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Wednesday, 23 March 2016

એક બહુમાળી ઇમારતનું બાંધકામ ચાલી રહ્યુ હતું. લગભગ 10 માળ જેટલું કામ પુરુ થયું હતું. એક વાર સવારના સમયે કંસ્ટ્રકશન કંપનીનો માલિક ઇમારતની મુલાકાતે આવ્યો. એ 10માં માળની છત પર આંટા મારી રહ્યો હતો.

એક બહુમાળી ઇમારતનું બાંધકામ ચાલી રહ્યુ હતું. લગભગ
10 માળ જેટલું કામ પુરુ થયું હતું. એક વાર સવારના સમયે
કંસ્ટ્રકશન કંપનીનો માલિક ઇમારતની મુલાકાતે આવ્યો.
એ 10માં માળની છત પર આંટા મારી રહ્યો હતો.

ત્યાંથી નીચે જોયુ તો એક મજુર કામ કરી રહ્યો હતો.
માલિકને મજુર સાથે વાત કરવાની ઇચ્છા થઇ.માલિકે
ઉપરથી મજુરને બુમ પાડી પણ મજુર કામમાં વ્યસ્ત
હોવાથી અને આસપાસ અવાજ થતો હોવાથી એને
માલિકનો અવાજ ન સંભળાયો. થોડીવાર પછી મજુરનું
ધ્યાન પોતાના તરફ ખેંચવા માટે માલિકે ઉપરથી 10
રૂપિયાનો સિક્કો ફેંક્યો.

આ સિક્કો મજુર કામ
કરતો હતો ત્યાં જ પડ્યો. મજુરે તો સિક્કો ઉઠાવીને
ખીસ્સામાં મુકયો અને કામે વળગી ગયો.માલિકે હવે
100ની નોટ નીચે ફેંકી. નોટ
ઉડતી ઉડતી પેલા મજુરથી થોડે દુર પડી.
મજુરની નજરમાં આ નોટ આવી એટલે લઇને
ફરીથી ખિસ્સામાં મુકી દીધી અને કામ કરવા લાગ્યો.


માલિકે હવે 500ની નોટ નીચે ફેંકી તો પણ પેલા મજુરે એમ
જ કર્યુ જે અગાઉ બે વખત કર્યુ હતું. માલિકે હવે
હાથમાં નાનો પથ્થર લીધો અને પેલા મજુર પર માર્યો.
પથ્થર વાગ્યો એટલે મજુરે ઉપર જોયું અને
પોતાના માલિકને ઉપર જોતા તેની સાથે વાત ચાલુ
કરી.મિત્રો,

આપણે પણ આ મજુર જેવા જ છીએ.
ભગવાનને આપણી સાથે વાત કરવાની ઇચ્છા હોય છે એ
આપણને સાદ પાડીને બોલાવે છે પણ આપણે
કામમાં એવા વ્યસ્ત છીએ કે પ્રભુનો સાદ આપણને
સંભળાતો જ નથી.

પછી એ નાની નાની ખુશીઓ આપવાનું
શરુ કરે છે પણ આપણે એ ખુશીઓને ખિસ્સામાં મુકી દઇએ
છીએ ખુશી આપનારાનો વિચાર જ નથી આવતો. છેવટે
ભગવાન દુ:ખ રૂપી નાનો પથ્થર આપણા પર ફેંકે છે અને
તુંરત જ ઉપર ઉભેલા માલિક સામે જોઇએ છીએ.
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મિત્રો વાત ગમે તો શેર જરૂરથી કરજો...very nice and true story

"મૃત્યુ ક્યારે ?" ગુરુ વ્યાસજી ને "દાસ" નામ નો એક ચેલો હતો.. એ વ્યાસજી ની ખુબ સેવા કરે.

"મૃત્યુ ક્યારે ?"

ગુરુ વ્યાસજી ને "દાસ" નામ નો એક ચેલો હતો.. એ વ્યાસજી ની ખુબ સેવા કરે.

એક દિવસ એણે વ્યાસ જી ને પૂછ્યું,..''હું ક્યારે મરીશ? એ મારે જાણવું છે''.

વ્યાસ જી એ કહ્યું, ''એ પ્રશ્ન રહેવા દે..એ તારે જાણવાની શું જરૂર છે ?''

દાસે અતિ આગ્રહ કર્યો ત્યારે વ્યાસજી કહે, ''તારે એ જાણવાની ઈચ્છા છે તો એ આપણે યમરાજ ને પૂછવું પડે''.

વ્યાસજી ચેલાને લઈને યમરાજજી પાસે આવ્યા..અને યમરાજ ને પૂછ્યું, ''મારો આ ચેલો છે દાસ.. એ ને જાણવું છે કે એનું મૃત્યુ ક્યારે થશે ?''.

યમરાજે કહ્યું ,..''હું કશું જાણતો નથી..એ મારા મંત્રી મૃત્યુદેવ જાણતા હશે, ચાલો આપણે મૃત્યુદેવ પાસે જઈ ને પૂછીએ'.."

મૃત્યુદેવે કહ્યું, ''હું કઈ જાણતો નથી મને તો હુકમ મળે તે હું મારી ફરજ બજાવું.. એ તો પ્રારબ્ધ દેવ જાણે..

ચાલો આપણે એમને પૂછીએ''.
વ્યાસજી, દાસ, યમ અને મૃત્યુદેવ એમ ચાર જણા આવ્યા પ્રારબ્ધ દેવ પાસે અને પૂછ્યું કે "આ દાસ નું મૃત્યુ કયારે છે ?''

વિધાતાએ કહ્યું, ''મેં દાસ ના પ્રારબ્ધ માં લખ્યું કે જયારે વ્યાસજી, દાસ, યમ અને મૃત્યુ એ ચારે ભેગા મળી મારે ઘેર આવે ત્યારે જ એ મરે. વ્યાસ જી એ તમારો ચેલો છે અને તમારી ખુબ સેવા કરે છે અને એ મરે નહિ માટે જ મેં આવું લખ્યું ..હવે એની પાસે ફક્ત ૨ જ મિનીટ છે..''

માટે જ કોઈ દિવસ તમારે એમ ન પૂછવું કે ક્યારે મૃત્યુ થશે...આ શરીર નું ક્ષણે ક્ષણે મૃત્યુ થાય છે... બહુ જીવવાનો વિચાર ના કરો કે ક્યારે મરવાનો પણ વિચાર ન કરો,

તમે તમારી પ્રતિ ક્ષણ સુધારો.. એટલું જ વિચારો મારે હાથે પાપ ના થાય.. પરોપકાર અને પુણ્યકાર્ય માં જ મારું જીવન વ્યતીત થાય...

Tuesday, 22 March 2016

काबा की तरफ दूर से सिजदा कर लूं,या दहर का आखिरी नजारा कर लूं..मरते वक्त भी, मरण-शथ्या पर भी आदमी के मन में यही सवाल उठते रहते हैं–

काबा की तरफ दूर से सिजदा कर लूं,या दहर का आखिरी नजारा कर लूं..मरते वक्त भी, मरण-शथ्या पर भी आदमी के मन में यही सवाल उठते रहते हैं–

काबा की तरफ दूर से सिजदा कर लूं.....या दहर का आखिरी नजारा कर लूं......मंदिर को प्रणाम कर लूं या इतनी देर संसार को और एक बार देख लूं!या दहर का आखिरी नजारा कर लूं.....

कुछ देर की मेहमान है जाती दुनियाएक और गुनाह कर लूं कि तोबा कर लूंजा रही है दुनिया।कुछ देर की मेहमान है जाती दुनियाजरा और थोड़ा समय हाथ में है।

एक और गुनाह कर लूं कि तोबा कर लूंपश्चात्ताप में गवाऊं यह समय कि एक पापऔर कर लूं!यह तुम्हारी कथा है। यह तुम्हारे मन कीकथा है। यही तुम्हारी कथा है, यही तुम्हारी व्यथा भी।

मरते दम तक भी आदमीभीतर देखने से डरता है। सोचता है, थोड़ा समय और! थोड़ा और रस ले लूं। थोड़ा और दौड़ लूं।इतना दौड़कर भी तुम्हें समझ नहीं आती किकहीं पहुंचे नहीं। इतने भटककर भी तुम्हें खयाल नहीं आता कि बाहर सिवाय भटकाव के कोई मंजिल नहीं है।

ओशो,
एस धम्मो सनंतनो,
भाग -3

कुछ भी ध्यान बन सकता है"धूम्रपान ध्यान "एक व्यक्ति मेरे पास आया। तीस वर्ष से वह सतत धूम्रपान की लत से पीड़ित था। वह बीमार था, और डाॅक्टर उसे कहते " जब तक तुमधूम्रपान करना छोड़ोगे नहीं, कभी स्वस्थ नहीं हो पाओगे

कुछ भी ध्यान बन सकता है"धूम्रपान ध्यान "एक व्यक्ति मेरे पास आया। तीस वर्ष से वह सतत धूम्रपान की लत से पीड़ित था। वह बीमार था, और डाॅक्टर उसे कहते " जब तक तुमधूम्रपान करना छोड़ोगे नहीं, कभी स्वस्थ नहीं हो पाओगे।

" लेकिन वह तो बहुत समय से धूम्रपान से पूर्णतः ग्रसित था, वह उसकी बाबत कुछ कर नहीं सकता था। उसने प्रयास भी किया था —
ऐसा नहीं है कि उसने प्रयास नहीं किया था —उसने कठोर प्रयास किया था,और इस प्रयास करने में उसने बहुत कुछ झेला भी था, लेकिन एक या दो दिन ही बीतते कि फिर से ऐसी जोर की तलब उठती, कि उसे बहका ले जाती।

वह फिर से उसी ढर्रे में लौट जाता।इस धूम्रपान की वजह से ही उसका सारा आत्मविश्वास जाता रहा था : उसे पता था कि वह एक छोटा सा काम भी नहीं कर सकता था, सिगरेट पीना नहीं छोड़ सकता था। वह अपनी ही दृष्टि में बिलकुल अयोग्य हो गया था, वह स्वयं को संसार का सबसे बेकार व्यक्तिमानने लगा था।

उसे अपने लिए कोई सम्मान नहीं रह गया था। वह मेरे पास आया।उसने पूछा "मैं क्या कर सकता हूं? मैं धूम्रपान कैसे छोड़ सकता हूं?" मैंने कहा"धूम्रपान कोई भी नहीं छोड़ सकता। यह तुम्हे समझ लेना है। धूम्रपान करना अब कोई तुम्हारे निर्णय का ही प्रश्न नहीं है। वह तुम्हारे व्यसनों के जगत में प्रवेश कर गया है, उसने जड़ें जमा ली है। तीस वर्ष एक लंबा समय है। उसने तुम्हारे शरीर में, तुम्हारे रसायन में जड़ें पकड़ली है, वह सारे शरीर में फैल गया है।

यह तुम्हारे मस्तिष्क के निर्णय लेने का ही प्रश्न नहीं रह गया है, तुम्हारा मस्तिष्क कुछ भी नहीं कर सकता। मस्तिष्क नपुंसक है, वह चीजों को शुरू कर सकता है, लेकिन इतनी सरलता से उन्हें रोक नहीं सकता। एक बार तुम शुरू हो गए और एक बार तुमने इतना लंबा अभ्यास कर लिया, तुम तो बड़े योगी हो गए —तीस वर्ष से धूम्रपान का अभ्यास चलता है! अब तो यह स्वचलित ही हो गया है, तुम्हें उसे अ-यंत्रवत करना होगा।" वह बोला, "अ - यंत्रवत करने से आपकाक्या तात्पर्य है?"और यही तो ध्यान का सारा उद्देश्य है —अ-यंत्रवत होना।

मैंने कहा "तुम एक काम करो : छोड़ने की बात भूल जाओ। उसकी कोई आवश्यकता भी नहीं है। तीस वर्ष तक तुमने धूम्रपान किया और तुम उसे जी लिए, निश्चित ही तुम्हें उसमें कष्ट तो हुआ परंतु तुम उसके भी आदी हो गए हो। और इससे क्या फर्क पड़ता है यदि तुम उससे कुछ घंटे पहले मर जाओ जब तुम धूम्रपान न करने पर मरते? यहां तुम करोगे क्या? तुमने क्या कर लिया है? तो सार ही क्या है —

तुम सोमवार को मारो या मंगल को मरो या रविवार को, इस वर्ष मरो कि उस वर्ष —इससे फर्क हीक्या पड़ता है?"उसने कहा "हां, यह सच है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।" तो मैंने कहा "भूल जाओ इस बारे में। हम छोड़ने वाले नहीं हैं, बल्कि हम तो इसे समझेंगे। तो अगली बार, तुम इसे एक ध्यान बना लो।"वह बोला "धूम्रपान का ध्यान?"मैंने कहा "हां। जब झेन साधक चाय पीने को ध्यान बना सकते हैं और उसका उत्सव मना सकते हैं, तो क्यों नहीं धूम्रपान भी उतना ही सुंदर ध्यान हो सकता है।"वह तो रोमांचित नजर आने लगा। वह बोला "आप क्या कह रहे हैं?"वह तो जैसे जी उठा। बोला "ध्यान?

मुझे बताएं —मैं प्रतिक्षा नहीं कर सकता!"मैंने उसे ध्यान बताया। मैंने कहा "एक काम करो। जब तुम सिगरेट का पैकेट अपनी जेब से निकालो, तो धीरे-धीरे निकालो। उसका आनंद लो, कोई जल्दी नहीं है। सचेत, सजग, जागरूक रहो। उसे पूरे होश के साथ धीरे-धीरे निकालो। फिर पैकेट में से सिगरेट निकालो तो पूरे होश के साथ धीरे-धीरे —पहले की तरह जल्दबाजी से, बेहोशी में, यंत्रवत होकर नहीं। फिर सिगरेट को पैकेट पर ठोंको —लेकिन बड़े होश के साथ। उसकी आवाज़ को सुनो, जैसे झेनसाधक सुनते हैं जब समोवार गीत गाने लगता है और चाय उबलनेलगती है... और उसकी सुवास! फिर सिगरेट को सूंघो और उसके सौंदर्य को...। "वह बोला " आप क्या कह रहे हैं? सौंदर्य? ""

हां उसमें सौंदर्य है। तंबाकू भी उतनी ही दिव्य है जितनी कोई अन्य चीज। उसे सूंघो, वह परमात्मा की सुगंध है। "वह थोड़ा हैरान हुआ। वह बोला, " क्या! आप मजाक कर रहे हैं? "" नहीं, मैं मजाक नहीं कर रहा। जब मैं मजाकभी करता हूँ तो मजाक नहीं करता। मैं गंभीर हूँ।"फिर पुरे होश के साथ उसे अपने मुँह में रखो, पूरे होश के साथ उसे जलाओ। हर कृत्य का, हर छोटे - छोटे कृत्य का आनंद लो, और उसे जितने छोटे - छोटे खंडों में हो सके बांट लो, ताकि तुम और - और सजग हो सको।" फिर पहला कश लो : जैसे धुंए के रूप में परमात्मा हो।

हिंदू कहते हैं 'अन्नं ब्रम्ह' —'अन्न ब्रम्ह है'। तो फिर धुंआ क्यों नहीं? सभी कुछ परमात्मा है। अपने फेफड़ों को पूरी तरह से भर लो —यह एक प्राणायाम है। मैं तुम्हे नए युग के लिए नया योग दे रहा हूँ! फिर धुंए को छोड़ो, विश्राम करो, फिर दूसरा कश —और बहुत धीरे-धीरे पीओ।यदि तुम ऐसा कर पाओ तो तुम चकित होओगे, शीघ्र ही तुम्हें इसकी सारी मूढ़ता नजर आजाएगी —इसलिए नहीं कि दूसरों ने इसे मूढ़तापूर्ण कहा है, इसलिए नहीं कि दूसरों ने इसे बुरा कहा है। तुम्हें इसकादर्शन होगा। और यह दर्शन मात्र बौद्धिक ही नहीं होगा। यह तुम्हारे पूरे प्राणों से आएगा, यह तुम्हारी समग्रता का बोध होगा। और फिर किसी दिन धूम्रपान छूट जाए, तो छूट जाए, और चलता रहे, तो चलता रहे। तुम्हें इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है।

"तीन महीने बाद वह आया और बोला " लेकिन मेरी सिगरेट तो छूट गई। "" अब" मैंने कहा "इसे दूसरी चीजों के साथ भी करके देखो।"यही राज है : अयंत्रवत हो जाना।चलते हुए, धीरे-धीरे होशपूर्वक चलो। देखते हुए, होशपूर्वक देखो, और तुम पाओगे कि वृक्ष इतने ज्यादा हरे हो गए, जितने हरे वे कभी न थे। और गुलाब इतने ज्यादा गुलाबी हो गए, जितने कि वे कभी न थे। सुनो!कोई बात कर रहा है, गप-शप कर रहा है : सुनो, सजग होकर सुनो। जब तुम बोल रहे हो, तो सजग होकर बोलो। जाग्रत अवस्था के अपने सभी कृत्यों को अयंत्रवत हो जाने दो।

-ओशोध्यान योग

Monday, 21 March 2016

हर कोई है मस्ती का हकदार सखा होली में मौसम करता रंगो की बौछार सखा होली में

हर कोई है मस्ती का हकदार सखा होली में
मौसम करता रंगो की बौछार सखा होली में

मस्तानी लगती है हर नार सखा होली में
बूढ़े भी होते है दमदार सखा होली में

घोंटें हम मिलजुल भंग जब यार सखा होली में
मिट जाती तब सारी तकरार सखा होली में

सास नन्द देवर कब रहते रिश्तेदार सखा होली में
बन जाते सब ही तो हैं बस यार सखा होली में

बस इक बात यही लगे हमको बेकार सखा होली में
क्यों लेकर आती बजट मुई सरकार सखा होली

-डॉ. श्याम सखा श्याम

ક્યારેક શેરી મ્હોલ્લામાં "ઉજવાતી" હતી, આજે પાર્ટી-પ્લોટમાં"રમાતી" થઈ ગઈ.

ક્યારેક શેરી મ્હોલ્લામાં "ઉજવાતી" હતી,

આજે પાર્ટી-પ્લોટમાં"રમાતી" થઈ ગઈ...

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ...

ક્યારેક દિયર-ભાભીની વચ્ચે ખૂબ પ્રેમથી"ઉજવાતી" હતી,

આજે બોયફ્રેન્ડ-ગર્લફ્રેન્ડમાં"રમાતી" થઈ ગઈ..

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ..

.ક્યારેક 'ફાગ'રૂપે "ગવાતી" હતી,આજે ડી.જે.માં "ખોવાઇ" ગઈ..

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ...

ક્યારેક ખજુર-ધાણી-ચણા "સેવ-મમરા" સાથે"ખવાતી" હતી ,

આજે "save environment" અને "save water" સાથે "ચવાઈ" ગઈ...

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ...

ક્યારેક અબીલ-ગુલાલ- કેશુડે "રંગાતી" હતી

આજે "કેમિકલના રંગોમાં "ડઘાઈ" (ડાઘવાળી) ગઈ...

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ...ક્યારેક આગમાં "પ્રગટતી" હતી ,આજે શબ્દોમાં ગંઠાતી થઈ ગઈ....

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ...

ક્યારેક કલમ-ખડિયા વડે ગ્રંથોમાં"વર્ણવાતી"આજે facebook પર લખાતી થઈ ગઈ....

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ...

अकबर एक राह से गुजरता था। एक शराबी ने बड़ी गालियां दीं मकान पर चढ़कर। नाराज हुआअकबर। पकड़वा बुलाया शराबी को। रातभर कैद में रखा। सुबह दरबार में बुलाया। वह शराबी

अकबर एक राह से गुजरता था। एक शराबी ने बड़ी गालियां दीं मकान पर चढ़कर। नाराज हुआअकबर। पकड़वा बुलाया शराबी को। रातभर कैद में रखा। सुबह दरबार में बुलाया। वह शराबी झुक-झुककर चरण छूने लगा।

उसने कहा,क्षमा करें। वे गालियां मैंने न दी थीं।अकबर ने कहा, मैं खुद मौजूद था। मैं खुद राह से गुजरता था। गालियां मैंने खुद सुनी हैं। किसी और गवाह की जरूरत नहीं।

उस शराबी ने कहा, उससे मैं इंकार नहीं करता कि आपने सुनी हैं। आपने जरूर सुनी होंगी, लेकिन मैंने नहीं दीं। मैं शराब पीए था। मैं होश में न था। अब बेहोशी के लिए मुझे तो कसूरवार न ठहराओगे! शराब से निकली होंगी, मुझसे नहीं निकलीं। जब से होश आया है, तब से पछता रहा हूं।तुमने जो कुछ किया है, बेहोशी में किया है।

जब होश आएगा, पछताओगे। तुमने जो बसाया है, बेहोशी में बसाया है। जब होश आएगा तब तुम पाओगे, रेत पर बनाए महल। इंद्रधनुषों के साथ जीने की आशा रखी।

कामनाओं के सेतु फैलाए, कि शायद उन से सत्य तक पहुंचने का कोई उपाय हो जाए। तुम्हारी तंद्रा में ही तुम्हारे सारे संसार का विस्तार है।

ओशो, एस धम्मो सनंतनो,
भाग -3,
प्रवचन -21