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Tuesday, 22 March 2016

काबा की तरफ दूर से सिजदा कर लूं,या दहर का आखिरी नजारा कर लूं..मरते वक्त भी, मरण-शथ्या पर भी आदमी के मन में यही सवाल उठते रहते हैं–

काबा की तरफ दूर से सिजदा कर लूं,या दहर का आखिरी नजारा कर लूं..मरते वक्त भी, मरण-शथ्या पर भी आदमी के मन में यही सवाल उठते रहते हैं–

काबा की तरफ दूर से सिजदा कर लूं.....या दहर का आखिरी नजारा कर लूं......मंदिर को प्रणाम कर लूं या इतनी देर संसार को और एक बार देख लूं!या दहर का आखिरी नजारा कर लूं.....

कुछ देर की मेहमान है जाती दुनियाएक और गुनाह कर लूं कि तोबा कर लूंजा रही है दुनिया।कुछ देर की मेहमान है जाती दुनियाजरा और थोड़ा समय हाथ में है।

एक और गुनाह कर लूं कि तोबा कर लूंपश्चात्ताप में गवाऊं यह समय कि एक पापऔर कर लूं!यह तुम्हारी कथा है। यह तुम्हारे मन कीकथा है। यही तुम्हारी कथा है, यही तुम्हारी व्यथा भी।

मरते दम तक भी आदमीभीतर देखने से डरता है। सोचता है, थोड़ा समय और! थोड़ा और रस ले लूं। थोड़ा और दौड़ लूं।इतना दौड़कर भी तुम्हें समझ नहीं आती किकहीं पहुंचे नहीं। इतने भटककर भी तुम्हें खयाल नहीं आता कि बाहर सिवाय भटकाव के कोई मंजिल नहीं है।

ओशो,
एस धम्मो सनंतनो,
भाग -3

कुछ भी ध्यान बन सकता है"धूम्रपान ध्यान "एक व्यक्ति मेरे पास आया। तीस वर्ष से वह सतत धूम्रपान की लत से पीड़ित था। वह बीमार था, और डाॅक्टर उसे कहते " जब तक तुमधूम्रपान करना छोड़ोगे नहीं, कभी स्वस्थ नहीं हो पाओगे

कुछ भी ध्यान बन सकता है"धूम्रपान ध्यान "एक व्यक्ति मेरे पास आया। तीस वर्ष से वह सतत धूम्रपान की लत से पीड़ित था। वह बीमार था, और डाॅक्टर उसे कहते " जब तक तुमधूम्रपान करना छोड़ोगे नहीं, कभी स्वस्थ नहीं हो पाओगे।

" लेकिन वह तो बहुत समय से धूम्रपान से पूर्णतः ग्रसित था, वह उसकी बाबत कुछ कर नहीं सकता था। उसने प्रयास भी किया था —
ऐसा नहीं है कि उसने प्रयास नहीं किया था —उसने कठोर प्रयास किया था,और इस प्रयास करने में उसने बहुत कुछ झेला भी था, लेकिन एक या दो दिन ही बीतते कि फिर से ऐसी जोर की तलब उठती, कि उसे बहका ले जाती।

वह फिर से उसी ढर्रे में लौट जाता।इस धूम्रपान की वजह से ही उसका सारा आत्मविश्वास जाता रहा था : उसे पता था कि वह एक छोटा सा काम भी नहीं कर सकता था, सिगरेट पीना नहीं छोड़ सकता था। वह अपनी ही दृष्टि में बिलकुल अयोग्य हो गया था, वह स्वयं को संसार का सबसे बेकार व्यक्तिमानने लगा था।

उसे अपने लिए कोई सम्मान नहीं रह गया था। वह मेरे पास आया।उसने पूछा "मैं क्या कर सकता हूं? मैं धूम्रपान कैसे छोड़ सकता हूं?" मैंने कहा"धूम्रपान कोई भी नहीं छोड़ सकता। यह तुम्हे समझ लेना है। धूम्रपान करना अब कोई तुम्हारे निर्णय का ही प्रश्न नहीं है। वह तुम्हारे व्यसनों के जगत में प्रवेश कर गया है, उसने जड़ें जमा ली है। तीस वर्ष एक लंबा समय है। उसने तुम्हारे शरीर में, तुम्हारे रसायन में जड़ें पकड़ली है, वह सारे शरीर में फैल गया है।

यह तुम्हारे मस्तिष्क के निर्णय लेने का ही प्रश्न नहीं रह गया है, तुम्हारा मस्तिष्क कुछ भी नहीं कर सकता। मस्तिष्क नपुंसक है, वह चीजों को शुरू कर सकता है, लेकिन इतनी सरलता से उन्हें रोक नहीं सकता। एक बार तुम शुरू हो गए और एक बार तुमने इतना लंबा अभ्यास कर लिया, तुम तो बड़े योगी हो गए —तीस वर्ष से धूम्रपान का अभ्यास चलता है! अब तो यह स्वचलित ही हो गया है, तुम्हें उसे अ-यंत्रवत करना होगा।" वह बोला, "अ - यंत्रवत करने से आपकाक्या तात्पर्य है?"और यही तो ध्यान का सारा उद्देश्य है —अ-यंत्रवत होना।

मैंने कहा "तुम एक काम करो : छोड़ने की बात भूल जाओ। उसकी कोई आवश्यकता भी नहीं है। तीस वर्ष तक तुमने धूम्रपान किया और तुम उसे जी लिए, निश्चित ही तुम्हें उसमें कष्ट तो हुआ परंतु तुम उसके भी आदी हो गए हो। और इससे क्या फर्क पड़ता है यदि तुम उससे कुछ घंटे पहले मर जाओ जब तुम धूम्रपान न करने पर मरते? यहां तुम करोगे क्या? तुमने क्या कर लिया है? तो सार ही क्या है —

तुम सोमवार को मारो या मंगल को मरो या रविवार को, इस वर्ष मरो कि उस वर्ष —इससे फर्क हीक्या पड़ता है?"उसने कहा "हां, यह सच है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।" तो मैंने कहा "भूल जाओ इस बारे में। हम छोड़ने वाले नहीं हैं, बल्कि हम तो इसे समझेंगे। तो अगली बार, तुम इसे एक ध्यान बना लो।"वह बोला "धूम्रपान का ध्यान?"मैंने कहा "हां। जब झेन साधक चाय पीने को ध्यान बना सकते हैं और उसका उत्सव मना सकते हैं, तो क्यों नहीं धूम्रपान भी उतना ही सुंदर ध्यान हो सकता है।"वह तो रोमांचित नजर आने लगा। वह बोला "आप क्या कह रहे हैं?"वह तो जैसे जी उठा। बोला "ध्यान?

मुझे बताएं —मैं प्रतिक्षा नहीं कर सकता!"मैंने उसे ध्यान बताया। मैंने कहा "एक काम करो। जब तुम सिगरेट का पैकेट अपनी जेब से निकालो, तो धीरे-धीरे निकालो। उसका आनंद लो, कोई जल्दी नहीं है। सचेत, सजग, जागरूक रहो। उसे पूरे होश के साथ धीरे-धीरे निकालो। फिर पैकेट में से सिगरेट निकालो तो पूरे होश के साथ धीरे-धीरे —पहले की तरह जल्दबाजी से, बेहोशी में, यंत्रवत होकर नहीं। फिर सिगरेट को पैकेट पर ठोंको —लेकिन बड़े होश के साथ। उसकी आवाज़ को सुनो, जैसे झेनसाधक सुनते हैं जब समोवार गीत गाने लगता है और चाय उबलनेलगती है... और उसकी सुवास! फिर सिगरेट को सूंघो और उसके सौंदर्य को...। "वह बोला " आप क्या कह रहे हैं? सौंदर्य? ""

हां उसमें सौंदर्य है। तंबाकू भी उतनी ही दिव्य है जितनी कोई अन्य चीज। उसे सूंघो, वह परमात्मा की सुगंध है। "वह थोड़ा हैरान हुआ। वह बोला, " क्या! आप मजाक कर रहे हैं? "" नहीं, मैं मजाक नहीं कर रहा। जब मैं मजाकभी करता हूँ तो मजाक नहीं करता। मैं गंभीर हूँ।"फिर पुरे होश के साथ उसे अपने मुँह में रखो, पूरे होश के साथ उसे जलाओ। हर कृत्य का, हर छोटे - छोटे कृत्य का आनंद लो, और उसे जितने छोटे - छोटे खंडों में हो सके बांट लो, ताकि तुम और - और सजग हो सको।" फिर पहला कश लो : जैसे धुंए के रूप में परमात्मा हो।

हिंदू कहते हैं 'अन्नं ब्रम्ह' —'अन्न ब्रम्ह है'। तो फिर धुंआ क्यों नहीं? सभी कुछ परमात्मा है। अपने फेफड़ों को पूरी तरह से भर लो —यह एक प्राणायाम है। मैं तुम्हे नए युग के लिए नया योग दे रहा हूँ! फिर धुंए को छोड़ो, विश्राम करो, फिर दूसरा कश —और बहुत धीरे-धीरे पीओ।यदि तुम ऐसा कर पाओ तो तुम चकित होओगे, शीघ्र ही तुम्हें इसकी सारी मूढ़ता नजर आजाएगी —इसलिए नहीं कि दूसरों ने इसे मूढ़तापूर्ण कहा है, इसलिए नहीं कि दूसरों ने इसे बुरा कहा है। तुम्हें इसकादर्शन होगा। और यह दर्शन मात्र बौद्धिक ही नहीं होगा। यह तुम्हारे पूरे प्राणों से आएगा, यह तुम्हारी समग्रता का बोध होगा। और फिर किसी दिन धूम्रपान छूट जाए, तो छूट जाए, और चलता रहे, तो चलता रहे। तुम्हें इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है।

"तीन महीने बाद वह आया और बोला " लेकिन मेरी सिगरेट तो छूट गई। "" अब" मैंने कहा "इसे दूसरी चीजों के साथ भी करके देखो।"यही राज है : अयंत्रवत हो जाना।चलते हुए, धीरे-धीरे होशपूर्वक चलो। देखते हुए, होशपूर्वक देखो, और तुम पाओगे कि वृक्ष इतने ज्यादा हरे हो गए, जितने हरे वे कभी न थे। और गुलाब इतने ज्यादा गुलाबी हो गए, जितने कि वे कभी न थे। सुनो!कोई बात कर रहा है, गप-शप कर रहा है : सुनो, सजग होकर सुनो। जब तुम बोल रहे हो, तो सजग होकर बोलो। जाग्रत अवस्था के अपने सभी कृत्यों को अयंत्रवत हो जाने दो।

-ओशोध्यान योग

Monday, 21 March 2016

हर कोई है मस्ती का हकदार सखा होली में मौसम करता रंगो की बौछार सखा होली में

हर कोई है मस्ती का हकदार सखा होली में
मौसम करता रंगो की बौछार सखा होली में

मस्तानी लगती है हर नार सखा होली में
बूढ़े भी होते है दमदार सखा होली में

घोंटें हम मिलजुल भंग जब यार सखा होली में
मिट जाती तब सारी तकरार सखा होली में

सास नन्द देवर कब रहते रिश्तेदार सखा होली में
बन जाते सब ही तो हैं बस यार सखा होली में

बस इक बात यही लगे हमको बेकार सखा होली में
क्यों लेकर आती बजट मुई सरकार सखा होली

-डॉ. श्याम सखा श्याम

ક્યારેક શેરી મ્હોલ્લામાં "ઉજવાતી" હતી, આજે પાર્ટી-પ્લોટમાં"રમાતી" થઈ ગઈ.

ક્યારેક શેરી મ્હોલ્લામાં "ઉજવાતી" હતી,

આજે પાર્ટી-પ્લોટમાં"રમાતી" થઈ ગઈ...

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ...

ક્યારેક દિયર-ભાભીની વચ્ચે ખૂબ પ્રેમથી"ઉજવાતી" હતી,

આજે બોયફ્રેન્ડ-ગર્લફ્રેન્ડમાં"રમાતી" થઈ ગઈ..

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ..

.ક્યારેક 'ફાગ'રૂપે "ગવાતી" હતી,આજે ડી.જે.માં "ખોવાઇ" ગઈ..

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ...

ક્યારેક ખજુર-ધાણી-ચણા "સેવ-મમરા" સાથે"ખવાતી" હતી ,

આજે "save environment" અને "save water" સાથે "ચવાઈ" ગઈ...

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ...

ક્યારેક અબીલ-ગુલાલ- કેશુડે "રંગાતી" હતી

આજે "કેમિકલના રંગોમાં "ડઘાઈ" (ડાઘવાળી) ગઈ...

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ...ક્યારેક આગમાં "પ્રગટતી" હતી ,આજે શબ્દોમાં ગંઠાતી થઈ ગઈ....

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ...

ક્યારેક કલમ-ખડિયા વડે ગ્રંથોમાં"વર્ણવાતી"આજે facebook પર લખાતી થઈ ગઈ....

આ હોળી "બિચારી" થઈ ગઈ...

अकबर एक राह से गुजरता था। एक शराबी ने बड़ी गालियां दीं मकान पर चढ़कर। नाराज हुआअकबर। पकड़वा बुलाया शराबी को। रातभर कैद में रखा। सुबह दरबार में बुलाया। वह शराबी

अकबर एक राह से गुजरता था। एक शराबी ने बड़ी गालियां दीं मकान पर चढ़कर। नाराज हुआअकबर। पकड़वा बुलाया शराबी को। रातभर कैद में रखा। सुबह दरबार में बुलाया। वह शराबी झुक-झुककर चरण छूने लगा।

उसने कहा,क्षमा करें। वे गालियां मैंने न दी थीं।अकबर ने कहा, मैं खुद मौजूद था। मैं खुद राह से गुजरता था। गालियां मैंने खुद सुनी हैं। किसी और गवाह की जरूरत नहीं।

उस शराबी ने कहा, उससे मैं इंकार नहीं करता कि आपने सुनी हैं। आपने जरूर सुनी होंगी, लेकिन मैंने नहीं दीं। मैं शराब पीए था। मैं होश में न था। अब बेहोशी के लिए मुझे तो कसूरवार न ठहराओगे! शराब से निकली होंगी, मुझसे नहीं निकलीं। जब से होश आया है, तब से पछता रहा हूं।तुमने जो कुछ किया है, बेहोशी में किया है।

जब होश आएगा, पछताओगे। तुमने जो बसाया है, बेहोशी में बसाया है। जब होश आएगा तब तुम पाओगे, रेत पर बनाए महल। इंद्रधनुषों के साथ जीने की आशा रखी।

कामनाओं के सेतु फैलाए, कि शायद उन से सत्य तक पहुंचने का कोई उपाय हो जाए। तुम्हारी तंद्रा में ही तुम्हारे सारे संसार का विस्तार है।

ओशो, एस धम्मो सनंतनो,
भाग -3,
प्रवचन -21

मैंने सुना है, अमरीका का एक बहुत बड़ा विचारक, अपनी वृद्धावस्था में दुबारा पेरिस देखने आया अपनी पत्नी के साथ। तीस साल पहले भी वे आए थे अपनी सुहागरात मनाने

मैंने सुना है, अमरीका का एक बहुत बड़ा विचारक, अपनी वृद्धावस्था में दुबारा पेरिस देखने आया अपनी पत्नी के साथ। तीस साल पहले भी वे आए थे अपनी सुहागरात मनाने।

फिर तीस साल बाद जब अवकाशप्राप्त हो गया वह, नौकरी से छुटकारा हुआ, तो फिर मन में लगी रह गई थी, फिर पेरिस देखने आया।पेरिस देखा, लेकिन कुछ बात जंची नहीं।

वह जो तीस साल पहले पेरिस देखा था, वह जो आभा पेरिस को घेरे थी तीस साल पहले, वह कहीं खो गई मालूम पड़ती थी। धूल जम गई थी। वह स्वच्छता न थी, वह सौंदर्य न था, वह पुलक न थी। पेरिस बड़ा उदास लगा। पेरिस थोड़ा रोताहुआ लगा। आंखें आंसुओ से भरी थीं पेरिस की। वह थोड़ा हैरान हुआ।

उसने अपनी पत्नी से कहा, क्या हुआ पेरिस को? यह वह बात न रही, जो हमने तीस साल पहले देखी थी। वे रंगीनियां कहां! वह सौंदर्य कहां! वह चहल-पहल नहीं है। लोग थके-हारे दिखाई पड़ते हैं। सब कुछ एक अर्थ में वैसा ही है, लेकिन धूल जम गई मालूम पड़ती है।

पत्नी ने कहा, क्षमा करें, हम बूढ़े हो गए हैं। पेरिस तो वही है। तब हम जवान थे, हममें पुलक थी, हम नाचते हुए आए थे, सुहागरात मनाने आए थे। तो सारे पेरिस मेंहमारी सुहागरात फैल गई थी। अब हम थके-मांदे जिंदगी से ऊबे हुए मरने के लिएतैयार-तो हमारी मौत पेरिस पर फैल गई है।

पेरिस तो वही है।उन जोड़ों को देखें, जो सुहागरात मनाने आए हैं। उनके पैरों में अपनी स्मृतियों की पगध्वनियां सुनाई पड़ सकेंगी।

उनकी आंखोंसे झांकें, जो सुहागरात मनाने आए हैं; उन्हें पेरिस अभी रंगा-रंग है। अभी पेरिस किसी अनूठी रोशनी और आभा से भरा है। अपनी आंखें से मत देखें, तीस साल पहलेलौटें। तीस साल पहले की स्मृति को फिर से जगाएं।ठीक कहा उस पत्नी ने। पेरिस तो सदा वही है, आदमी बदल जाते हैं।

संसार तो वही है। तुम्हारी बदलाहट-और संसार बदल जाता है। संसार तुम पर निर्भर है। संसार तुम्हारा दृष्टिकोण है।

बुद्ध यह सूत्र क्यों कहते हैं? क्या प्रयोजन है? प्रयोजन है यह बताने का कि तुम यह मत सोचना कि संसार ने तुम्हें बांधा। तुम यह मत सोचना कि संसार ने तुम्हें दुखी किया। तुम यह मत सोचना कि संसार बहुत बड़ा है, कैसे पार पा सकूंगा? लोग कहते हैं, भवसागर है, कैसे पार पाएंगे?

ओशो,
एस धम्मो सनंतनो, भाग -2,
प्रवचन -21

બહુ જ કીમતી એ ઘળી નીકળી ગઈ હતી પળ બે પળ જિંદળી નીકળી ગઈ

બહુ જ કીમતી એ ઘળી નીકળી ગઈ

હતી પળ બે પળ જિંદળી નીકળી ગઈ

દિવસ થાય ને રાત આવે અહીં તો

કે મહિના વરસની લળી નીકળી ગઈ

ગયો ગર્વ ફૂલોનો પણ આજ જ્યારે

ખરી ને બધી જ પાંદળી નીકળી ગઈ

હતી ગોદ પર્વત તણી પળ બે પળની

વિવશ થૈ નદી બાપળી નીકળી ગઈ

કરી મેં સિતારા ને તારી ઘણી વાત

નયન આંસુંળે રાતળી નીકળી ગઈ

ન મળ્યો મને એક આ શબદ ‘પ્રેમ’

મગજથી લ્યો બારાખળી નીકળી ગઈ

મહેંકી ગયાં શ્વાસ મારા અંતઃ ના

હવા એમને બસ અડી નીકળી ગઈ

નહીં આ જ સપનાં કદી જોઉં તારા

કરી જીદ બસ બુંદ આંખળી નીકળી ગઈ
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