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Saturday, 12 March 2016

जिस दिन तुम जहां हो, वहीं सब है। संतुष्टि संसार की मृत्यु है

जिस दिन तुम जहां हो, वहीं सब है। संतुष्टि संसार की मृत्यु है। संतोष। लेकिन फिर खयाल रखना, क्योंकि ये प्यारे शब्द खराब हो गए हैं। ये इतनी जबानों पर चले हैं कि नष्ट-भ्रष्ट हो गए हैं। इनके अर्थ विकृत हो गए हैं। आमतौर से "संतोष' शब्द सुनते ही ऐसा खयाल आता है कि ठीक है, जो है उसी में संतोष कर लो। अपने बस में भी नहीं है कि बहुत धन कमा लो, तो अब जितना है, इसी में संतोष कर लो। ऐसा मन मारने का नाम संतोष हो गया है।

संतोष का अर्थ होता है: जीवन को सब तरफ से देखा, सब तरफ से परखा, सब तरफ से स्वाद लिया--और कड़वा पाया। स्वाद लिया और कड़वा पाया। अंगूर के गुच्छे दूर थे; स्वाद लेने का मौका न मिला इसलिए खट्टा कहा, तो काम नहीं होगा।

संतोष जीवन का सार-निचोड़ है; जीवन की सबसे बड़ी संपदा है। लेकिन उन्हीं को मिलता है संतोष, जो जीवन को चखते हैं; जीवन को चखने की कठिनाई से गुजरते हैं। तिक्त है स्वाद। मन-प्राण कड़वे हो जाते हैं। सब तरफ से दौड़ कर देख लिया कि भविष्य की आकांक्षा व्यर्थ है; न कभी आता है कल, न कभी आएगा--इस बोध से दौड़ गई, तृष्णा गई। इस बोध से अब जहां हूं, जैसा हूं, उसी में मगन-भाव हुआ। इस मगन-भाव हुआ। इस मगन-भाव का नाम संतोष है। संतोष बड़ी अदभुत बात है। जहां संतोष आया संसार गया। संसार गया संतोष आया।

ओशो.....♡

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