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Saturday, 2 April 2016

આંખોમાં તમારી રેહવા પ્રેમના દીવે કાજળ સુધી જવું છે..!!

આંખોમાં તમારી રેહવા પ્રેમના દીવે  કાજળ સુધી જવું છે..!!

ફૂલ કેરા શરીરમાં કોમળ સહવાસ પામવા  ઝાંકળ સુધી જવું છે..!!

દરિયાને   નદીના  મિલન માટે,

સૂર્યના તાપે તપીને વાદળ સુધી જવું છે..!!

તોડે તોડાય ના પ્રેમનો એ સબંધ, બાંધવા મને સાંકળ સુધી જવું છે..!!

એકાંતમાં આંખોમાં આવીને છલકાવ,

ગાલ પર સફર કરવા એ જળ સુધી જવું છે..!!

જે પળ માં તમારી યાદો કૈદ રહે,

યાદ ની દરેક એ પળ સુધી જવું છે..!!

દિલની જમીનમાં પ્રેમનું ધાન ઉગાવવા,

સર્જકને લાગનીયોના એ હળ સુધી જવું છે..!!

વિરહ ની વેદના ની વાત હુ કોને કરુ,

વિરહ ની વેદના ની વાત હુ કોને કરુ,

દિલ પુછે છે દર્દ ની એ વાત કોને કરુ,

હૈયા ની વાત હોઠે આવી ને અટકી જાય છે,

તુ જ નથી અહીં તો પછી સાદ કોને કરુ,

પડઘા બની ને શબ્દો મારા પાછા આવે છે,

પ્રેમ ની સજા જુદાઇ પછી યાદ હુ કોને કરુ,

પાગલ સમજી ને મજાક ઉડાવે છે સૌ મારી,

તારુ જ દિધેલુ દર્દ છે ફરીયાદ હુ કોને કરુ..?

अ-मन तो यदि तुम इस संसार में सफल होना चाहते हो, तो पुरुष मन चाहिए। यदि तुम भीतर के संसार में सफल होना चाहते हो, तो स्त्रैण मन चाहिए। लेकिन वह केवल शुरुआत है, स्त्रैण मन

अ-मन

तो यदि तुम इस संसार में सफल होना चाहते हो, तो पुरुष मन चाहिए। यदि तुम भीतर के संसार में सफल होना चाहते हो, तो स्त्रैण मन चाहिए। लेकिन वह केवल शुरुआत है, स्त्रैण मन

केवल एक शुरुआत है। वह अ-मन की ओर जाने की एक सीडी है। असली बात यही है. पुरुष मन स्त्रैण मन की अपेक्षा थोड़ा ज्यादा दूर है अ-मन से। इसीलिए स्त्रैण मन रहस्यमय मालूम पड़ता है।

असल में तुम किसी स्त्री को जीवन भर प्रेम कर सकते हो, लेकिन तुम कभी उसे समझ न पाओगे। वह एक रहस्य ही बनी रहेगी। उसके व्यवहार के संबंध में कोई भविष्यवाणी नहीं हो सकती। वह विचारों की अपेक्षा भाव दशाओं से अधिक जीती है। वह मौसम की भांति अधिक है यंत्र की भांति कम। सुबह बदलियां छाई होती हैं और दोपहर बदलियां छंट जाती हैं और धूप निकल आती है। स्त्री को प्रेम करके देखो और तुम जान जाओगे। सुबह बादल घिरे होते हैं और वह उदास होती है, और शीघ्र ही, प्रत्यक्ष में कुछ खास हुआ भी नहीं होता, और बादल छंट जाते हैं और फिर धूप निकल आती है और वह गुनगुना रही होती है।

पुरुष के लिए बिलकुल बेबूझ है यह बात। क्या क्या बेतुकी बातें चलती रहती हैं स्त्री में? हां, तुम्हें बेतुकी लगती हैं क्योंकि पुरुष के लिए चीजों की तर्कसंगत व्याख्या होनी चाहिए।’क्यों उदास हो तुम?’ तो स्त्री सरलता से कह देती है, ‘बस मुझे उदासी पकड़ती है।’ पुरुष यह बात नहीं समझ सकता। कोई कारण होना चाहिए उदास होने का। बस, ऐसे ही उदास हो जाना? ‘तुम खुश क्यों हो?’ स्त्री कहती है, ‘बस वह खुशी अनुभव कर रही है।’ वह भाव दशाओं द्वारा जीती है।

निश्चित ही, पुरुष के लिए कठिन है स्त्री के साथ जीना। क्यों? क्योंकि यदि चीजें तर्कसंगत हों, तो चीजें संभाली जा सकती हैं। यदि चीजें एकदम बेबूझ हों चीजें अनायास, अकारण आ जाएं और चली जाएं तो कोई तालमेल बिठाना बहुत कठिन हो जाता है। कोई पुरुष कभी किसी स्त्री के साथ तालमेल नहीं बैठा पाया। अंततः वह समर्पण कर देता है, अंततः वह तालमेल बैठाने का पूरा प्रयास ही छोड़ देता है।

पुरुष मन ज्यादा दूर है अ-मन से; वह ज्यादा यंत्रवत है, ज्यादा तर्कपूर्ण है, ज्यादा बौद्धिक है; सिर में ज्यादा जीता है। स्त्रैण मन ज्यादा निकट है, ज्यादा स्वाभाविक है, ज्यादा अतार्किक है; हृदय के ज्यादा निकट है। और हृदय से नीचे नाभि में उतरना कहीं ज्यादा आसान है जहां कि अ-मन का अस्तित्व है।

पतंजलि योगसूत्र 

ओशो 

मजनू की कहानीलैला को उसका पिता लेकर भाग गया है। प्रेमियों से ये पिता बहुत ही डरते हैं। वह एकदम भाग गया है लैला को लेकर। मजनू को खबर आई तो वह भागा हुआ गया है।

मजनू की कहानीलैला को उसका पिता लेकर भाग गया है। प्रेमियों से ये पिता बहुत ही डरते हैं। वह एकदम भाग गया है लैला को लेकर। मजनू को खबर आई तो वह भागा हुआ गया है।

एक गांव मेंपड़ाव पड़ा है उसके पिता का। राह के एक किनारे छिप कर वह मजनू प्रतीक्षा करता है। लैला वहां से गुजरी तो उसने पूछा, उसने पूछा कब तक लौटोगी? कब तक आओगी? लैलातो बोल न सकी, पिता पास था और लोग पास थे।
उसने हाथ से इशारा किया कि आऊंगी, जरूर आऊंगी।

जिस वृक्ष के नीचे उसने वायदा किया था, मजनू उसी वृक्ष के नीचे टिक कर खड़ा हो गया।कहते हैं, बारह वर्ष बीत गए और मजनू वहां से नहीं हिला, नहीं हिला, वह खड़ा ही रहा उसी वृक्ष से टिका हुआ। कहते हैं कि धीरे धीरे वह वृक्ष की छाल और मजनू की खाल जुड़ गई। कहते हैं उस वृक्ष का रस उस मजनू के प्राणों और शरीरों में बहने लगा।

कहते हैं उसके हाथ पैर से भी शाखाएं निकल गईं और पत्ते छा गए।और बारह वर्ष बाद लैला उस रास्ते से वापस निकली। उसने वहां पूछा लोगों से कि मजनू नाम का एक युवक था वह दिखाई नहीं पडता, वह कहां है? लोगों ने कहा कैसा मजनू

बारह साल पहले हुआ करता था। बारह साल से तो वह दिखाई नहीं पड़ा इस गांव में। लेकिन ही, कभी—कभी रात के सन्नाटे में उस जंगल से आवाज आती है लैला, लैला, लैला! जंगल से आवाज? लेकिन आदमी हम दिन में जाते हैं, वहां कोई नहीं दिखाई पड़ता,

उस जंगल में कभी कोई आदमी दिखाई नहीं पड़ता, लेकिन कभी—कभी उस जंगल से आवाज आती है। लोग तो डरने लगे उस रास्ते से निकलने में। एक वृक्ष के नीचे ऐसा मालूम पड़ता है कि जैसेकोई है, और कोई है भी नहीं। और कभी कभी वहां से एकदम आवाज आने लगती है लैला, लैला!लैला भागी हुई वहां गई।

वहां तो कहीं मजनूदिखाई नहीं पड़ता, लेकिन एक वृक्ष से आवाजआ रही थी। वह उस वृक्ष के पास गई। मजनू अब वहां नहीं था। वह वृक्ष ही हो गया था, लेकिन उस वृक्ष से आवाज आती थी, लैला, लैला! वह सिर पीट पीट कर उस वृक्ष पर रोने लगी और कहने लगी, पागल! तू वृक्ष से हट क्यों नहीं गया?

वह वृक्ष कहने लगा, प्रतीक्षा कहीं हटती है?प्रेम हमेशा प्रतीक्षा करने को तैयार होता है। सिर्फ सौदेबाज प्रतीक्षा करने को तैयार नहीं होता। वह कहता है जल्दी निपटाइए। प्रेम तो प्रतीक्षा करने को राजी है अनंतकाल तक।

साधनापथ
ओशो

शराब का पहलाअनुभव तो दुखद ही है,

लेकिन शराब के गहरे अनुभव धीरे-धीरे सुखद होने शुरू हो जाते हैं, क्योंकि शराब आपको जगत से तोड़ देती है,जगत की चिन्ताओं से तोड़ देती है।जगत मिट जाता है, आप ही रह जाते हैं। यह बहुत ही मजे की बात है कि ध्यान और शराब में थोड़ा संबंध हैइसलिए विलियम जेम्स ने, जिसने कि इस सदी में धर्म और नशे के बीच संबंध खोजने में सर्वाधिक शोध कार्य किया,विलियम जेम्स ने कहा कि शराब का इतना आकर्षण गहरे में कहीं न कहीं धर्म से संबंधित है,अन्यथा इतना आकर्षण हो नहीं सकता।कहीं न कहीं शराब कुछ ऐसा करती होगी जो मनुष्य की गहरी धार्मिक आकांक्षा को तृप्त करता है—है संबंध। और इसलिए वेद के सोमरस से लेकर एलडूअस हक्सले तक, एल एसडी तक,धार्मिक आदमी का बड़ा हिस्सा नशों का उपयोग करता रहा है—बड़ा हिस्सा। और नशे के उपयोग में कहीं न कहीं कोई तालमेल है।वह तालमेल इतना ही है कि शराब आपको जगत सेतोड़ देती है इस बुरी तरह कि आप बिलकुल अकेले हो जाते हैं।अकेले होने में एक रस है। संसार की सारी चिन्ताएं भूल जाती हैं। आप एक गहरे अर्थ में निश्चिंत मालूम पड़ते हैं। हो तो नहींजाते।शराब तो थोड़ी देर बाद विदा हो जाएगी, चिन्ता वापस लौट आएगी,लेकिन शराब के साथ इस निश्चिंतता का रस जुड़ जाएगा। बस वह एक दफा रस जुड़ गया, फिर आप शराब के नाम से जहर पीते रहेंगे।वह कितना ही तिक्त मालूम पड़े, वह रस जो संयुक्त हो गया। हम विकृत रसों से भी जुड़ जा सकते हैं, और फिर उनकी पुनरुक्ति की मांग शुरू हो जाती है।महावीर वाणी, भाग-१, प्रवचन#१२, ओशो

मैं मृत्यु सिखाता हूं: ओशो

मैं मृत्यु सिखाता हूं: ओशोagyatagyaniमैं मृत्यु सिखाता हूं यहरहस्य 99% लोगो कीसमझ से उपर का विषय है ! ओशो की मृत्यु का रहस्य उसका सम्बन्ध शरीर या आत्मा से नही है! यह पहला रहस्य है ! जो नही है उस मृत्यु को सिखाने का रहस्य है ओशो का ! जिसे हम मैं या मैं हूँ यह समझते है !लेकिन मैं हूँ या नही हूँ या यह हम है तो कौन है ! हमारे होने का जो भ्रम है उस मृत्यु की बाते ओशो करते थे ! यहा पर सब कुछ सत्य है यह शरीर भी सत्य आत्मा भी सत्य है लेकिन यह मन सत्य है या नही है इसे जान लेना या परम को जान लेना एक ही बात है !और ओशो मृत्यु शब्द एक मन की समझ का रूपांतरण का एक मृत्यु शब्द संकेत है !हमारा यह जड़ शरीर मरता है लेकिन यह भी मरता नही है सिर्फ यह शरीर जिससे बना जहा से बना वे तत्व अपनी जगह वापस चले जाते है! शरीर पञ्चतत्व में विलय हो जाता है लेकिन शरीर तत्व भी मरते नही है ! और नही आत्मा मरती जहा से प्राण आये थे वहा वापिस प्राण चले जाते है ! पंचतत्व और चेतना का एक खेल था एक जोड़ था उस खेल की समाप्ति को मृत्यु कहते है! यह मृत्यु आम साधारण की मृत्यु हो गई लेकिन इस मृत्यु के सम्बधं में ओशो ने " मैं मृत्यु सिखाताहूं" इस विषय से कोई तालुकात नही है ! यह मृत्यु के सम्बन्ध से जुडी वह मृत्यु है! शरीर और प्राण परमात्मा का बनाया हुआ खेलहै वही बनाता है वही मिटाता है ! मन का खेलहम बनांते है लेकिन इस खेल को हम बना सकतेहै लेकिन मिटा नहीपाते , हमने मन को बनानासिख लिया है मन को बड़ा करना सिख लिया, मन की माया बनाना सिख लिया, लेकिन हम इस मायाको मिटा नही सकते है ! हमारेद्वारा बनाई मन की माया है जो अपनी ही बनाई माया को मिटा दे वह परम हो जाता है !वह ब्रहम बन जाता है ! जिसने बनना सिखा और मिटना भी सिख लिया वह समझो समस्त उपलब्धियों से विजय हो गया !99.99% लोग बनना चाहते है लेकिन मिटना नही चाहते है इस मन के खेल के लिए शरीर के नियम की तरह मृत्यु होनी आवश्यक है तब इसी शरीर में रह कर मुक्ति.समाधि.दर्शन.परमअनुभूति,मोक्ष .सर्वग की उपलब्धीहोती है इसी मृत्यु में बुद्धत्त्व घटित होता है बह्रमचर्य घटित होता है!

Anmol Vachan In Hindi | प्रेरणादायक अनमोल वचन

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Anmol Vachan In Hindi

प्रेरणादायक अनमोल वचन  :-
1) दान देना ही आमदमी का एकमात्र व्दार है | – स्वामी रामतीर्थ.
2) यदि किसी युवती के दोष जानना हों, तो उसकी सखियों में उसकी प्रशंसा करो | – बेंजामिन फ्रैंकलिन.
3) पैसा आपका सेवक है, यदि आप उनका उपयोग जानते हैं; वह आपका स्वामी है, यदि आप उसका उपयोग नहीं जानते | – होरेस
4) दुसरे के दोष पर ध्यान देते समय हम स्वयं बहुत भले बन जाते हैं | परंतु जब हम अपने दोषों पर ध्यान देंगे, तो अपने आपको कुटिल और कामी पाएँगे | – महात्मा गांधी.
5) जब तक तुममें दूसरों के दोष देखने की आदत मौजूद है, तब तक तुम्हारे लिए ईश्वर का साक्षात्कार करना अत्यन्त कठिन है | – रामतीर्थ.
6) ज्ञानवान मित्र ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान है | – युरिपिडिज.
7) मुँह के सामने मीठी बातें करने और पीठ पीछे छुरी चलानेवाले मित्र को दुधमुँहे विषभरे घड़े की तरह छोड़ दो | – हितोपदेश.
8) सच्चे मित्र को दोनों हाथों से पकड़कर रखो | – नाइजिरियन कहावत.
9) उस काम को, जिसे तुम दुसरे व्यक्ति में बुरा समझते हो, स्वयं त्याग दो परंतु दूसरों पर दोष मत लगाओ | – स्वामी रामतीर्थ.
10) जब जेब में पैसे होते हैं, तो तुम बुद्धिमान और सुंदर लगते हो तथा उस समय तुम अच्छा गाते भी हो | – स्वीडिश कहावत
Anmol Vachan In Hindi Language :-  Aaj ka vichar
11) धर्म तो मानव-समाज के लिए अफीम है | – कार्ल मार्स्क.
12) जो चीज विकार को मिटा सके, राग-व्देष को कम कर सके, जिस चीज के उपयोग से मन सूली पर चढ़ते समय भी सत्य पर डटा रहे वही धर्म की शिक्षा है | – महात्मा गांधी.
13) संकट के समय धैर्य धारण करना मानो आधी लड़ाई जीत लेना है | – प्लाट्स.
14) जिसे धीरज है और जो मेहनत से नहीं घबराता, कामयाबी उसकी दासी है | – स्वामी दयानन्द सरस्वती.
15) अपने जीवन का ध्येय बनाओ और इसके बाद अपनी सारी शारीरिक और मानसिक शक्ति, जो भगवान ने तुम्हें दी है, उसमें लगा दो | – कार्लाइल.
16) महान ध्येय महान मस्तिष्क की जननी है | – इमन्स.
17) चाहे धैर्य थकी घोड़ी हो, परंतु फिर भी वह धीरे-धीरे चलेगी अवश्य | – विलियम शेक्सपीयर.
18) जो अपने लक्ष्य के प्रति पागल हो गया है, उसे ही प्रकाश का दर्शन होता है | जो थोड़ा इधर, थोड़ा उधर हाथ मारते हैं, वे कोई लक्ष्य पूर्ण नहीं कर पाते | वे कुछ क्षणों के लिए बड़ा जोश दिखाते है; किन्तु वह शीघ्र ठंडा हो जाता है | – स्वामी विवेकानंद.
19) हमारा ध्येय सत्य होना चाहिए, न कि सुख | – सुकरात.
20) मनुष्य के लिए निराशा के समान दूसरा पाप नहीं है | इसलिए मनुष्य को इस पापरुपिनी निराशा को समूल हटाकर आशावादी बनना चाहिए | – हितोपदेश.
10 Anmol Vachan In Hindi :-  10 Suvichar in hindi
21) कष्ट और क्षति सहने के पश्चात् मनुष्य अधिक विनम्र और ज्ञानी हो जाता है | – फ्रैंकलिन.
22) उड़ने की अपेक्षा जब हम झुकते हैं तब विवेक के ज्यादा नजदीक होते हैं | – वर्ड्सवर्थ.
23) अभिमान की अपेक्षा नम्रता से अधिक लाभ होता है | – भगवान् गौतम बुद्ध.
24) निराशा आशा के पीछे-पीछे चलती है | – एल. ई लैमडन.
25) निराशा निर्बलता का चिह्न है | – स्वामी रामतीर्थ.
26) जिस तरह पानी को कोई जल, कोई आब, कोई वाटर कहते हैं, उसी तरह एक ही सच्चिदानंद परमेश्वर को कोई अल्लाह, कोई हरि, कोई गॉड कहकर पुकारते हैं | – रामकृष्ण परमहंस.
27) उस अल्लाह की स्तुति करनी चाहिए, जो समस्त संसार का चालक, दयालु, उदार पर अंतिम निर्णय के समय न्यायाधीश भी है | – कुरान.
28) ईश्वर की कोई बौद्धिक परिभाषा नहीं दी जा सकती | हाँ, उसका आत्मा के सहारे अनुभव किया जा सकता है | – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन.
29) पाप एक प्रकार का अँधेरा है, जो ज्ञान का प्रकाश होते ही मिट जाता है | – कालिदास.
30) पुस्तकें मन के लिए साबुन का कार्य करती हैं | – महात्मा गांधी.
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