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Saturday, 26 March 2016

जन्म-मृत्यु से परे है जीवनमैं एक शवयात्रा में गया था।जो वहां थे,उनसे मैंने कहायदि यह शवयात्रा तुम्हेंअपनी ही मालूम नहींहोती है,

जन्म-मृत्यु से परे है जीवनमैं एक शवयात्रा में गया था।जो वहां थे,उनसे मैंने कहायदि यह शवयात्रा तुम्हेंअपनी ही मालूम नहींहोती है,

तो तुम अंधे हो।मैं तो स्वयं को अर्थी परबंधा देख रहा हूं।काश! तुम भी ऐसा ही देख सको,तो तुम्हारा जीवन दूसरा हो जावे।जो स्वयं की मृत्यु को जान लेता है,उसकी दृष्टिं संसार से हटकरसत्य पर केंद्रित हो जाती है।

शेखसादी ने लिखा है...बहुत दिन बीते दजला के किनारेएक मुरदे की खोपड़ी नेकुछ बातें एक राहगीर से कहीथीं।

वह बोली थी,'ओ! प्यारे, जरा होश में चल।मैं भी कभी शाही दबदबारखती थीऔर मेरे ऊपर ताज था।फतह मेरे पीछे-पीछे चलीऔर मेरे पैर जमीन पर न पड़ते थे।होश ही न थाकि एक दिन सब समाप्त हो गया।

कीड़े मुझे खा गए हैंऔर हर पैर मुझे ठोकर मार जाता है।तू भी अपने कानों सेगफलत की रुई निकाल डाल,ताकि तुझे मुरदों की आवाज सेउठने वाली नसीहत हासिल हो सके।

'मुरदों की आवाज सेउठने वाली नसीहत क्या है?और, क्या कभी हम उसे सुनते हैं!जो उसे सुन लेता है,उसका जीवन ही बदल जाता है।जन्म के साथ मृत्यु जुड़ी है।उन दोनों के बीच जो है,वह जीवन नहीं,जीवन का आभास ही है।

जीवन वह कैसे होगा,क्योंकि जीवन की मृत्यु नहींहो सकती है!जन्म का अंत है,जीवन का नहीं।और, मृत्यु का प्रारंभ है,जीवन का नहीं।जीवन तो उन दोनों से पार है।

जो उसे नहीं जानते हैं,वे जीवित होकर भी जीवितनहीं हैं।और, जो उसे जान लेते हैं,वे मर कर भी नहीं मरते।

!! ओशो !

अगर एक गांव में एक आदमी भी है, जो जानताहै कि आत्मा अमर है, तो उस गांव का पूरा वातावरण, उस गांव की पूरी की पूरी हवा, उस गांव की पूरी की पूरी जिंदगी बदल जाएगी

अगर एक गांव में एक आदमी भी है, जो जानताहै कि आत्मा अमर है, तो उस गांव का पूरा वातावरण, उस गांव की पूरी की पूरी हवा, उस गांव की पूरी की पूरी जिंदगी बदल जाएगी।

एक छोटा —सा फूल खिलता है और दूर —दूर के रास्तों पर उसकी सुगंध फैल जाती है। एक आदमी भी अगर इस बात को जानता है कि आत्मा अमर है, तो उस एक आदमीका एक गांव में होना पूरे गांव की आत्मा की शुद्धि का कारण बन सकता है।

लेकिन हमारे मुल्क में तो कितने साधु हैं और कितने चिल्लाने और शोरगुल मचानेवाले लोग हैं कि आत्मा अमर है। औरउनकी इतनी लंबी कतार, इतनी भीड़ और मुल्कका यह नैतिक चरित्र और मुल्क का यह पतन!यह साबित करता है कि यह सब धोखेबाज धंधा है।

यहां कहीं कोई आत्मा —वात्माको जानने वाला नहीं है। यह इतनी भीड़, इतनी कतार, इतनी मिलिटरी, यह इतना बड़ा सर्कस साधुओं का सारे मुल्क में —कोई मुंह पर पट्टी बांधे हुए एक तरह का सर्कस कर रहे हैं, कोई डंडा लिये हुए दूसरे तरह का सर्कस कर रहे हैं, कोई तीसरे तरह का सर्कस कर रहे हैं —यह इतनी बड़ी भीड़ आत्मा को जानने वाले लोगों की हो और मुल्क का जीवन इतना नीचे गिरता चला जाए, यह असंभव है।

मैं मृत्यु सिखाता हूं

ओशो

Friday, 25 March 2016

धर्म उदासी नहीं है–नृत्य, उत्सव है।और होली इसका प्रतीक है।इस दिन "ना” पर ''हां” की विजय हुई।धर्म उत्सव है–उदासी नहीं।यह याद रहे। और तुम्हें नाचते हुए,

धर्म उदासी नहीं है–नृत्य, उत्सव है।और होली इसका प्रतीक है।इस दिन "ना” पर ''हां” की विजय हुई।धर्म उत्सव है–उदासी नहीं।यह याद रहे। और तुम्हें नाचते हुए, परमात्मा के द्वार तक पहुंचना है।

अगर रोओ भी तो खुशी से रोना। अगर आंसू भी बहाओतो अहोभाव के बहाना। तुम्हारा रुदन भी उत्सव का ही अंग हो, विपरीत न हो जाए। थके-मांदे लंबे चेहरे लिए, उदास, मुर्दों की तरह, तुम परमात्मा को न पा सकोगे, क्योंकि यह परमात्मा का ढंग ही नहीं है।

जरा गौर से तो देखो, कितना रंग उसने लिया है! तुम बेरंग होकर भद्दे हो जाओगे। जरा गौर से देखो, कितने फूलों में कितना रंग! कितने इंद्रधनुषों में उसका फैलाव है! कितनी हरियाली में, कैसा चारों तरफ उसका गीत चल रहा है! पहाड़ों में, पत्थरों में, पक्षियों में, पृथ्वी पर, आकाश में–सब तरफ उसका महोत्सव है!

इसे अगर तुम गौर से देखोगे तो तुम पाओगे, ऐसे ही हो जाना उससेमिलने का रास्ता है।गीत गाते कोई पहुंचता है, नाचते कोई पहुंचता है–यही भक्ति का सार है।

भक्ति सूत्र(नारद),
प्रवचन-१६, ओशो

તને હું, તુજમાં ન લાગ્યો તારા જેવો, અને હું, ખુદમાં ન બચ્યો મારા જેવો.

તને હું, તુજમાં ન લાગ્યો તારા જેવો,
અને હું, ખુદમાં ન બચ્યો મારા જેવો.

ચમકે તું ચંદ્ર જેમ, શીતળતા વિખેરે,
જડું હુ આભમાં ખરતા સિતારા જેવો.

ખાલીખમ હું, જો તું ન રહે જીવનમાં,
ફક્ત તું છે જેમાં, હું એ પિટારા જેવો.

તું કોમળ કુંપળ, હજુ તાજી ખીલેલી,
વેઠવો મુશ્કેલ છે જેને હું, ભારા જેવો.

તું છે એક વિજેતા જે કાયમ જ જીતે,
'અખ્તર' છે વ્યર્થ ગયેલા વારા જેવો.

તમારી સૂરમય આંખોનું કાજળ થવું છે મારે..!! ગુલાબી ગાલો પર ઠેહરવા ઝાંકળ થવું છે મારે..!!

તમારી સૂરમય આંખોનું કાજળ થવું છે મારે..!!
ગુલાબી ગાલો પર ઠેહરવા ઝાંકળ થવું છે મારે..!!

પ્રેમના વરસાદમાં જો ક્યારેક પલળો તો,
તો એ વરસાદનું વાદળ  થવું છે મારે..!!

પ્રેમના બંધનમાં રેહવા જો મળે તો,
લાગણીયો રૂપી સાંકળ થવું છે મારે...!!

તમારા ડગલે ડગલે પગલા માંડવા,
હમેસા તમારી પાછળ રેહવું છે મારે..!!

પ્રેમના સહવાસમાં રેહવું છે હમેશા,
નકામી દલીલોમાં ક્યાં આગળ થવું છે મારે..!!

જિંદગીની ગઝલ તો અધુરી છે 'સર્જક'ની,
શબ્દો બનો જો તમે તો કાગળ થવું મારે..!!

Thursday, 24 March 2016

चीन में बड़ी प्रसिद्ध कथा है। एक फकीर की बड़ी ख्याति हो गई। ख्याति हो गई कि वह निर्भय हो गया है। और निर्भयता अंतिम लक्षण है। एक दूसरा फकीर उसके दर्शन को आया। वह फकीर जो

चीन में बड़ी प्रसिद्ध कथा है। एक फकीर की बड़ी ख्याति हो गई। ख्याति हो गई कि वह निर्भय हो गया है। और निर्भयता अंतिम लक्षण है। एक दूसरा फकीर उसके दर्शन को आया। वह फकीर जो निर्भय हो गया था, समस्त भयों से मुक्त हो गया था, बैठा था एक चट्टान पर। सांझ का वक्त, और पास ही सिंह दहाड़ रहे थे।

मगर वह बैठा था शांत, जैसे कुछ भी नहीं हो रहा है। दूसरा फकीर आया, तो सिंहों की दहाड़ सुनकर कंपने लगा, दूसरा फकीर कंपने लगा। निर्भय हो गया फकीर बोला: तो अरे, तो तुम्हें अभी भी भय लगता है! तुम अभी भी भयभीत हो!

फिर क्या खाक साधना की, क्या ध्यान साधा, क्या समाधि पाई! कंप रहे हो सिंह की आवाज से, तोअभी अमृत का तुम्हें दर्शन नहीं हुआ, अभी मृत्यु तुम्हें पकड़े हुए है! उस कंपते फकीर ने कहा कि मुझे बड़ी जोर की प्यास लगीहै, पहले पानी, फिर बात हो सके।

मेरा कंठ सूख रहा है, मैं बोल न सकूंगा।निर्भय हो गया फकीर अपनी गुफा में गया पानी लेने। जब तक वह भीतर गया, उस दूसरे फकीर ने, जहां बैठा था निर्भय फकीर, उस पत्थर पर लिख दिया बड़े—बड़े अक्षरों में: नमो बुद्धाय—बुद्ध को नमस्कार।

आया फकीर पानी लेकर। जैसे ही उसने पैर रखा चट्टान पर, देखा नमो बुद्धाय पर पैर पड़ गया, मंत्र पर पैर पड़ गया; झिझक गया एक क्षण। आगंतुक फकीर हंसने लगा और उसने कहा: डर तो अभी तुम्हारे भीतर भी है।

सिंहसे न डरते हो, लेकिन पत्थर पर मैंने एक शब्द लिख दिया—नमो बुद्धाय, इस पर पैर रखने से तुम कंप गए! भय तो अभी तुम्हें भी है। भय ने सिर्फ रूप बदला है, बाहर से भीतर जा छिपा है, चेतन से अचेतन हो गया है। भय कहीं गया नहीं है।

निर्भय आदमी में भय नहीं जाता, सिर्फ भय नए रूप ले लेता है, निर्भयता का आवरण ओढ़ लेता है। जो व्यक्ति समाधिस्थ होता है, न तो भयभीत होता है, न निर्भय होता है। निर्भय होने के लिए भी भय का होना जरूरी है, नहीं तो निर्भय कैसे होओगे? विरक्त होने के लिए आसक्ति का होना जरूरी है, नहीं तो विरक्त कैसे होओगे?

कहै वाजिद पुकार,
प्रवचन-८,
ओशो

एक बार जरा क्षण भर को ऐसा सोचो कि चौबीस घंटे के लिए सारी कामना छोड़ दो -- सुख की कामना भी छोड़ दो। चौबीस घंटे में कुछ हर्जा नहीं हो जाएगा, कुछ खास नुकसान नहीं हो जाएगा।

एक बार जरा क्षण भर को ऐसा सोचो कि चौबीस घंटे के लिए सारी कामना छोड़ दो -- सुख की कामना भी छोड़ दो। चौबीस घंटे में कुछ हर्जा नहीं हो जाएगा, कुछ खास नुकसान नहीं हो जाएगा।

ऐसे भी इतने दिन वासना कर-कर के क्या मिल गया है? चौबीस घंटे मेरी मानो। चौबीस घंटे के लिए सारी वासनाछोड़ दो। कुछ पाने की आशा मत रखो। कुछ होने की आशा मत रखो।एक क्रांति घट जाएगी चौबीस घंटे में। तुमअचानक पाओगे, जो है, परम तृप्तिदायी है।

जो भी है। रूखी-सूखी रोटी भी बहुत सुस्वादु है, क्योंकि अब कोई कल्पना न रही। अब किसी कल्पना में इसकी तुलना न रही। जैसा भी है, परम तृप्तिदायी है!यह अस्तित्व आनंद ही आनंद से भरपूर है।

पर हम इसके आनंद भोगने के लिए कभी मौका हीनहीं पाते। हम दौड़े-दौड़े हैं, भागे-भागे हैं। हम ठहरते ही नहीं। हम कभीदो घड़ी विश्राम नहीं करते!इस विश्राम का नाम ही ध्यान है। वासना से विश्राम ध्यान है। तृष्णा से विश्राम ध्यान है।

अगर तुम एक घंटा रोज सारी तृष्णा छोड़कर बैठ जाओ, कुछ न करो, बस बैठे रहो -- मस्ती आजाएगी! आनंद छा जाएगा! रस बहने लगेगा!धीरे-धीरे तुम्हें यह बात दिखाई पड़ने लगेगी, जब घंटे भर में रस बहने लगता है, तो फिर इसी ढंग से चौबीस घंटे क्यों न जीएँ?

परम प्यारे ओशो
अरी मैं तो नाम के रंग छकी
प्रवचन 10