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Friday, 1 April 2016

मेरे विचार से कंस महामूढ ही था । मूढता मे अहंकार, क्रोध व जिद्द अपने अति पर होना स्वाभाविक है

मेरे विचार से कंस महामूढ ही था । मूढता मे अहंकार, क्रोध व जिद्द अपने अति पर होना स्वाभाविक है

उसके मंत्रीयो ने उसे अलग- अलग बन्दी गृह मे रखने की सलाह दी थी, परन्तु वह अपनेघमण्ड मे चूर इसे अपना अपमान समझा और कहा कि कहॉ मै और कहॉ ये छोटे से बच्चेवो मुझे मार देगे मै पैदा होते ही उनको मार दूगा ।

देखता हू कि मुझे कौन मार सकता है । इसीलिए उसने दोनो को एक ही कैद खाने मे बन्द कर दिया और प्रत्येक शिशु की बेरहमी से हत्या करी । लेकिन संयोगवश आठवा पुत्र बच गया और वही उसकी मृत्यु बना ।

तुम किसी को बदलना चाहते हो , तब वह कभी नही बदलेगा ,लेकिन जो है ,जैसा है, उसे प्रेम करते रहो , वह बदलना आरम्भ हो जाता है !

तुम किसी को बदलना चाहते हो , तब वह कभी नही बदलेगा ,लेकिन जो है ,जैसा है, उसे प्रेम करते रहो , वह बदलना आरम्भ हो जाता है !

वैसे ही जैसे तुम हो जो परम ने तुम्हेदिया, जैसा परम तुम्हे बनाया सभी ओरसे स्वीक्रति हो जाओ! बस परमात्मा तुम्हे बदलना आरम्भ देगा ! दुसरे को बदलना हैतब उसे सिर्फ प्रेम करो उससे कोई शिकायत न करो वह तुम्हारी इच्छा अनुचार बदलाना आरम्भ हो जायेगा !

जब तुम डरा धमका कर और भयभीत करके उसे बदलना चाहते है ,तब नही बदलेगा ! लेकिन वह जो करता है उसे करने दो और प्रेम करते रहो ! उसमे बदलाव आरम्भ हो जायेगा ! तुम अपने आप को बदलना चाहते हो! तब यही सूत्र काम आता है !

तुम परमात्मा से कोई शिकायत या मांग न करो वह जैसा जो करवाता है उसे करते जाओ सिर्फ परम के गुलाम बन जाओ और उसेके हर सुख दुःख में उससे प्रेम करते हो तुम्हे कोई बदलना नहीहै!

सिर्फ तुम्हारे और परमात्मा के बिच काजो संवाद है उसे बदलना है ! उस सम्प्रण में तुम्हे परमात्मा मोत भी देती है तो वह जीवन भी दे देगा! उसने जो तुम्हे दिया है,जो अभी तुम्हे बनाया है उसे सब तरफ से स्वीकार कर लो !

कोई तपस्या नही करनी . कोई विधि से ध्यान नही करना है,कोई पूजा प्राथना नही करनी है ,वह जैसा आपके जीवन को मोड़ रहा उसे मोड़ने दो औरसिर्फ प्रसन्नरहो की जो भी हो रहा है शुभ ही हो रहा है ! सिर्फ स्वीक्रति मात्र चाहिए !

कही लड़ना नही , कही कोई बड़ा संघर्ष नही , उस अवस्था में तुम्हे जो परम बना देगा !जो परिवर्तन देगा जो बदलाव देगा जिसकी आपके पास कोई कल्पना नही है !

तुम्हारा स्म्प्रण दूसरानही देखता है इसलिए यह तुम करने को तेयार नही हो तुम वह करना चाहते जिसमे दूसरा प्रभावित हो ! उसमे तुम्हारा कोई बदलाव नही होता है !

जैसे दिखावी धार्मिकता त्याग ,वस्त्रधारण ,उलटेसीधे दिखाने की साधना उसमे तुम परिवर्तन नही होते है ! वहएक पाखंड का मार्ग है !इन मार्गो से किसी ने कुछ पाया नही है !परमात्मा के प्रति जिसने गुप्त मार्ग अपना लिया, गुप्त स्म्प्रण कर दिया ,गुप्त रूप से प्रेम से सभी के प्रति प्रेम में रहा उसे ही परमात्मा का गुप्त खजाना मिलता है !

उसे बदलाव मिलता है ! सत्य इन आंखे नही देखा जा सकता है, उसी तरह सत्य में होने या परम को सम्प्रण यह सब कुछ गुप्त होना आवश्यक है ! यह परम में होने का प्रथम सूत्र है ! कोई विधि नही, कोई साधना नही ,कोई सन्यास नही, कोई धर्मकर्मकांड नही !

जहा हो जैसे हो कुछ भी अपने को बदलाव के लिए अलग कुछ नही करना है ! इस मार्ग में सभी साधना सभी धर्म फीके है !जबकि तुम क्या कर रहो किसी को कुछ मालूम नही होगा और तुम्हे क्या मिलेगा उसका भी किसी को मालूम नही पड़ेगा लेकिन वह इसी जगह इसी हालत में ,उसी गरीबीमें, उसी रहन सहन भोजन आवास में तुम सर्वगहोंगे !

यह सत्य के लिए प्रमाणिक मार्ग है! लेकिन हमारे अंदर असत्य भरा पड़ा है इसलिए पाखंड लुटेरे भगवान मालूम पड़ते है तब सभाविक है वह तुम्हारे कर्मो का ही मार्ग है ! जो तुम पाखंड का साथ किये हुए है!

OSHO LOVE

स्मरण रखे - जो परमात्मा की शक्ति को जानता है , उसके लिए ज़मीन पर कोई कमजोरी नही रह जाती और जो परमात्मा को पहचानता है , उसके लिए शोषण असंभव है ।

स्मरण रखे - जो परमात्मा की शक्ति को जानता है , उसके लिए ज़मीन पर कोई कमजोरी नही रह जाती और जो परमात्मा को पहचानता है , उसके लिए शोषण असंभव है ।~

ओशो यह ध्यान रखने योग्य , समझने योग्य रहस्य है की जो परमात्मा की शक्ति को , परमात्माके नियम को जान लेता है उसके लिए इस धरती पर उसके लिए कमजोरी नही रहती है !

वह किसी कमजोरी की जंजीर से नही बंधता है ! जिसे परमात्मा की शक्ति का परमात्मा के नियमो काअनुभव नही हो वह कुछ भी बन कर लोगो का शोषण करता रहता है!

वह लोगो को गुरु के नाम ,धर्म के नाम शोषण जारी रखता है!क्योकि उसे सत्य के बारे में या परमात्माके नियम से अवगत नही होता है तब वह किसी भी ढंक से लोगो का शोषण करता ही रहेगा !

जो स्वतंत्र होता है जिसने स्वयं को जान लिया हो वह गुरु, धर्म सत्य के नाम पर लोगो अपने से नही बांधता है ! यह किसी का सत्य में होने या न होने का प्रथम संकेत है

खुदा ईश्वर भगवान और भी बहुत नाम है उसकेकहते तो है कि तु रहता हर जगह है फिर तुझे मन्दिर

खुदा ईश्वर भगवान और भी बहुत नाम है उसकेकहते तो है कि तु रहता हर जगह है फिर तुझे मन्दिर मस्जिद गिरिजा मे ही ढुडते क्यु है

कहते तो है तु एक है बे नाम हैफिर तेरे इतने नाम क्यु हैकहते तो है तु प्रेम स्वरुप हैपर तेरे ही नाम पे इतना खुन खराबा क्यु है

कहते तो है तु रहता है हर एक के अन्दर फिर भी तुझे पाने कि इतनी जद्दो जहत क्यु है

कोइ भुका रहके तुझे मना रहा है
कोइ बिन पिय पानीईश्वर तो भाओ मे बसते है फिर क्यु रचे गय

मन गडत काहनी
Osho

अड़सठ तीर्थ हिंदुओं ने माने हैं,जिनमें स्नान करने सेपरम मुक्ति मिलती है।लेकिन वे अड़सठ

अड़सठ तीर्थ हिंदुओं ने माने हैं,जिनमें स्नान करने सेपरम मुक्ति मिलती है।लेकिन वे अड़सठ तीर्थ तोनक्शे पर बताए गएतीर्थों की भांति हैं।

शरीर के भीतरअड़सठ बिंदु हैं,जिनसे गुजर कर पुण्य कीउपलब्धि होती है।हिंदुओं ने बड़ाअदभुत काम किया है।पृथ्वी पर किसी जाति नेऐसा अदभुत काम नहीं  किया।

बाहर तो प्रतीक हैं औरउन प्रतीकों में जब हमभटक गए तो हिंदुओं कीसारी जीवन-चेतना खो गई।हम कहते हैं कि गंगा जलरामेश्वरम में ले जा कर चढ़ा रहे हैं।भीतर शरीर के बिंदु हैं।

एक बिंदु से ऊर्जा को लेना हैऔर दूसरे बिंदु पर चढ़ाना है।एक बिंदु से ऊर्जा को खींचना हैऔर दूसरे बिंदु तक पहुंचाना है।तब तीर्थ यात्रा हुई।पर हम अब पानी ढो रहे हैं,गंगा से और रामेश्वरम तक।हमने पूरी पृथ्वी कोनक्शे की तरह बना लिया था,आदमी का फैलाव।आदमी के भीतर बड़ासूक्ष्म है सब कुछ।

उसको समझाने के लिएये प्रतीक थे।और इन प्रतीकों कोहमने सत्य मान लिया तोहम भटक गए।प्रतीक कभी सत्य नहीं होते,सत्य की तरफ इशारे होते हैं।

ओशो.....♡

इन सब के लिए कही न कही हम सभी जिम्मेदार है तो जिम्मेदारी भी हम सबको उठानी पड़ेगी।।।

इन सब के लिए कही न कही हम सभी जिम्मेदार है तो जिम्मेदारी भी हम सबको उठानी पड़ेगी।।।

ऐसा नही है के हम कुछ कर नही सकते असल में हम कुछ करना नही चाहते सोचते कोई अवतार आएगा और दुनिया को पाप से बचाएगा नही मेरे दोस्तों ऐसा नही है इस इंतजार से आलसीपन से कुछ नही होगा करना हमे कुछ होगा।।।

कोई अवतार नही आता किसी को बचाने हाँ जब कोई खुद किसी को बचाने की।।

खुद कुछ करने की जिम्मेदारी उठाता है कुछ करने की हिम्मत दिखाता है दुनिया उसी को अवतार पीर पैगम्बर कहने लगती है।।।

तुम सब भी ऐसा कर सकते हो बस जरूरत है अपने अंदर कुछ करने की हिम्मत जगाने की।।।

जरूरी नही के कोई बड़ा काम ही करो।।बस जब भी कही देखो कि किसी को मदद कीजरुरत है और तुम कर सकते हो तो जरूर।।।

नही कर सकते तो चुपचाप निकल जाओ पर अगर कर सकते हो तो जरूर करो।।।और किसी की मदद करके जो ख़ुशी मिलेगी ।।

सच मानो दोस्तों।।।कोई जन्नत और स्वर्ग उसका मुकाबला नही कर सकते।।।

सहजानंद ! दो झूठे लतीफे। पहला --वेदांत सत्संग मंडल की सभा के पश्चात सामूहिक भोजन का आयोजन था। सभी बिना दांत के बूढ़े मौजूद थे। वही अर्थ

सहजानंद ! दो झूठे लतीफे।
पहला --वेदांत सत्संग मंडल की सभा के पश्चात सामूहिक भोजन का आयोजन था। सभी बिना दांत के बूढ़े मौजूद थे। वही अर्थ होता है वेदांत सत्संग मंडल का। उन्हीं में थे श्री मुरदाजी भाई देसाई भी, जो कि सिर्फ भाई ही भाई रह गए हैं, जिनकी जान निकल गई है।

अब भूल कर उनको भाईजान न कहना, बस भाई ही कहना, जान अब कहां!इस एक घटना के कारण वे उस दिन विशेष आकर्षण का कारण बन गए। बात यह हुई कि जब खाना परोसने वाले व्यक्ति ने उनसे पूछा कि क्या आप थोड़ी परमल की सब्जी और लेंगे?

तब श्री मुरदाजी भाई यकायक जीवित हो उठे, अर्थात उन्हें भयंकर क्रोध आ गया। आंखे लाल-पीली करके वे बोले : शर्म नहीं आती बदमाश छोकरे? मुझसे ऐसी गंदी बातें करता है!वह व्यक्ति तो हक्का-बक्का रह गया। समझा कि भूतपूर्व प्रधानमंत्री मजाक कर रहे हैँ।

एक अप्रैल का दिन है, शायद अप्रैल फूल बना रहे हैँ। वह पुनः विनम्रतापूर्वकबोला : जरा चख कर तो देखें श्रीमान! बड़े ही स्वादिष्ट परमल की सब्जी है।इतना सुन कर तो मुरदाजी भाई का खून खौल उठा। उन्होंने थाली में लात मार दी। थाली की झनझनाहट से सभी चौंक पड़े।

मुरदाजी भाई चिल्लाए : हरामजादे, बदतमीजी की भी एक हद होती है! भरी सभा में मेरी बेइज्जती कर रहा है! अपनी औकात भूल रहा है! जानता नहीं मैं कौन था?

सत्संग मंडल के सभी वेदांतियों ने आश्चर्य से मसूड़ों तले अंगुलियां दबा लीं। किसी के पल्ले न पड़े कि आखिर हुआ क्या! मुरदा जी भाई किस बात पर इतने आगबबूला हो रहे हैँ! एक सज्जन द्वारा पूछेजाने पर मुरदा जी भाई ने बताया : यह लफंगा मेरी खिल्ली उड़ा रहा है। मुझसे कहता है स्वादिष्ट परमल की सब्जी खा लो। कमीना कहीं का। क्या मेरे खुद के मल का स्वाद कड़वा है, जो मैं यहां-वहां हर किसी का ऐरे-गेरे नत्थूखैरे का मल खाता फिरू?

अरेआत्म-मल खाता हूं, परमल क्यों खाऊ?और दूसरा झूठा लतीफा --मैंने सुना है कि बेचारे चरणसिंह जब से कुर्सी से उतरे हैँ, तब से बात-बात पर नाराज होते रहते हैं। कुछ कहो, उन्हें कुछसुनाई देता है।

एक दिन की बात है, दोपहर केसमय कुछ पत्रकार उनसे मिलने आए। जब पत्रकारों ने कमरे में प्रवेश किया, उस समय भूतपूर्व प्रधानमंत्री आराम-कुर्सी पर विश्राम कर रहे थे  उदास, आंखे बंद किए हुए।

एक पत्रकार ने यह देख औपचारिकतावश पुछा : एक्सक्यूज़ मी सर, आर यू रिलैक्सिंग?इतना सुनते ही वे गुस्से से तमतमा उठे और बोले : नमकहरामो! चार दिन पहले मेरे आगे-पीछे चक्कर काटते थे, पैर दबाते थे औरअब मुझे पहचानते तक नहीं हो! पूछते हो -- आर यू रिलैक्सिंग? कमबख़्तो, आई एम नॉट रिलैक्सिंग, आई एम चरणसिंग। हैव यू फॉरगॉटन ईवन माय नेम?आज इतना ही।

रहिमन धागा प्रेम का,
ओशो