चाहिये, और जल्दी सड़ जानी चाहिये, उन पिरामिड के भीतर भी कोई मर जाएतो सड़ता नहीं।

मांस ले जाकर रख दिया जाए तो सूख जाता है, दुर्गंध नहीं देता। मछली डाल दी जाए तो सूख जाती है, सड़ती नहीं। तो बहुत चकित हो गया। इसका तो कोई कारण दिखाई नहीं पड़ता। बहुत खोजबीन की। आखिर यह खयाल में आना शुरू हुआ कि शायद पिरामिड का जो शेप है, वही कुछ कर रहा है।

लेकिन शेप, आकार कुछ कर सकता है! सब खोज केबाद कोई उपाय नहीं था। दस साल की खोज के बाद बोविस को खयाल आया कि कहीं पिरामिड का जो शेप, जो आकृति है, वह तो कुछ नहीं करती! तो उसने एक छोटा पिरामिड माडल बनाया—छोटा सा, तीन—चार फीट का बेस लेकर, और उसमें एक मरी हुई बिल्ली रख दी। वह चकित हुआ, वह ममीफाइड हो गई, वह सड़ी नहीं।

तब तो एक बहुत नये विज्ञान का जन्म हुआ, और वह नया विज्ञान कहता है—ज्यामिट्री की जो आकृतियां हैं उनका जीवन ऊर्जाओं से बहुत संबंध है। और अब बोविस की सलाह पर यह कोशिश की जा रही है कि सारी दुनिया के अस्पताल पिरामिड की शक्ल में बनाये जाएं। उनमें मरीज जल्दी स्वस्थ होगा।

आपने सर्कस के जोकर को, हंसोड़े को जो टोपीलगाये देखा है, वह फूल्स कैप कहलाती है। उसी की वजह से कागज—जितने कागज से वह टोपी बनती है, वह फूल्स कैप कहलाता है। लेकिन बोविस का कहना है कि कभी दुनिया के बुद्धिमान आदमी वैसी टोपी लगाते थे। वह वाइज—कैप है, क्योंकि वह टोपी पिरामिड के आकार की है। और अभी बोविस ने प्रयोग किये हैं, फूल्स कैप के ऊपर।

और उसका कहनाहै कि जिन लोगों को भी सिरदर्द होता है, वे पिरामिड के आकार की टोपी लगाएं तत्क्षण उनका सिरदर्द दूर हो सकता है। जिनको भी मानसिक विकार हैं वे पिरामिड केआकार की टोपी लगाएं उनके मानसिक विकार दूर हो सकते हैं।

अनेक चिकित्सालयों में जहां मानसिक चिकित्सा की जाती है, बोविस की टोपी का प्रयोग किया जा रहा है, और प्रमाणित हो रहा है कि वह ठीक कहता है।

महावीर वाणी, भाग-१,
प्रवचन#३,
ओशो

सेक्स इतना बुरा नहीं है जितना सेक्स का चिंतन बुरा हैजो व्यक्ति चिंता नहीं करता, अतीत की स्मृतियों में नहीं डूबा रहता, भविष्य कीकल्पनाओं में नहीं डूबा रहता, जीता है अभी और यहीं वर्तमान में…इसका यह मतलब नहीं है कि आपको कल सुबह ट्रेन से जाना होतो आज टिकिट नहीं खरीदेंगे। लेकिन कल की टिकिट खरीदनी आज का ही काम है।

सेक्स इतना बुरा नहीं है जितना सेक्स का चिंतन बुरा हैजो व्यक्ति चिंता नहीं करता, अतीत की स्मृतियों में नहीं डूबा रहता, भविष्य कीकल्पनाओं में नहीं डूबा रहता, जीता है अभी और यहीं वर्तमान में…इसका यह मतलब नहीं है कि आपको कल सुबह ट्रेन से जाना होतो आज टिकिट नहीं खरीदेंगे। लेकिन कल की टिकिट खरीदनी आज का ही काम है।

लेकिन आज ही कल की गाड़ी में सवार हो जाना खतरनाक है। और आज ही बैठकर कल की गाड़ी पर क्या-क्या मुसीबतें होंगी और कल की गाड़ी पर बैठकर क्या-क्या होने वाला है, इस सबके चिंतन में खो जाना खतरनाक है।नहीं, सेक्स इतना बुरा नहीं है जितना सेक्स का चिंतन बुरा है। सेक्स तो सहज, प्राकृतिक घटना भी हो सकती है, लेकिन उसका चिंतन बड़ा अप्राकृतिक और पर्वर्जन है, वह विकृति है।

एक आदमी सोच रहा है, सोच रहा है, योजनाएं बना रहा है, चौबीस घंटे सोच रहा है। और कई बार तो ऐसा हो जाता है, होता है, मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि सैकड़ों-हजारों लोगों के अनुभवों के बाद यह पता चलता है कि आदमी मानसिक यौन में इतना रस लेने लगता है कि वास्तविक यौन में उसे रस ही नहीं आता, फिर वह फीका मालूम पड़ता है। चित्त में ही जो यौन चलता है वही ज्यादा रसपूर्ण और रंगीन मालूम पड़ने लगता है।

चित्त में यौन की इस तरह से व्यवस्था हो जाये तो हमारे भीतर कंफ्यूजन पैदा होता है। चित्त का काम नहीं है यौन। गुरजिएफ कहा करता था कि जो लोग यौन के केंद्र का काम चित्त के केंद्र से करने लगते हैं, उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। होगी ही, क्योंकि उन दोनों के काम अलग हैं।

अगर कोई आदमी कान से भोजन करने की कोशिश करने लगे तो कान तो खराब होगा ही और भोजन भी नहीं पहुंचेगा। दोनों ही उपद्रव हो जाएंगे।व्यक्ति के शरीर में हर चीज का सेंटर है। चित्त काम का सेंटर नहीं है। काम का सेंटर मूलाधार है। मूलाधार को अपना काम करने दें। लेकिन चित्त को, चेतना को, अभी उस काम में मत लगायें, अन्यथा चेतना उस काम से ग्रस्त, आबसेस्ड हो जाएगी।

इसलिए आदमी आबसेस्ड दिखायी पड़ता है। वह नंगी तस्वीरें देख रहा है बैठकर, और मूलाधार को नंगी तस्वीरों से कोई भी संबंध नहीं है। उसके पास आंख भी नहीं है। आदमी नंगी तस्वीरें देख रहा है, यह मन से देख रहा है। और मन में तस्वीरों का विचार कर रहा है, योजनाएं बना रहा है, कल्पनाएं कर रहा है, रंगीन चित्र बना रहा है। यह सब के सब मिल कर उसके भीतर सेंटर का कंफ्यूजन पैदा कर रहे हैं। मूलाधार का काम चित्त करने लगेगा, पर मूलाधार तो चित्त का काम नहीं कर सकता है।

बुद्धि भ्रष्ट होगी, चित्त भ्रमित होगा, विक्षिप्त होगा।पागलखाने में जितने लोग बंद हैं उनमें सेनब्बे प्रतिशत लोग चित्त से यौन का काम लेने के कारण पागल हैं। पागलखानों के बाहर भी जितने लोग पागल हैं, अगर उनके पागलपन का हम पता लगाने जायें तो हमें पता चलेगा कि उसमें भी नब्बे प्रतिशत यौनके ही कारण हैं। उनकी कविताएं पढ़ें तो यौन, उनकी तस्वीरें देखें तो यौन, उनकी पेंटिंग्स देखें तो यौन, उनका उपन्यास देखें तो यौन, उनकी फिल्म देखने जायें तो यौन, उनका सब कुछ यौन से घिर गया है। आब्सेशन है यह, यह पागलपन है।

अगर पशुओं को भी हमारे संबंध में पता होगा तो वे भी हम पर हंसते होंगे कि आदमी को क्या हो गया है? अगर हमारी कविताएं वे पढ़ें, भले ही कालिदास की हों, तो पशुओं को बड़ी हैरानी होगी कि इन कविताओं की जरूरत क्या है? इनका अर्थ क्या है? वे हमारे चित्र देखें, चाहे पिकासो के हों, तो उन्हें बड़ी हैरानी होगी कि इन चित्रों कामतलब क्या है? ये स्त्रियों के स्तनों कोइतना चित्रित करने की कौन-सी आवश्यकता है? क्या प्रयोजन है?आदमी जरूर कहीं पागल हो गया है। पागल इसलिए हो गया है कि जो काम मूलाधार का है, सेक्स-सेंटर का है, उसे वह इंटलेक्ट से ले रहा है।

इसलिए इंटलेक्ट से जो काम लिया जा सकता था, उसका तो समय ही नहीं बचता है।बुद्धि परमात्मा की तरफ यात्रा कर सकती है, लेकिन वह मूलाधार का काम कर रही है। चेतना परम जीवन का अनुभव कर सकती है, लेकिन चेतना सिर्फ फैंटेसीज में जी रही है, सेक्सुअल फैंटेसीज में जी रही है, वह सिर्फ यौन के चित्रों में भटक रही है।इसलिए मैंने कहा, अतीत का मत सोचें, भविष्य का मत सोचें। सेक्स के संबंध में तो बिलकुल ही नहीं। अभी जीयें और जितना सेक्स पल में आ जाता हो उसे आने दें, घबरायें मत, लेकिन उस यौन के समय में भी जो मैंने ऊर्ध्वगमन की यात्रा की बात कही, अगर उसका थोड़ा स्मरण करें तो बहुत शीघ्र उस शक्ति का ऊपर प्रवाह शुरू हो जाता है। और जैसी धन्यता उस प्रवाह में अनुभव होती है वैसी जीवन में और कभी अनुभव नहीं होती।

ज्यों की त्यों रख दीन्हि चदरिया
ओशो

શું થાય જો હું મૃત્યુ પામું તો ?

શું થાય જો હું મૃત્યુ પામું તો ?
    થોડા હાયકારા,
    થોડા ડચકારા,
    થોડા હાશકારા

પણ થાય...કોઈક ખાય દયા,               કોઈ કહે હાશ!
ગયા!શું થાય
જો હું મૃત્યુ પામું તો?

ઇલેક્ટ્રિક ભઠ્ઠીની તપત,
થોડા કલાકોની રમત,
થોડા દિવસોની મમત.
જો હું મૃત્યુ પામું,

જન્મારાનો થાક ઉતારું,
બ્રેક લઉં માયામાંથી,

બાય બાય કહું બધાં બંધનોનેઅંતરમાં ભરી સઘળાં સ્વજનોને.
જો હું મૃત્યુ પામું તો

વર્ષોની વેદના, જીવનની ખેવના -
આ બધાને મળે જાકારોપણ મૃત્યુનો ક્યાં થાય છે વરતારો?

- નિયતિ

કરવા દે થોડી ધમાલ-મસ્તી, તો મારે ફરીબાળક બનવું છે,

કરવા દે થોડી ધમાલ-મસ્તી, તો મારે ફરીબાળક બનવું છે,

હટાવી દે આ જવાબદારીઓ, મારે મારું બાળપણ માણવું છે.

બંધ મુટ્ઠી મા છે કેટલાય સપના, પણ ક્યાં અહી કોઈને જાણવું છે?

બાળપણ મારું જાણે એક રાંઢવું છે, જે બધા ને અહી તાણવૂં છે.

ભણતર નો ટોપલો સૌ ઢોળે માથે, મારે તો જટ નીશાળે થી ભાગવું છે,

દોસ્તોનો વીશ્વાસ, પપ્પા નો ભરોષો, અને મમ્મી નો લાડલો બનવું છે.

આંખ માં છે બે ઘડી ના આંશું, જો તું મનાવે તો ફરી મારે હસવું છે,

એક ચુંબન ને ખોળા મા માથું રાખી હવે મારે સુવું છે.

શીર્ષક : " માણસ" કેવું જીવી ગયો .. જે દી હતો પારણામાં તે દી , રમાડે એમ રમતો ગયો ; ઝાલી આંગળી માવતરની , સીડી જીવનની ચડતો ગયો

શીર્ષક : " માણસ" કેવું જીવી ગયો ..

જે દી હતો પારણામાં તે દી ,
રમાડે એમ રમતો ગયો ;
ઝાલી આંગળી માવતરની ,
સીડી જીવનની ચડતો ગયો ...(૧)

જ્ઞાન માટે નિશાળે ગયો ,
માસ્તર ભણાવે એમ ભણતો ગયો ;
ભણી ગણી પારંગત બની ,
યુવાનીમાં પગ મેલતો ગયો ...(૨)

મૂછે વળ દેતા દેતા ,
છલાંગ ઈ ભરતો ગયો ;
મળે મોકો ગમે ન્યા,
મીઠો ઘા મારતો ગયો ...(૩)

નોકરી કરી ધંધા ઘણા ,
પાર બધું પાડતો ગયો ;
ચાખી સ્વાદ સફળતાનો ,
નશા માં એ ડૂબતો ગયો ...(૪)

સમાજનો એક ભાગ માની ,
કામ બધા ને આવતો ગયો ;
જેવા સાથે તેવા માની ,
વ્યવહાર કુશળ કરતો ગયો ...(૫)

સમય ના વહેણમાં તણાતો તણાતો ,
સમય સાથે બદલાઈ ગયો ;
કોઈ કોઈનું નથી ઈ વાત ને વળગી ,
સ્વાર્થ ના રંગે રંગાઈ ગયો ...(૬)

ખીસું નથી કફનમાં છતાં ,
એજ ખીસાને ખોળતો ગયો ;
ખાલી હાથ જવાનું છતાં ,
બેલેન્સ બધાનું કરતો ગયો ...(૭)

અંતે જડી વેળા એ ઘડપણ ની ,
લાકડીના ટેકે ચાલતો ગયો ;
ઝાલી લીધી હાથમાં માળા ,
પ્રભુનું નામ જપતો ગયો ...(૮)

મળ્યું એકાંત જે દી એને ,
સ્મરણ જીવન નું કરતો ગયો ;
લમણે હાથ દઈ બેસી ખૂણા માં ,
ચોધાર આંસુ એ રડતો ગયો ...(૯)

ભોગવ્યા સુખ જીવન માં બધા ,
ફરજ એક ચુકી ગયો ;
ભગવાન હતા ઘરમાં છતાં ,
સેવા નો અવસર વિસરી ગયો ...(૧૦)

ખોળિયું છોડવા મથે પ્રભુ ને ,
હાથ જોડી કરગરતો ગયો ;
વિચારે છે કવિ આજે ,
"માણસ " કેવું જીવન જીવી ગયો ...(૧૧)

અહીંથી આવ-જા કરતા બધા બસ રાહદારી છે,

અહીંથી આવ-જા કરતા બધા બસ રાહદારી છે,

અહીં દ્વારો વગરનું ઘર અને હજ્જારો બારી છે…

હવે વારાંગનાના બારણાથી પણ વધુ ખુલ્લી,

આ મારી ખુલ્લી છાતી પર સજાવેલી પથારી છે…

છતાં એવી જ નિર્મમતાથી પીડે છે હજુ આજે,

ગયા ભવમાં હતી જે શોક્ય આ ભવમાં અટારી છે…

પ્રતીક્ષાની પીડાઓ તો અ.સૌ. છે ને અ.સૌ. રહેશે,

ભલે એક આંખ વિધવા છે અને બીજી કુંવારી છે…

- મુકુલ ચોકસી