जिसको आप प्रेम करते है..यदि उसको पूजने का भाव मन में न उठता हो तोसमझ लो कि तुम्हारा प्रेम..प्रेम नही सिर्फ आकर्षण है।प्रेम जहां लेन-देन है, वहां बहुत जल्दी घृणा में परिणत हो सकता है, क्योंकि वहां प्रेम है ही नहीं। लेकिन जहां प्रेम केवल देना है, वहां वह शाश्वत है, वहां वह टूटतानहीं, वहां कोई टूटने का प्रश्न नहीं, क्योंकि मांग थी ही नहीं।आपसे कोई अपेक्षा न थी कि आप क्या करेंगे तब मैं प्रेम करूंगा।कोई कंडीशन नहीं थी, प्रेम हमेशा अनकंडीशनल है।कर्तव्य, उत्तरदायित्व,वे सब अनकंडीशनल हैं,वे सब प्रेम के रूपांतरण हैं..!!
OSHO
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