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Sunday, 13 March 2016

"ध्यान में बैठने से पूर्व।"रेचन से प्रारंभ करो

"ध्यान में बैठने से पूर्व।"रेचन से प्रारंभ करो —जो ध्यान विधियां सक्रियता से, गतिमयता से शुरू होती है, वह तुम्हें अन्य रूपों में भी सहयोगी होती है। वह एक रेचन बन जाती है। जब तुम बस बेठ जाते हो, तो व्यथित होते हो, तुम्हारा मन तो चलना चाहता है और तुम बस बैठे हुए हो। हर मांसपेशी तन जाती है, हर स्नायु तन जाता है। तुम स्वयं पर ऐसा कुछ आरोपित करने का प्रयास कर रहे हो जो तुम्हारे लिए स्वाभाविक नहीं है। फिर तुमने स्वयं को आरोपित करने वाले और जिस पर आरोपित किया जा रहा है उसमें विभाजित कर लिया। और वास्तव में जिस भाग पर आरोपित किया जा रहा है और जिसे दबाया जा रहा है, वह अधिक मौलिक है। वह दमन करने वाले भाग से अधिक प्रमुख है, और प्रमुख भाग की निश्चित ही जीत होगी।जिसका तुम दमन कर रहे हो, उसे तो वास्तव में बाहर फेंकना है, दबाना नहीं है। क्योंकि तुम लगातार उसे दबाते रहे हो इसलिए वह तुम्हारे भीतर जमा हो गया है।तुम्हारे सारे संस्कार, सारी सभ्यता और शिक्षा दमनकारी है। तुम इतना कुछ दबाते रहे हो जिसे सरलता से निकाला जा सकता था यदि तुम्हें एक भिन्न शिक्षा मिलती, एक अधिक जागरूक शिक्षा मिलती, अधिक जाग्रत माता - पिता मिलते। यदि मन की आंतरिक व्यवस्था के प्रति अधिक सजगता होती तो संस्कृति तुम्हें बहुत कुछ निकाल देने देती। जैसे, यदि कोई बच्चा क्रोधित होता है तो हम उसे कहते हैं, "क्रोध मत करो" वह क्रोध को दबाने लगता है। धीरे-धीरे जो क्षणिक घटना थी वह स्थायी हो जाती है। अब वह क्रोध करेगा तो नहीं, लेकिन क्रोधित रहेगा। यदि क्रोध को दबाया न जाए तो कोई हर समय क्रोधित नहीं रह सकता। क्रोध तो क्षणिक है, जो आता है और चला जाता है, यदि उसे अभिव्यक्त कर दिया जाए, तो फिर तुम क्रोधित नहीं रहते।निश्चित ही, समस्याएं तो आएंगी। जब हम कहते हैं "क्रोधित होओ" तो तुम किसी व्यक्ति पर क्रोधित होओगे। लेकिन बच्चे को दिशा दी जा सकती है। उसे तकिया देकर कहा जा सकता है कि "तकिये परक्रोध कर लो। तकिये पर हिंसा कर लो।" आरंभ से ही बच्चे को क्रोध का दिशा - परिवर्तन सिखाया जा सकता है। कुछ ही मिनटों में, क्षणों में उसका क्रोध समाप्त हो जायेगा, क्रोध का कोई संचय नहीं होगा।..... कुछ ही मिनटों में तुम जन्म भर के बोझ से, बल्कि जन्मों - जन्मों के बोझ से निर्भार हो सकते हो। यदि तुम सबकुछ निकाल फेंकने को तैयार होओ, यदि तुम अपनी विक्षिप्तता को बाहर आने दे सको तो कुछ ही क्षणों में सब हो जाए। अब तुम स्वच्छ हुए, ताजे, निर्दोष। तुम पुनः शिशुवत हो गए। अब तुम्हारी इस निर्दोषता में, बैठकर ध्यान हो सकता है - बस बैठकर, या लेटकर या कैसे भी - क्योंकि अब भीतर कोई विक्षिप्तता नहींहै जो बैठने में बाधा डाले।सबसे पहले सफाई होनी चाहिए - रेचन होना चाहिए। वरना, प्राणायाम से, बस बैठने से, आसन, योगासन साधने से तो तुम कुछ दबारहे हो। और एक बड़ी अदभुत घटना घटती है:जब तुम सबकुछ बाहर निकल जाने देते हो, तो बैठना ऐसे ही घट जायेगा, आसन ऐसे ही घट जायेंगे। यह सहज घटना होगी।रेचन से आरंभ करो, और फिर तुम्हारे भीतरकुछ शुभ उतर सकता है। उसका एक भिन्न गुणधर्म होगा। एक भिन्न सौंदर्य होगा - बिल्कुल भिन्न। वह प्रामाणिक होगा।जब मौन आता है, जब मौन तुम पर उतरता है, तो वह झूठा नहीं होता। तुम उसका सप्रयास निर्माण नहीं करते रहे हो। वह तुम पर आता है, तुममें घटित होता है। तुम उसे अपने भीतर ऐसे ही विकसित होता अनुभव करने लगते हो जैसे एक माँ बच्चे को भीतर विकसित होता अनुभव करती है।-
       ओशोध्यान योग

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