मन में जब तक
कोई भी तरंग उठती है, तब तक मन अशुद्ध है। जब मन निस्तरंग हो जाता है, शून्य की भांति हो जाता है,
दर्पण प्रतिबिंबों से खाली हो जाता है।
न बुरा करने की वासना रह जाती है, न भला करने की वासना रहजाती है, न पाप मन को घेरता है, न पुण्य मन को घेरता है,
न स्वार्थ मन को घेरता है, न परार्थ मन को घेरता है, जब मन को कुछ घेरता ही नहीं, तब मन असीम
हो जाता है।
तब मन की होने की क्षमता मात्र शेष
रह जाती है। तब मनन करने को कुछ भी नहीं बचता,
सिर्फ कोरा दर्पण होता है, जस्ट मिरर। मन जब कोरा दर्पण रह जाता है,
जिसमें कोई प्रतिबिंब,
कोई प्रतिमा, कोई चित्र, कोई छबि, कोई छाया
नहीं पड़ती—उपनषिद कहते हैं—ऐसे मन से ही कोई
परमेश्वर को जानने में समर्थ होता है।
❤ओशो ...........................
No comments:
Post a Comment