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Thursday, 24 March 2016

एक बार जरा क्षण भर को ऐसा सोचो कि चौबीस घंटे के लिए सारी कामना छोड़ दो -- सुख की कामना भी छोड़ दो। चौबीस घंटे में कुछ हर्जा नहीं हो जाएगा, कुछ खास नुकसान नहीं हो जाएगा।

एक बार जरा क्षण भर को ऐसा सोचो कि चौबीस घंटे के लिए सारी कामना छोड़ दो -- सुख की कामना भी छोड़ दो। चौबीस घंटे में कुछ हर्जा नहीं हो जाएगा, कुछ खास नुकसान नहीं हो जाएगा।

ऐसे भी इतने दिन वासना कर-कर के क्या मिल गया है? चौबीस घंटे मेरी मानो। चौबीस घंटे के लिए सारी वासनाछोड़ दो। कुछ पाने की आशा मत रखो। कुछ होने की आशा मत रखो।एक क्रांति घट जाएगी चौबीस घंटे में। तुमअचानक पाओगे, जो है, परम तृप्तिदायी है।

जो भी है। रूखी-सूखी रोटी भी बहुत सुस्वादु है, क्योंकि अब कोई कल्पना न रही। अब किसी कल्पना में इसकी तुलना न रही। जैसा भी है, परम तृप्तिदायी है!यह अस्तित्व आनंद ही आनंद से भरपूर है।

पर हम इसके आनंद भोगने के लिए कभी मौका हीनहीं पाते। हम दौड़े-दौड़े हैं, भागे-भागे हैं। हम ठहरते ही नहीं। हम कभीदो घड़ी विश्राम नहीं करते!इस विश्राम का नाम ही ध्यान है। वासना से विश्राम ध्यान है। तृष्णा से विश्राम ध्यान है।

अगर तुम एक घंटा रोज सारी तृष्णा छोड़कर बैठ जाओ, कुछ न करो, बस बैठे रहो -- मस्ती आजाएगी! आनंद छा जाएगा! रस बहने लगेगा!धीरे-धीरे तुम्हें यह बात दिखाई पड़ने लगेगी, जब घंटे भर में रस बहने लगता है, तो फिर इसी ढंग से चौबीस घंटे क्यों न जीएँ?

परम प्यारे ओशो
अरी मैं तो नाम के रंग छकी
प्रवचन 10

वसीम अकरम त्यागी भारत में डेढ करोड़ वैश्याऐं हैं यह संख्या कई देशों की की कुल जनसंख्या से भी अधिक है।

वसीम अकरम त्यागी भारत में डेढ करोड़ वैश्याऐं हैं यह संख्या कई देशों की की कुल जनसंख्या से भी अधिक है।

इस देश में गंगा (नदी) माता है, गाय (जानवर) माता है, धरती माता है। मगर औरत (इंसान) वैश्या है और वैश्या भी एक या दोहजार नहीं बल्कि डेढ करोड़ हैं।

14 फरवरी को देश पार्कों में जाकर डंडे लाठी से देश के प्रेमी युगल को ‘संस्कृती’ सिखाने वालोंको एक बार कोठे पर भी जाना चाहिये। ताकि अपने हाथो से तैयार की गई वैश्या संस्कृति का बदसूरत चेहरा देख सकें।

भारत माता है अथवा पिता है इस बहस के बीच यह सवालजोर से उठ जाना चाहिये कि भारत माता हो या पिता मगर उसकी डेढ करोड़ संतानवैश्या क्यों है ?

संविधान क्या कहता है ? गांधी जी क्या कहते थे ? बुद्ध क्या कहते थे ? अल्लाह के 99 नाम हैं ? प्लास्टिक सर्जरी भारत में हजारों साल से रही है गणेश जी की नाक प्लास्टिक सर्जरी से लगवाई गई थी।

मेरी मत राष्ट्रपति की सुनो ? इनसब बातों को सुनकर भक्त भले ही हर हर मोदी करके छाती पीटते हों मगर इस देश का एक बहुत बड़ा तबका है जो इतने भर से संतुष्ट नहीं है।

वह तबका जानना चाहता है कि जिन साहित्यकारों ने आवार्ड लौटाये हैं उनके बारे में मोदी क्या कहतेहै ? वह तबका सुनना चाहता है कि अखलाक के हत्यारों के बारे में मोदी क्या कहते है ? वह तबका सुनना चाहता है कि थोक में बांटे जा रहे देशभक्ती की सर्टिफिकेटके बारे में मोदी क्या कहते है ?

भारत माता की जय के नाम पर इंसानों की मां को दी जा रहीं गालियों के बारेमें मोदी क्या कहते है ? अपनी सरकार का सिर्फ एक ही मज्हब इंडिया फर्स्ट बताने वाले मोदी हिंदुत्व के नाम पर (गौ रक्षा) की जा रही हत्याओं के बारे में क्या कहते हैं ? सवालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है और ये सवाल उस तबके हैं जो किसी भी सरकार अथवा व्यक्ति विशेष का भक्त नहीं है बावजूद इसके उस तबके को मोदी भक्त हिंदु विरोधी या देशविरोधी कहकर संबोधितकरते हैं।

मोदी उपदेश देने के लिये प्रधानमंत्री नहीं बने हैं बल्कि परिवर्तन लाने के लिये प्रधानमंत्री बने हैं। मगर जैसा परिवर्तन उनके पाले हुऐ गुंडे इस देश में करना चाहते हैं वैसापरिवर्तन इस देश को हरगिज नहीं चाहिये।

फूट रही बहुसंख्यकवाद की सड़ांधभारतीय लोकतंत्र में बहुसंख्यकवाद की सड़ांध फूट रही है। यह बहुसंख्यकवाद मुंबई ब्लास्ट के मास्टर माइंड याकूब मेमन को फांसी देता है, मगर रथ यात्रा के मास्टर माइंड आडवाणी जिसने तमाम देश को दंगों की आग में झोंक दिया था उसे उप प्रधानमंत्री बनाता है।

संविधान पर भरौसा करके आत्मसमर्पण करने वाले मेमन को सजा ऐ मौत दी जाती है और उसी संविधान को जूते की नोक पर रखकर समतल जमीन का आह्वान करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न सेनवाजा जाता है।

हम और हमारा राष्ट्र खौखलेपन से इतरा सकता हैकिहम विश्व कै सबसे बड़े लोकतंत्र हैं लेकिन इस बहुसंख्यकवादी लोकतंत्र की लाश कभी हैदराबाद सेंट्रल यूनीवर्सिटी के हाॅस्टलमें रोहित वेमुला की शक्ल में झूलती पाई जातीहै तो कभी झारखंड में मजलूम अंसारी और इब्राहीम की शक्ल में पेड़ पर झूलती पाई जाती है।

जिन लोगों ने रोहित को मारा था वे सत्ता में हैं और जिन लोगों ने अखलाक से लेकर इब्रहीम, मजलूम की लाशें बिछाई हैं उन्हें सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। मोदी ने दिल्ली में सूफिज्म पर लंबा भाषण दिया है मगर यजीदियत के खिलाफ एक लफ्ज भी न बोल पाये क्योकि भारतीय यजीद उनके ‘अपने’ लोग हैं।

नेशन वांट टू नो (देश जानना चाहता है) मगर तुम बताते नहीं कि उन दो मासूम मजदूरों जिनमें से एक बाल मजदूर था का क्या कसूर था जो उन्हें बेदर्दी से मौत के घाट उतार दिया गया ?

गाय तुम्हारी माता है यह तो समझ आता है मगर भैंस से क्या नाता है यह तो बताओ? भैंस से नाता इसलिये मालूम किया जा रहा है क्योंकि अखलाक को गाय मांस के आरोप में मारा था मगर ये मासूम तो पशु व्यापारी थे और गाय नहींबल्कि भैंस लेकर जा रहे थे फिर भी मार दिया गया। वे मीडिया माध्यम खुद कोमुख्यधारा का मीडिया बताते हैं

वेक्यों ‘झारखंड’ पर शान्त हैं ?क्या इसलिये कि मरने वाले मुसलमान थे और मारने वाले तथाकथित देशभक्त हैं ? या अल्पसंख्यकों की मौत महज ‘एंटरटेनमेंट’ है सियासी जमातों के लिये भी और मीडिया के लिये भी? अब प्राईम टाईम में क्यों नहीं कहते कि देश जानना चाहता है कि जानवरकी रक्षा के नाम पर इंसानों को जानवर समझना कहां तक जायज है ?

जानवरों की कथित रक्षा के नाम पर इंसानों को लाशों में तब्दील करने का अधिकार कौनसे संविधान ने दिया है ? मीडिया खामोश है ‘मन की बात’ करने वाला ‘चौकीदार भी खामोश है। क्या मीडिया इसीलिये खामोश है क्योंकि यह घटना ‘राम राज्य’ में हुई है ?

मीडिया की खामोशी यह बताने के लिये काफी है कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ पर राम राज्य वालों का कुत्ता मूत गयाहै।

(वसीम अकरम त्यागी – लेखक जाने माने पत्रकार और समाजसेवी है)

एक छोटा सा बच्चा समुद्र की रेत पर अपने हस्ताक्षर कर रहा था। वह बड़ी बारीकी से, बड़ी कुशलता से अपने हस्ताक्षर बना रहा था। एक का उससे कहनेलगा,

एक छोटा सा बच्चा समुद्र की रेत पर अपने हस्ताक्षर कर रहा था। वह बड़ी बारीकी से, बड़ी कुशलता से अपने हस्ताक्षर बना रहा था। एक का उससे कहनेलगा, पागल, तू हस्ताक्षर कर भी न पाएगा, हवाएं आएंगी और रेत बिखर जाएगी। व्यर्थ मेहनत कर रहा है, समय खो रहा है, दुख को आमंत्रित कर रहा है।


क्योंकि जिसे तू बनाएगा और पाएगा कि बिखर गया, तो दुख आएगा। बनाने में दुख होगा, फिर मिटने में दुख होगा। लेकिन तू रेत पर बना रहा है, मिटना सुनिश्चित है। दुख तूबो रहा है। अगर हस्ताक्षर ही करने हैं तो किसी सख्त, कठोर चट्टान पर कर, जिसे मिटाया न जा सके।

मैंने सुना है कि वह बच्चा हंसने लगा और उसने कहा, जिसे आप रेत समझ रहे हैं, कभी वह चट्टान थी; और जिसे आप चट्टान कहते हैं, कभी वह रेत हो जाएगी।बच्चे रेत पर हस्ताक्षर करते हैं, बूढ़े चट्टानों पर हस्ताक्षर करते हैं, मंदिरों के पत्थरों पर। लेकिन दोनों रेत पर बना रहे हैं।


रेत पर जो बनाया जा रहा है वह झूठ है, वह असत्य है। हम सारा जीवन ही रेत पर बनाते हैं। हम सारी नावें ही कागज की बनाते हैं। और बड़े समुद्र में छोड़ते हैं, सोचते हैं कहीं पहुंच जाएंगे। नावें ड़बती हैं, साथ हम ड़बते हैं।

रेत के भवन गिरते हैं, साथ हम गिरते हैं। असत्य रोज—रोज हमें रोज—रोज पीड़ा देता और हम रोज—रोज असत्य की पीड़ा से बचने को और बड़े असत्य खोज लेते हैं। तब जीवन सरल कैसे हो सकता है?

असत्य को पहचानें कि मेरे जीवन का ढांचा कहीं असत्य तो नहीं है? और हम इतने होशियार हैं कि हमने छोटी—मोटी चीजों में असत्य पर खड़ा किया हो अपने को, ऐसा ही नहीं है, हमने अपने धर्म तक को असत्य पर खड़ा कर रखा है।

जीवन रहस्य ( प्रवचन 12)

Wednesday, 23 March 2016

एक फ़क़ीर था। उसके दोनों बाज़ू नहीं थे। उस बाग़ में मच्छर भी बहुत होते थे। मैंने कई बार देखा उस फ़क़ीर को। आवाज़ देकर , माथा झुकाकर वह पैसा माँगता था

एक फ़क़ीर था। उसके दोनों बाज़ू नहीं थे। उस बाग़ में मच्छर भी बहुत होते थे। मैंने कई बार देखा उस फ़क़ीर को। आवाज़ देकर , माथा झुकाकर वह पैसा माँगता था।

एक बार मैंने उस फ़क़ीर से पूछा - " पैसे तो माँग लेते हो , रोटी कैसे खाते हो ? "उसने बताया - " जब शाम उतर आती है तो उस नानबाई को पुकारता हूँ , ' ओ जुम्मा ! आकेपैसे ले जा , रोटियाँ दे जा। ' वह भीख के पैसे उठा ले जाता है , रोटियाँ दे जाता है।

"मैंने पूछा - " खाते कैसे हो बिना हाथोंके ? "वह बोला - " खुद तो खा नहीं सकता। आने-जानेवालों को आवाज़ देता हूँ ' ओ जानेवालों ! प्रभु तुम्हारे हाथ बनाए रखे , मेरे ऊपर दया करो ! रोटी खिला दो मुझे , मेरे हाथ नहीं हैं।

' हर कोई तो सुनता नहीं , लेकिन किसी-किसी को तरस आ जाता है। वह प्रभु का प्यारा मेरे पास आ बैठता है। ग्रास तोड़कर मेरे मुँह में डालता जाता है , मैं खा लेता हूँ।

"सुनकर मेरा दिल भर आया। मैंने पूछ लिया- " पानी कैसे पीते हो ? "उसने बताया - " इस घड़े को टांग के सहारे झुका देता हूँ तो प्याला भर जाताहै। तब पशुओं की तरह झुककर पानी पी लेता हूँ।

"मैंने कहा - " यहाँ मच्छर बहुत हैं। यदिमच्छर लड़ जाए तो क्या करते हो ? "वह बोला - " तब शरीर को ज़मीन पर रगड़ता हूँ। पानी से निकली मछली की तरह लोटता और तड़पता हूँ।

"हाय ! केवल दो हाथ न होने से कितनी दुर्गति होती है !अरे , इस शरीर की निंदा मत करो ! यह तो अनमोल रत्न है ! शरीर का हर अंग इतना कीमती है कि संसार का कोई भी खज़ाना उसका मोल नहीं चुका सकता।

परन्तु यह भीतो सोचो कि यह शरीर मिला किस लिए है ? इसका हर अंग उपयोगी है। इनका उपयोग करो!स्मरण रहे कि ये आँखे पापों को ढूँढने के लिए नहीं मिलीं।कान निंदा सुनने के लिए नहीं मिले।

हाथ दूसरों का गला दबाने के लिए नहीं मिले।यह मन भी अहंकार में डूबने या मोह-माया में फसने को नहीं मिला।ये आँख सच्चे सतगुरु की खोज के लिये मिली है जो हमें परमात्मा के बताये मार्ग पर चलने सिखाये।ये हाथ प्राणी मात्र की सेवा करने को मिले हैं।

ये पैर उस रास्ते पर चलने को मिले है जो परम पद तक जाता हो।ये कान उस संदेश सुनने को मिले है जो जिसमे परम पद पाने का मार्ग बताया जाताहो।ये जिह्वा प्रभु का गुण गान करने को मिली है।ये मन उस प्रभु का लगातार शुक्र और सुमिरन करने को मिला है।

कस्तूरी कुंडल बसै ●●★★★★ कबीर ने बड़ा प्यारा प्रतीक चुना है। जिस मंदिर की तुम खोज कर रहे हो, वह तुम्हारे कुंडल में बसा है; वह तुम्हारे ही भीतर है; तुम ही हो।

कस्तूरी कुंडल बसै ●●★★★★

कबीर ने बड़ा प्यारा प्रतीक चुना है। जिस मंदिर की तुम खोज कर रहे हो, वह तुम्हारे कुंडल में बसा है; वह तुम्हारे ही भीतर है; तुम ही हो।

और जिस परमात्मा की तुम मूर्ति गढ़ रहे हो,उसकी मूर्ति गढ़ने की कोई जरूरत नहीं; तुम ही उसकी मूर्ति हो। तुम्हारे अंतर - आकाशमें जलता हुआ उसका दीया, तुम्हारे भीतर उसकी ज्योतिर्मयी छवि मौजूद है।

तुम मिट्टी के दीये भले हो ऊपर से, भीतर तो चिन्मय की ज्योति हो। मृण्यम होगी तुम्हारी देह; चिन्मय है तुम्हारा स्वरूप। मिट्टी के दीए तुम बाहर से हो; ज्योति थोड़े ही मिट्टी की है।

दीया पृथ्वी का है; ज्योति आकाश ही है। दीया संसार का है; ज्योति परमात्मा की है।लेकिन तुम्हारी स्थिति वही है जो कस्तूरी मृग की है: भागते फिरते हो; जन्मों - जन्मों से तलाश कर रहे हो, उसकी जो तुम्हारी भीतर ही छिपा है।

उसे खोज रहे हो, जिसे तुमने कभी खोया नहीं। खोजने के कारण ही तुम वंचित हो।यह कस्तुरी - मृग पागल ही हो जाएगा।

यह जितना खोजेगा उतनी मुश्किल में पड़ेगा; जहां जाएगा, सारे संसार में भटके तो भी पान सकेगा। क्योंकि बात ही शुरु से गलत हो गई - जो भीतर था उसे उसने बाहर सोच लिया, क्योंकि गंध बाहर से आ रही थी, गंध उसे बाहर से आती मालूम पड़ी थी।

तुम्हें भी आनंद की गंध पागल बनाये दे रही है। तुम भी आनंद की गंध को बाहर से आता हुआ अनुभव करते हो। और खोजते फिरते हो संसार भर के मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों में।

ओशो

એ મારી આ જિંદગીનો છેલ્લો શ્વાસ હશે;કે જ્યારે ભૂલાતી તારી બધી યાદ હશે!!

એ મારી આ જિંદગીનો છેલ્લો શ્વાસ હશે;કે જ્યારે ભૂલાતી તારી બધી યાદ હશે!!

ને હું મલકાતો હોઇશ એટલે એ ક્ષણોમાં;કે તને પામી શકું એ મોકો ફરી હાથ હશે!!

તારા ગયા પછીનું એ અંધારું આ જીવનમાં,ફરીથી નવલું પ્રભાત ઉગવાની આશ હશે!!

ક્રૂરતાથી કચડી નાખી હતી લાગણીઓને;મોકો ફરીથી પ્રિયે એ તારે હાથ હશે!!

ચાહવા સિવાય કરવું શું જન્મ લઇને;ચાહતનો સિરસ્તો જનમોથી આમ જ હશે!

હા, ફરીથી અજાણ્યા થઇ જવું સંબંધોમાં,ને ફરીની આપણી એ પહેલી મુલાકાત હશે!!

ફરીથી એમ જ કદાચ તારી ના હશે,ને એ છેલ્લો શ્વાસ ફરીથી એક વિશ્વાસ હશ

मैं एक डाक्टर को जानता हूं; उनके घर मैं मेहमान होता था, बैठकर मैं देखता कि वह मरीजों को डरवाते। जिसको सर्दी—जुकाम हुआ है, उसको वह एकदम इस तरह बात करते जैसेनिमोनिया हो गया है कि डबल निमोनिया हो गया है। मैंने यह दो—चार बार देखा। मैंने उनसे पूछा कि बात क्या है? आप मरीज को बहुत घबड़ा देते हैं! उन्होंने कहा: मरीज को घबड़ाओ मत, तो मरीज फंदे में नहीं आता। मालूम है मुझे भी सर्दी—जुकाम है, लेकिन निमोनिया की बात करो तो मरीज घबड़ाता है।

मैं एक डाक्टर को जानता हूं; उनके घर मैं मेहमान होता था, बैठकर मैं देखता कि वह मरीजों को डरवाते। जिसको सर्दी—जुकाम हुआ है, उसको वह एकदम इस तरह बात करते जैसेनिमोनिया हो गया है कि डबल निमोनिया हो गया है। मैंने यह दो—चार बार देखा। मैंने उनसे पूछा कि बात क्या है? आप मरीज को बहुत घबड़ा देते हैं! उन्होंने कहा: मरीज को घबड़ाओ मत, तो मरीज फंदे में नहीं आता। मालूम है मुझे भी सर्दी—जुकाम है, लेकिन निमोनिया की बात करो तो मरीज घबड़ाता है।

हालांकि सर्दी—जुकाम है, इसलिए ठीक भी कर लेंगे जल्दी, कोई अड़चन भी नहीं है। और मरीज को अगर यह खयाल रहे कि निमोनिया ठीक किया गया है, तो वह सदा के लिए अपना हो जाता है। और इतनी जल्दी ठीक किया गया! तो दोहरे फायदे हैं! पर मैंने कहा, यह तो बात गलत है, यह तो बात अनुचित है। तुम तो धर्म—पुरोहितों जैसा काम कर रहे हो!मगर बहुत डाक्टर हैं जो इस तरह जीते हैं, जो तुम्हारी छोटी—सी बीमारी को खूब बड़ा करके बता देते हैं। और मजा ऐसा है कि मरीज इन्हीं डाक्टरों से प्रसन्न होता है।

जो उसकी बीमारी को खूब बड़ा करके बता देते हैं, वे ही उसको बड़े डाक्टर भी मालूम होते हैं। अगर तुम समझ रहे हो कि तुम्हें निमोनिया हुआ है, और तुम गए और कोई डाक्टर कह दे: छोड़ो बकवास, सर्दी—जुकाम है, दो दिन में चला जाएगा। तुम प्रसन्न नहीं होते; तुम्हारा चित्त राजी नहीं होता; तुमको चोट लगती है

तुम इतनी बड़ी बीमारी लेकर आए——तुम कोई छोटे—मोटे आदमी हो! तुम्हें कोई छोटी—मोटी बीमारियां होती हैं! बड़े आदमियों को बड़ी बीमारियां होती हैं। तुम बड़े आदमी हो, तुम बड़ी बीमारी लेकर आए हो और यह बदतमीज कहता है कि सर्दी—जुकाम है बस, ठीक हो जाएगा, ऐसे ही ठीक हो जाएगा।

जो डाक्टर मरीज से कह देता है ऐसे ही ठीक हो जाएगा, उससे मरीज प्रसन्न नहीं होते।मेरे गांव में एक नए डाक्टर आए। सीधे—सादे आदमी थे। उनकी डाक्टरी न चले।किसी ने मेरी उनसे पहचान करा दी। उन्होंने मुझसे पूछा कि मामला क्या है? मेरी डाक्टरी क्यों नहीं चलती? मैंने कहाकि मैं जरा आऊंगा, देखूंगा एक—दो दिन बैठकर कि बात क्या है।तो उनकी बैठ जाता था डिस्पेंसरी पर जाकर। जो मैंने देखा, तो मामला साफ हो गया।

वह मरीजों को डरवाते न। मरीज बता रहा है बड़ी बीमारी, वह कहते: यह कुछ नहीं है, यह मिक्शचर ले लो, ठीक हो जाएगी। किसी—किसी मरीज को कह देते कि तुम्हें बीमारी ही नहीं है, दवा की कोई जरूरत नहीं है। और मरीज अपनी बीमारी की कथा कह भी न पाता और वह मिक्शचर तैयार करने लगते।

मैंने उनके मरीजों से पूछा। उन्होंने कहा कि हमें यह बात जंचती नहीं। हम अभी अपनी बीमारी की पूरी बात भी नहीं कह पाए और यह सज्जन जल्दी से दवाई बनाने लगते हैं।कुशल डाक्टर थे, मगर कुशल राजनीतिज्ञ नहीं थे।

मरीज को सिर्फ बीमारी ही थोड़े हीठीक करवानी है, मरीज को कुछ और रस भी है——उसकी बात ध्यान से सुनी जाए, उस पर ध्यान दिया जाए। तड़प रहा है, कोई ध्यान नहीं देता। घर जाता है, कहता है सिर में दर्द, तो पत्नी कहती है, लेटे रहो, ठीक हो जाएगा। कोई ध्यान नहीं देता।

कोई उसकी चारों तरफ खाट के बैठकर हाथ—पैर नहीं दबाता। कोई कहता नहीं कि अहा! ऐसा सिरदर्दकभी किसी को नहीं हुआ। कितनी मुसीबत में पड़े हो! कैसा कष्ट झेल रहे हो! हम बच्चों के लिए, पत्नी के लिए, परिवार के लिए कैसा महान हिमालय सिर पर ढो रहे हो! उसी से सिरदर्द हो रहा है——कोई उस पर ध्यान नहीं देता।

और यह डाक्टर के पास आया है; यहमिक्शचर बनाने लगा, इसने मरीज की बात ही नहीं सुनी।होम्योपैथी डाक्टरों का बड़ा प्रभाव का एककारण है कि वे खूब लंबी चर्चा सुनते हैं; तुम्हारी ही नहीं, तुम्हारे पिता को भी क्या बीमारी हुई थी, उसकी भी तुमसे पूछते हैं।

पिता के पिता को भी क्या हुई थी, उसकीभी तुमसे पूछते हैं। बचपन से लेकर अब तक कितनी बीमारियां हुईं, वह सब पूछ लेते हैं। मरीज को बड़ी राहत मिलती है——यह कोईआदमी है जो इतना रस ले रहा है!पश्चिम में मनोवैज्ञानिकों का बहुत प्रभाव है, क्योंकि वे घंटों तुम्हारी बकवास सुनते हैं; मगर इतने ध्यान से सुनतेहैं जैसे तुम अमृत वचन बोल रहे हो।

कहै वाजिद पुकार,
प्रवचन-६,
ओशो