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Wednesday, 16 March 2016

सारा जीवन हो गया सक्रिय ध्यान करते हुए, कुछ नहीं हुआ! आप कैसे कहते हैं कि सक्रिय ध्यान से कुंडलिनी जागती है? सक्रिय ध्यान संबंधित मेरी पोस्ट पर एक मित्र ने मुझे यह मैसेज भेजा है।

सारा जीवन हो गया सक्रिय ध्यान करते हुए, कुछ नहीं हुआ! आप कैसे कहते हैं कि सक्रिय ध्यान से कुंडलिनी जागती है?

सक्रिय ध्यान संबंधित मेरी पोस्ट पर एक मित्र ने मुझे यह मैसेज भेजा है।

सारा जीवन हो गया सक्रिय ध्यान करते औरकुंडलिनी नहीं जगी तो इसमें सक्रिय ध्यान का कोई दोष नहीं है मित्र।

यदि हम नशे में गाड़ी चलाएंगे और दुर्घटना होगी तो हम गाड़ी को दोषी नहीं ठहरा सकते!यह एक वैज्ञानिक प्रयोग है, या तो हम इसे ठीक तरीके से कर नहीं रहे है, और यदिकरते हैं तो इसे संभाल नहीं रहे हैं।

सद्गुरु कहते हैं कि जिस तरह गर्भवती स्त्री अपनी कोंख में बच्चे को संभालती है, उसी तरह ध्यानी को अपना ध्यान संभालना होता है।

सक्रिय ध्यान का एक-एक चरण महत्वपूर्णहै। हर चरण शरीर और चेतना के एक विशेष तल को प्रभावित करता है।

हमें सक्रिय ध्यान के बाद शरीर और चेतना के तल पर जो गति हुई है, उसे बरकरार रखना होगा।

यानीअगले दिन सुबह, जहां हमने आज छोड़ा है, उससे 'आगे' गति हो, न कि,'वहीं 'से फिर शुरू करना पड़े

जहां से आज किया था।हम सक्रिय ध्यान करते हैं और साथ ही व्यसन भी जारी रखते हैं, सिगरेट और गुटखा-तंबाखू भी लेते रहते हैं।

मैंनेदेखा है ध्यान शिविरों में संन्यासी मित्र ईधर ध्यान करते हैं और उधर बाहर जाकर चुपके से बिड़ी - सिगरेट भी पी लेते हैं।यदि ध्यान प्रयोग के साथ धुम्रपान भी जारी है,

यानी हम सक्रिय ध्यान के पहले चरण में फेफड़े से कार्बन बाहर निकालते हैं और बाद में धुम्रपान करके फिर से फेफड़ों में कार्बन डाल लेते हैं।

अर्थात एक हाथ से ईंट रखी और दूसरे हाथ से वापस निकाल ली! इस तरह से तो मंदिर बनेगा ही नहीं!

सक्रिय ध्यान के पहले चरण ने हमारे शरीर में जो परिवर्तन किये हैं, धुम्रपान उन्हें निष्क्रिय कर देता है।अब आता है दूसरा चरण - दूसरे चरण में हम रेचन द्वारा दमित आवेगों को बाहर निकाल देते हैं।

अब हमें उन्हें वापस भीतर नहीं डालना है। यानी अब तनाव इकट्ठा नहीं करना है। हम बाजार से जिस चीज की हमें जरूरत नहीं होती, वह भी खरीद लाते हैं।

हजारों रूपये बेकार के कार्यों में खर्च कर देते हैं, लेकिन दो- पाँच रूपयों के लिए सब्जीवालों, फेरीवालों या फिर बस कंडक्टर से झीक-झीक करते हैं।

घर-परिवार और मित्रों से छोटी - छोटी बातों पर विवाद करते हैं। यानी फिर से तनाव इकट्ठा कर लेते हैं,

अर्थात हमारा सक्रिय ध्यान का दूसरा चरण बेकार गया! यहां हमने फिर ईंट वापस निकाल ली।सक्रिय ध्यान के इस दूसरे चरण को संभालने के लिए हमें 'स्वीकार' भाव रखना होगा।

जो है, जैसा है, मुझे स्वीकार है। बस। इतना यदि हम करते हैं तो अनावश्यक तनाव से बचेंगे और हमारा दूसरा चरण भी पूरा हो जाएगा।

अब आता है तीसरा चरण - तीसरा चरण विचारों पर चोट करता है। दो विचारों केबीच अंतराल (गैप) पैदा करता है।

हमें अनावश्यक बहस, बिना काम की बातचीत और बिना सार की चीजें पढ़ने सुनने से बचनाहोगा। यदि हम फ्री रहते हैं तो अपने को अखबार और टेलीविजन इत्यादि में व्यस्तरखते हैं,

बेहतर होगा अपने काम के अतिरिक्त जो समय है, उसे 'ना कुछ' करने में बतायें, अकेले और मौन रहने में बताएं।

इस तरह हम सक्रिय ध्यान के चरणों को बरकरार रख उसे पूरा कर सकते हैं।सक्रिय ध्यान एक वैज्ञानिक विधि है। यदि यह काम नहीं कर रहा है, इसमें हमसे ही कहीं चूक हो रही है।

यह विधि हमें 'पूरा' मांगती है। तभी तो सद्गुरु पहले हमें संकल्प करवाते हैं,

वह भी परमात्मा को साक्षी रखकर! कि "मैं परमात्मा को साक्षी रखकर संकल्प करता हूँ कि ध्यान में अपनी पूरी शक्ति लगा दूंगा 'पूरी'।" एक बार नहीं, बल्कि तीन बार करवाते हैं,

ताकि संकल्प हमारे भीतर गहरा उतर सके। संकल्प और पूरी शक्ति होगी तभी यह विधि काम करेगी। यह विधि ध्यान नहीं है,

ध्यान में प्रवेश के लिये यात्रापथ का निर्माण करती है। ध्यान में प्रवेश करने के बाद हमें पताचलेगा कि आगे इसे करना है या नहीं।

जीवन भर करने की जरूरत ही नहीं है। यह विधि प्राथमिक है, 'सक्रिया' से 'अक्रिया' में यानी ध्यान में ले जाने के लिये है।

-स्वामी ध्यान उत्सव

Tuesday, 15 March 2016

जो मांगता ही चलता है.... एक कहानी मैंने सुनी है। एक शहर में एक नई दुकान खुली। जहां कोई भी युवक जाकर अपने लिए एक योग्य पत्नी ढूंढ़ सकता था। एक युवक उस दुकान पर पहुंचा। दुकान के अंदर उसे दो दरवाजे मिले। एक पर लिखा था, युवा पत्नी; और दूसरे पर लिखा था, अधिक उम्र वाली पत्नी!


युवक ने पहले द्वार पर धक्का लगाया और अंदर पहुंचा। फिर उसे दो दरवाजे मिले। पत्नी वगैरह कुछ भी न मिली। फिर दो दरवाजे! पहले पर लिखा था, सुंदर; दूसरे पर लिखा था, साधारण।

युवक ने पुनः पहले द्वार में प्रवेश किया। न कोई सुंदर था न कोई साधारण, वहां कोई था ही नहीं। सामरे फिरदो दरवाजे मिले, जिन पर लिखा था: अच्छा खाना बनानेवाली और खाना न बनानेवाली।

युवक ने फिर पहला दरवाजा चुना। स्वाभाविक, तुम भी यही करते। उसके समक्ष फिर दो दरवाजे आए, जिन पर लिखा था:अच्छा गाने वाली और गाना न गाने वाली।

युवक ने पुनः पहले द्वार का सहारा लियाऔर अब की उसके सामने दो दरवाजों पर लिखा था: दहेज लानेवाली और न दहेज लानेवाली।

युवक ने फिर पहला दरवाजा चुना। ठीक हिसाब से चला। गणित से चला। समझदारी से चला। परंतु इस बार उसके सामने एक दर्पण लगा था, और उस पर लिखा था,

“आप बहुत अधिक गुणों के इच्छुक हैं।समय आ गया है कि आप एक बार अपना चेहरा भीदेख लें।’ऐसी ही जिंदगी है: चाह, चाह, चाह! दरवाजों की टटोल। भूल ही गए, अपना चेहरादेखना ही भूल गए!

जिसने अपना चेहरा देखा, उसकी चाह गिरी। जो चाह में चला, वहधीरे-धीरे अपने चेहरे को ही भूल गया। जिसने चाह का सहारा पकड़ लिया, एक चाह दूसरे में ले गई, हर दरवाजे दो दरवाजों पर ले गए, कोई मिलता नहीं।

जिंदगी बस खाली है। यहां कभी कोई किसी को नहीं मिला। हां, हर दरवाजे पर आशा लगी है कि और दरवाजे हैं। हर दरवाजे पर तख्ती मिली कि जरा और चेष्टा करो। आशा बंधाई।आशा बंधी। फिर सपना देखा। लेकिन खाली ही रहे।

अब समय आ गया, आप भी दर्पण के सामने खड़े होकर देखो। अपने को पहचानो!जिसने अपने को पहचाना वह संसार से फिर कुछ भी नहीं मांगता। क्योंकि यहां कुछ मांगने जैसा है ही नहीं।

जिसने अपने कोपहचाना, उसे वह सब मिल जाता है जो मांगा था, नहीं मांगा था। और जो मांगता ही चलता है, उसे कुछ भी नहीं मिलता है।

      जिनसूत्रओशो

जो मांगता ही चलता है.... एक कहानी मैंने सुनी है। एक शहर में एक नई दुकान खुली। जहां कोई भी युवक जाकर अपने लिए एक योग्य पत्नी ढूंढ़ सकता था। एक युवक उस दुकान पर पहुंचा। दुकान के अंदर उसे दो दरवाजे मिले। एक पर लिखा था, युवा पत्नी; और दूसरे पर लिखा था, अधिक उम्र वाली पत्नी!


युवक ने पहले द्वार पर धक्का लगाया और अंदर पहुंचा। फिर उसे दो दरवाजे मिले। पत्नी वगैरह कुछ भी न मिली। फिर दो दरवाजे! पहले पर लिखा था, सुंदर; दूसरे पर लिखा था, साधारण।

युवक ने पुनः पहले द्वार में प्रवेश किया। न कोई सुंदर था न कोई साधारण, वहां कोई था ही नहीं। सामरे फिरदो दरवाजे मिले, जिन पर लिखा था: अच्छा खाना बनानेवाली और खाना न बनानेवाली।

युवक ने फिर पहला दरवाजा चुना। स्वाभाविक, तुम भी यही करते। उसके समक्ष फिर दो दरवाजे आए, जिन पर लिखा था:अच्छा गाने वाली और गाना न गाने वाली।

युवक ने पुनः पहले द्वार का सहारा लियाऔर अब की उसके सामने दो दरवाजों पर लिखा था: दहेज लानेवाली और न दहेज लानेवाली।

युवक ने फिर पहला दरवाजा चुना। ठीक हिसाब से चला। गणित से चला। समझदारी से चला। परंतु इस बार उसके सामने एक दर्पण लगा था, और उस पर लिखा था,

“आप बहुत अधिक गुणों के इच्छुक हैं।समय आ गया है कि आप एक बार अपना चेहरा भीदेख लें।’ऐसी ही जिंदगी है: चाह, चाह, चाह! दरवाजों की टटोल। भूल ही गए, अपना चेहरादेखना ही भूल गए!

जिसने अपना चेहरा देखा, उसकी चाह गिरी। जो चाह में चला, वहधीरे-धीरे अपने चेहरे को ही भूल गया। जिसने चाह का सहारा पकड़ लिया, एक चाह दूसरे में ले गई, हर दरवाजे दो दरवाजों पर ले गए, कोई मिलता नहीं।

जिंदगी बस खाली है। यहां कभी कोई किसी को नहीं मिला। हां, हर दरवाजे पर आशा लगी है कि और दरवाजे हैं। हर दरवाजे पर तख्ती मिली कि जरा और चेष्टा करो। आशा बंधाई।आशा बंधी। फिर सपना देखा। लेकिन खाली ही रहे।

अब समय आ गया, आप भी दर्पण के सामने खड़े होकर देखो। अपने को पहचानो!जिसने अपने को पहचाना वह संसार से फिर कुछ भी नहीं मांगता। क्योंकि यहां कुछ मांगने जैसा है ही नहीं।

जिसने अपने कोपहचाना, उसे वह सब मिल जाता है जो मांगा था, नहीं मांगा था। और जो मांगता ही चलता है, उसे कुछ भी नहीं मिलता है।

      जिनसूत्रओशो

OSHO कभी-कभी नहीं, सदा ही ज्ञानी साथ-साथ रोता और हंसता है। हंसता है अपने को देखकर, रोता है तुम्हें देखकर। हंसता है यह देखकर, कि जीवन की संपदा कितनी

कभी-कभी नहीं, सदा ही ज्ञानी साथ-साथ रोता और हंसता है। हंसता है अपने को देखकर, रोता है

तुम्हें देखकर। हंसता है यह देखकर, कि जीवन की संपदा कितनी सरलता से उपलब्ध है। रोता है यह देखकर, कि करोड़ों-करोड़ों लोग व्यर्थ ही निर्धन बने हैं।

हंसता है यह देखकर कि सम्राट होना बिलकुल सुगम था और रोता हैयह देखकर कि फिर क्यों अरबों लोग भिखारी बने हैं?जिसे तुम पाकर ही पैदा हुए हो, जिसे तुमने कभी खोया नहीं,

जिसे तुम चाहो तो भी खो न सकोगे, जिसे खोने का उपाय ही नहीं है, उसे तुमने खो दिया है यह देखकर रोता है।यह देखकर हंसता है, कि जो मुझे मिल गया है, उससे मिलाने के लिए कुछ भी करने की कभी कोई जरूरत न थी।

कहीं जाने की, किसी यात्रा की कोई जरूरत न थी। यह देखकर हंसता है कि सभी मेरे भीतर था और मैं कैसे चूकता रहा!और अचानक एक क्षण में आती है आंधी और सब कूड़ा-करकट उड़ जाता है। और भीतर परमात्मा विराजमान है।

तुम उसके मंदिरहो।तो जब भी भीतर देखता है, मुस्कुराता है; जब भी बाहर देखता है, उसकी आंखें आंसुओंसे भर जाती हैं।और ऐसा एक ज्ञानी के साथ नहीं होता, सभी ज्ञानियों के साथ होता है–और होगा ही।

इससे अन्यथा होने का उपाय नहीं है।इतना सरल है और इतना कठिन हो गया है!कबीर कहते हैं, कि मुझे हंसी आती है कि मछली पानी में क्यों प्यासी है?

चारों तरफ पानी ही पानी है, बाहर भीतर पानी ही पानी है; मछली पानी में ही पैदा होती है,पानी में ही जीती है, पानी में ही लीन होजाती है; फिर भी प्यासी!
    
    तो कबीर कहते हैं,

“मुझे आवै हांसी”; मुझे बड़ी हंसी आती है।आदमी परमात्मा में ही पैदा होता है, जैसे परमात्मा सागर हो तुम्हारे चारोंतरफ–और चारों तरफ ही नहीं, भीतर भी। वही हो भीतर, वही हो बाहर और फिर भी तुम अतृप्त रह जाओ।

अहर्निश उसका नाद बज रहा हो और तुम्हें धुन भी न सुनाई पड़े, एक कण भी तुम्हारे कानों में न आए। चारों ओर उसी के फूल खिलते हों

और तुम्हें कोई सुगंध न मिले। सब तरफ उसी की रोशनी हो और तुम अंधे ही बने रहो और अपने अंधेरे में ही जी लो।इस उलझन को देखकर ज्ञानी हंसता भी है, रोता भी है।

तुम पर उसे दया भी आती है और तुम्हारी अत्यंत हास्यास्पद स्थिति देखकर वह हैरान भी होता है।और इसलिए अक्सर ज्ञानी पागल मालूम होगा। क्योंकि तुम उस आदमी को भी समझ सकते हो, जो रोता हो–दुखी होगा।

तुम उस आदमी को भी समझ सकते हो, जो हंसताहै–सुखी होगा। वह आदमी तुम्हारी समझ के बाहर हो जाता है, जो हंसता भी है, रोता भी है साथ-साथ!अलग-अलग तुम समझ लेते हो। तुम भी हंसे हो, तुम भी रोए हो। हंसे हो, जब प्रसन्न थे;

एक मनोदशा थी। रोए हो, जब दुखी थे; एकदूसरी मनोदशा थी। कभी दिन था, कभी रात थी; कभी सुख था, की दुख था; कभी खिले थे, कभी मुरझा गए थे। उन दोनों स्थितियों को तुम जानते हो; लेकिन दोनों साथ-साथ तो तुमने या तो पागल में देखी हैं,

या ज्ञानी में देखी हैं।पागलखाने में जाओ तो तुम्हें पागल कभी-कभी, हंसते-रोते, साथ-साथ मिल जाएंगे। और ज्ञानी में फिर यही घटना घटती है।तो ज्ञानी पागल जैसा लगता है।

इसलिए बहुत बार ज्ञानियों से हम वंचित ही रह गए हैं। क्योंकि बेबूझ मालूम पड़ती है, वह जो कहता है, पहेलियां मालूम होती हैं। वह जो कहता है, उससे कुछ सुलझता नहीं, और उलझता मालूम पड़ता है।

उसे देखकर ऐसा नहीं लगता है, कि कोई समाधान मिल जाएगा। ऐसा लगता है, कि तुम वैसे ही उलझे थे, इसे देखकर और उलझ जाओगे।हंसता और रोता है साथ-साथ, इसका गहरा अर्थ है। इसका अर्थ है, कि जिनको तुमने अब तक विपरीत की तरह जाना है,

ज्ञानी उन्हें एक की तरह जानता है। उपनिषद कहते हैं, “एकं सत विप्रा बहुधा वदंति”। एक ही सत्य है; जानने वालों ने उसे बहुत ढंग से कहा। एक ही अवस्था है जीवन की, अभिव्यक्ति बहुत तरह से हो सकती है।वही रोता है, वही हंसता है; वह एक ही है–एकं सत। वह सत्य एक ही है, जो हंसता है और रोता है।

जो दुखी होता है, जो सुखीहोता है, वह एक ही है।लेकिन तुम कभी उसे देख नहीं पाए। या तो तुमने उसे दुखी देखा, जब दुखी देखा, तब तुम सुख को भूल गए। और जब तुमने उसे सुखी देखा, तब तुम दुख को भूल गए। इसलिए तुम्हारे जीवन में अधूरापन है।

तुम उसे अखंड न देख पाए, कि वही हंसता है, वही रोता है। और अगर तुम यह देख पाओ कि वही हंसता है, वही रोता है, तो तुम दोनोंके पार हो गए। हंसना एक भाव-दशा रह गई, रोना भी एक भाव-दशा रह गई, तुम साक्षी हो गए। तुम जाग गए।तो ज्ञानी जागता है।

उस जागने में सभी अवस्थाएं सम्मिलित हो जाती हैं एक साथ। तुम खंड-खंड हो, ज्ञानी अखंड है। इसलिए ज्ञानी के सुख में भी तुम दुख की छाया पाओगे। और ज्ञानी के दुख में भी तुम सुख का रंग देखोगे।

      ��ओशो��
कहे कबीर दीवाना–प्रवचन–16

तुम अपने प्रेम को शुद्ध करो। तुम उसे प्रार्थना बनाओ। तुम दो ,और मांगने की इच्छा मत करो। और तुम जिसे दो, उस पर कब्जा न करो। और तुम जिसे दो, उस से अपेक्षा धन्यवाद की भी मत करो।

तुम अपने प्रेम को शुद्ध करो। तुम उसे प्रार्थना बनाओ। तुम दो ,और मांगने की इच्छा मत करो। और तुम जिसे दो, उस पर कब्जा न करो। और तुम जिसे दो, उस से अपेक्षा धन्यवाद की भी मत करो।

उतनी अपेक्षा भी सौदा है। और तुम दो, क्योंकितुम्हारे पास है। और मैं तुम से कहता हूं कि तुम अगर दोगे, तो हजार गुना तुम्हारे पास आएगाःमगर मांगो मत। भिखमंगों के पास नहीं आता है, सम्राटों के पास आता है।

जो मांगते हैं उनके पास नहीं आता। तुम मांगो ही मत। एक बार यह भी तो प्रयोग करके देखो कि तुम चाहो और दो, मगर मांगो मत।नेकी कर और कुएं में डाल। पीछे लौटकर ही मत देखो, धन्यवाद की भी प्रतीक्षा मतकरो।

और तुम पाओगे, कितने लोग तुम्हारे निकट आते हैं! कितने लोग तुम्हारे प्रेम के लिए आतुर हैं! कितने लोग तुम्हारे पास बैठना चाहते है! कितने लोग तुम्हारी मौजूदगी से अनुगृहीत हैं!

दुनिया में प्रेम बहुत शक्तिशाली संजीवनी है; प्रेम से अधिक कुछ भी गहरा नहीं जाता। यह सिर्फ शरीर का ही उपचार नहीं करता, सिर्फ मन का ही नहीं, बल्कि आत्मा का भी उपचार करता है।

यदि कोई प्रेम कर सके तो उसके सभी घाव विदा हो जाएंगे।तब तुम पूर्ण हो जाते हो--और पूर्ण होना पवित्र होना है। अब जब तक कि तुम पूर्ण नहीं हो, तुम पवित्र नहीं हो।

शारीरिक स्वास्थ्य सतही घटना है। यह दवाई के द्वारा भी हो सकता है, यह विज्ञान के द्वारा भी हो सकता है।लेकिन किसी का आत्यंतिक मर्म प्रेम से ही स्वस्थ हो सकता है।

वे जो प्रेम का रहस्य जानते हैं वे जीवन का महानतम रहस्य जानते हैं। उनके लिए कोई दुख नहीं बचता, कोई बुढ़ापा नहीं, कोई मृत्यु नहीं।

निश्चित ही शरीर बूढ़ा होगा और शरीर मरेगा, लेकिन प्रेम यह सत्य तुम पर प्रगट करता है कि तुम शरीर नहीं हो।तुम शुद्ध चेतना हो, तुम्हारा कोई जन्म नहीं है, कोई मृत्यु नहीं है। और उस शुद्ध चेतना में जीना जीवन की संगति में जीना है.........

        �ओशो

मंत्र का अर्थ है: किसी चीज को बार—बारदोहराना। यह सूत्र कह रहा है: चित्त ही मंत्र है—चित्त मंत्र:। यह कहता है, औरकिसी मंत्र की जरूरत नहीं;

मंत्र का अर्थ है: किसी चीज को बार—बारदोहराना। यह सूत्र कह रहा है: चित्त ही मंत्र है—चित्त मंत्र:। यह कहता है, औरकिसी मंत्र की जरूरत नहीं;

अगर तुम चित्त को समझ लो तो चित्त की प्रक्रियाही पुनरुक्ति है। तुम्हारा मन कर क्या रहा है जन्मों—जन्मों से—सिर्फ दोहरा रहा है।

सुबह से सांझ तक तुम करते क्या हो—रोज वही दोहराते हो, जो तुमने कल किया था, जो परसों किया था,

वहीतुम आज कर रहे हो; वही तुम कल भी करोगे, अगर न बदले। और तुम जितना वही करते जाओगे उतनी ही पुनरुक्ति प्रगाढ होती जायेगी और तुम झंझट में इस तरह फंस जाओगे कि बाहर आना मुश्किल हो जायेगा।

लोग मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि सिगरेट नहीं छूटती। सिगरेट मंत्र बन गयी है। उन्होंने इतनी बार दोहराया है—दिन में दो पैकेट पी रहे है। इसका मतलब हुआ कि चौबीस बार दोहरा रहे है; बीस बार दोहरा रहे हैं, बार—बार दोहराया है और सालों से दोहरा रहे है;

आज अचानक छोड़ देना चाहते हैं। लेकिन जोचीज मंत्र बन गयी, उसको अचानक नहीं छोड़ाजा सकता। तुम छोड़ दोगे इससे क्या फर्क पड़ता है;

पूरा मन मांग करेगा। पूरा शरीर उसको दोहरायेगा। वह कहेगा—चाहिए। उसी को तुम तलफ कहते हो। तलफ का मतलब हुआ कि जिस चीज को तुमने मंत्र बना लिया,

उसे अचानक छोड़ना चाहते हो—यह नहीं हो सकता। तलफ का मतलब है किजो चीज मंत्र बन गयी है, उसके विपरीत मंत्र से तोड़ना होगा।

रूस में पावलव ने इस पर बहुत काम किया। और पावलव अकेला आदमी है, जिसने तलफ वालेमरीजों को ठीक करने में सफलता पायी।

अगर आप सिगरेट पीने के रोगी हो गये हैं छोड़ना चाहते हैं और नहीं छूटती तो पावलव मंत्र का प्रयोग करता था। उसके मंत्र जरा तेज थे।

वह आपको सिगरेट देगाऔर जैसे ही आप सिगरेट हाथ में लेंगे, आपको बिजली का शाक लगेगा; झनझना जायेगीपूरी तबीयत, सिगरेट हाथ से छूट जायेगी।

ऐसा सात दिन आपको पावलव भरती रखेगा अपने अस्पताल में और जब भी आप सिगरेट पियेंगे, तब बिजली का शाक लगेगा।

सात दिन में मंत्र सिगरेट से ज्यादा गहरा हो जायेगा। सिगरेट का नाम ही सुनकर आपको कंपकंपी आने लगेगी। पीने का रस तोदूर, एक वैराग्य का उदय हो जायेगा।

पावलव ने हजारों मरीज विपरीत मंत्र से ठीक किये। और पावलव कहता है कि जो लोग भी आदतों से ग्रस्त हो गये हैं,

जब तक उनको विपरीत आदतें न दी जायें, जो पहली आदत से ज्यादा मजबूत हों तब तक कोई छुटकारा नहीं।

शिव–सूत्र–प्रवचन–4चित्त के अतिक्रमण के उपाय—(प्रवचन—चौथा)

OSHO कभी-कभी नहीं, सदा ही ज्ञानी साथ-साथ रोता और हंसता है। हंसता है अपने को देखकर, रोता है तुम्हें देखकर। हंसता है यह देखकर, कि जीवन की संपदा कितनी

कभी-कभी नहीं, सदा ही ज्ञानी साथ-साथ रोता और हंसता है। हंसता है अपने को देखकर, रोता है

तुम्हें देखकर। हंसता है यह देखकर, कि जीवन की संपदा कितनी सरलता से उपलब्ध है। रोता है यह देखकर, कि करोड़ों-करोड़ों लोग व्यर्थ ही निर्धन बने हैं।

हंसता है यह देखकर कि सम्राट होना बिलकुल सुगम था और रोता हैयह देखकर कि फिर क्यों अरबों लोग भिखारी बने हैं?जिसे तुम पाकर ही पैदा हुए हो, जिसे तुमने कभी खोया नहीं,

जिसे तुम चाहो तो भी खो न सकोगे, जिसे खोने का उपाय ही नहीं है, उसे तुमने खो दिया है यह देखकर रोता है।यह देखकर हंसता है, कि जो मुझे मिल गया है, उससे मिलाने के लिए कुछ भी करने की कभी कोई जरूरत न थी।

कहीं जाने की, किसी यात्रा की कोई जरूरत न थी। यह देखकर हंसता है कि सभी मेरे भीतर था और मैं कैसे चूकता रहा!और अचानक एक क्षण में आती है आंधी और सब कूड़ा-करकट उड़ जाता है। और भीतर परमात्मा विराजमान है।

तुम उसके मंदिरहो।तो जब भी भीतर देखता है, मुस्कुराता है; जब भी बाहर देखता है, उसकी आंखें आंसुओंसे भर जाती हैं।और ऐसा एक ज्ञानी के साथ नहीं होता, सभी ज्ञानियों के साथ होता है–और होगा ही।

इससे अन्यथा होने का उपाय नहीं है।इतना सरल है और इतना कठिन हो गया है!कबीर कहते हैं, कि मुझे हंसी आती है कि मछली पानी में क्यों प्यासी है?

चारों तरफ पानी ही पानी है, बाहर भीतर पानी ही पानी है; मछली पानी में ही पैदा होती है,पानी में ही जीती है, पानी में ही लीन होजाती है; फिर भी प्यासी!
    
    तो कबीर कहते हैं,

“मुझे आवै हांसी”; मुझे बड़ी हंसी आती है।आदमी परमात्मा में ही पैदा होता है, जैसे परमात्मा सागर हो तुम्हारे चारोंतरफ–और चारों तरफ ही नहीं, भीतर भी। वही हो भीतर, वही हो बाहर और फिर भी तुम अतृप्त रह जाओ।

अहर्निश उसका नाद बज रहा हो और तुम्हें धुन भी न सुनाई पड़े, एक कण भी तुम्हारे कानों में न आए। चारों ओर उसी के फूल खिलते हों

और तुम्हें कोई सुगंध न मिले। सब तरफ उसी की रोशनी हो और तुम अंधे ही बने रहो और अपने अंधेरे में ही जी लो।इस उलझन को देखकर ज्ञानी हंसता भी है, रोता भी है।

तुम पर उसे दया भी आती है और तुम्हारी अत्यंत हास्यास्पद स्थिति देखकर वह हैरान भी होता है।और इसलिए अक्सर ज्ञानी पागल मालूम होगा। क्योंकि तुम उस आदमी को भी समझ सकते हो, जो रोता हो–दुखी होगा।

तुम उस आदमी को भी समझ सकते हो, जो हंसताहै–सुखी होगा। वह आदमी तुम्हारी समझ के बाहर हो जाता है, जो हंसता भी है, रोता भी है साथ-साथ!अलग-अलग तुम समझ लेते हो। तुम भी हंसे हो, तुम भी रोए हो। हंसे हो, जब प्रसन्न थे;

एक मनोदशा थी। रोए हो, जब दुखी थे; एकदूसरी मनोदशा थी। कभी दिन था, कभी रात थी; कभी सुख था, की दुख था; कभी खिले थे, कभी मुरझा गए थे। उन दोनों स्थितियों को तुम जानते हो; लेकिन दोनों साथ-साथ तो तुमने या तो पागल में देखी हैं,

या ज्ञानी में देखी हैं।पागलखाने में जाओ तो तुम्हें पागल कभी-कभी, हंसते-रोते, साथ-साथ मिल जाएंगे। और ज्ञानी में फिर यही घटना घटती है।तो ज्ञानी पागल जैसा लगता है।

इसलिए बहुत बार ज्ञानियों से हम वंचित ही रह गए हैं। क्योंकि बेबूझ मालूम पड़ती है, वह जो कहता है, पहेलियां मालूम होती हैं। वह जो कहता है, उससे कुछ सुलझता नहीं, और उलझता मालूम पड़ता है।

उसे देखकर ऐसा नहीं लगता है, कि कोई समाधान मिल जाएगा। ऐसा लगता है, कि तुम वैसे ही उलझे थे, इसे देखकर और उलझ जाओगे।हंसता और रोता है साथ-साथ, इसका गहरा अर्थ है। इसका अर्थ है, कि जिनको तुमने अब तक विपरीत की तरह जाना है,

ज्ञानी उन्हें एक की तरह जानता है। उपनिषद कहते हैं, “एकं सत विप्रा बहुधा वदंति”। एक ही सत्य है; जानने वालों ने उसे बहुत ढंग से कहा। एक ही अवस्था है जीवन की, अभिव्यक्ति बहुत तरह से हो सकती है।वही रोता है, वही हंसता है; वह एक ही है–एकं सत। वह सत्य एक ही है, जो हंसता है और रोता है।

जो दुखी होता है, जो सुखीहोता है, वह एक ही है।लेकिन तुम कभी उसे देख नहीं पाए। या तो तुमने उसे दुखी देखा, जब दुखी देखा, तब तुम सुख को भूल गए। और जब तुमने उसे सुखी देखा, तब तुम दुख को भूल गए। इसलिए तुम्हारे जीवन में अधूरापन है।

तुम उसे अखंड न देख पाए, कि वही हंसता है, वही रोता है। और अगर तुम यह देख पाओ कि वही हंसता है, वही रोता है, तो तुम दोनोंके पार हो गए। हंसना एक भाव-दशा रह गई, रोना भी एक भाव-दशा रह गई, तुम साक्षी हो गए। तुम जाग गए।तो ज्ञानी जागता है।

उस जागने में सभी अवस्थाएं सम्मिलित हो जाती हैं एक साथ। तुम खंड-खंड हो, ज्ञानी अखंड है। इसलिए ज्ञानी के सुख में भी तुम दुख की छाया पाओगे। और ज्ञानी के दुख में भी तुम सुख का रंग देखोगे।

      ��ओशो��
कहे कबीर दीवाना–प्रवचन–16