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Monday, 14 March 2016

OSHO तुमने कहानी सुनी? एक आदमी अपनी पत्नी के साथ अपने गधे को लेकर कहीं जा रहा था। राह में कुछ लोग मिले। दोनों पैदल चल रहे थे,

तुमने कहानी सुनी? एक आदमी अपनी पत्नी के साथ अपने गधे को लेकर कहीं जा रहा था। राह में कुछ लोग मिले। दोनों पैदल चल रहे थे, क्योंकि दो गधे थे नहीं, एक गधा था। और गधा कमजोर था और दो को सम्हाल नहीं सकता था।

उन आदमियों ने कहा, हइ के मूरख मालूम होते हो, गधे को किसलिए लिए हो, और बैठते क्यों नहीं! यह गधे को काहे के लिए चल रहे हो? यात्रा पर जा रहे हो, गधे पर बैठो।

तो उस आदमी ने कहा कि म्लू बनने से तो यही बेहतर है,गधे पर बैठ जाएं; तो वह गधे पर बैठ गया, पत्नी उसकी नीचे साथ—साथ चलने लगी।दूसरी भीड़ मिली, उन्होंने कहा, हइ हो गयी, यह मूरख देखो, पत्नी को चलवा रहा हैपैदल, खुद गधे पर बैठे हैं! अरे मर्द बच्चा होकर चलता नहीं है नीचे! स्त्री को ऊपर बिठा!

उसने कहा, यह बात भी ठीक है। तो वह नीचे चलने लगा, स्त्री को ऊपर बिठा दिया।फिर कुछ लोग मिले, उन्होंने कहा, यह देखो मजा! आ गया कलियुग, स्त्री गधे पर बैठी है, पति नीचे चल रहा है! अरे, पति परमात्मा है! तो उन्होंने कहा, अब क्या करना, बड़ी मुसीबत; तो कहा, दोनों ही बैठ जाओ। तो दोनों गधे पर बैठ गए।

थोड़ी देर बाद फिर लोग मिले, उन्होंने कहा। देखो मार डालोगे गधे को; तुम गधे मालूम होते हो, गधे की जान निकली जा रही है, कमर झुकी जा रही है, दो—दो चढ़े बैठे हो! शरमनहीं आती?

आखिर पशुओं में भी प्राण हैं!तो उन्होंने कहा, अब क्या, करना क्या! तोउन्होंने कहा, अब एक ही उपाय बचा है कि हम गधे को लेकर चलें, क्योंकि और तो सब उपाय कर देखे।

तो एक रस्सी में गधे को बांधकर, उसकी टागों में रस्सी डालकर, डंडा पिरोकर कंधे पर रखकर दोनों चले।थोड़ी दूर गए थे कि फिर लोग मिल गए।

उन्होंने कहा, यह क्या कर रहे हो? होश है? हमने आदमी देखे गधे पर चढ़े, मगर गधा आदमी पर चढ़ा नहीं देखा, तुम कर क्या रहे हो?यह पुरानी पंचतंत्र की कथा है। मगर सार्थक है।

ऐसी ही दशा है। यहां अगर तुम लोगों की मानकर चलते रहो तो तुम जीवन में कभी भी थिर न हो सकोगे। चुप हुए तो लोग निंदा करेंगे, बोले तो निंदाकरेंगे। कुछ भी करो, लोग निंदा करेंगे। इस सूत्र का अर्थ क्या है?

इस सूत्र का अर्थ है कि निंदा का रस जिसको लेना है वह कारण खोज लेगा। इसलिए तुम निंदा करने वालों की चिंता मत करना।इसलिए बुद्ध कहते है, मूढ़ क्या कहते हैं, इस पर ध्यान देने की जरूरत भी नहींहै। मूढ़ तो मूढ़ता की बातें कहते रहेंगे।

तुम तो वही करना जो तुम्हारी प्रज्ञा तुम्हें करने को कहे। तुम्हेंअगर चुप बैठना ठीक लगे तो चुप रहना, चाहे लोग कुछ भी कहें।

तुम्हें बोलना ठीक लगे तो बोलना, चाहे लोग कुछ भी कहें। तुम्हें अल्पभाषण ठीक लगे तो अल्पभाषण करना, और तुम्हें धारा बहानी हो बाहर की तो धारा बहाना।

तुम लोगों की चिंता मत लेना कि लोग क्या कहते हैं।तुम अपने जीवन के मालिक हो। तुम अपने जीवन को अपने ढंग से जीना।

तुम तुम हो, और तुम इसकी फिकर मत करना कि लोगों का मत क्या है। मत की फिकर की, तो तुम्हें वे पागल बनाकर छोड़ेंगे।जिसने लोगों के मत की फिकर की, वह दो कौड़ी का होकर मरता है। लोगों के मतों की फिकर ही मत करना।

तुम अपने भीतर की शांति से, अपने भीतर के आनंद से अपने भीतर के बोध से जीना। जो तुम्हें ठीक लगता हो, उसे करना। और उसे रोज—रोज बदलना भी मत।अगर बदलना भी कभी पड़े तो अपने ही भीतर के बीध से बदलना, लोगों के बोध के कारण नहीं। लोग क्या कहते हैं, इस चिंता में मत पड़ना।

तो ही तुम कहीं पहुंच पाओगे। नहीं तो तुम कहीं भी न पहुंच पाओगे।तुम दक्षिण गए, लोग कहेंगे, कहां जा रहे हो, दक्षिण में क्या रखा है? तुम उत्तर गए, लोग मिल जाएंगे, कहेंगे, उत्तर में क्या रखा है, कहां जा रहे हो?

तुम पश्चिम जाओ तो लोग मिल जाएंगे, पूरब जाओतो लोग मिल जाएंगे। सब दिशाओं में लोग हैं, और सब दिशाओं के पक्षपाती और सब दिशाओं के खिलाफ कोई न कोई मिल जाएगा।

तुम्हें कुछ भी न करने देंगे लोग।तुम्हें अगर जीवन में कुछ पाना हो, कोई सिद्धि, कोई उपलब्धि, अगर जीवन के रस से तुम्हें कुछ निचोड़ना हो, कोई सुगंध, तो तुम अपनी धुन में रमे रहना। एक बात इस सूत्र से निकलती है।और दूसरी बात—कि दूसरे क्या कर रहे हैं, इसका तुम निर्णय मत करना।

तुम इस निंदा में मत पड़ना कि वे ठीक कर रहे हैं कि गलत कर रहे हैं, कौन जाने! वे जानें, उनका जानें। न तो तुम दूसरों को बाधा देने देना अपने काम में, और न दूसरों के काम में बाधा देना।

दुनिया काफी सुंदर हौ सकती है, अगर लोग एक—दूसरे के कामोंमें बाधा न दें, मंतव्य न दें, निर्णय न दें।

प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं होने का अधिकार है। और प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीवन—दिशा खोजने का जन्मसिद्ध अधिकार है। होना चाहिए।

तुम दोनों बातों का स्मरण रखना। न तो दूसरे पर बाधा देना कि तुम क्या कर रहे हो, कैसा कर रहे हो, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए—तुम किसी के नियंता नहीं हो, मालिक नहीं हो।

उसे अपने ढंग से जीने दो, उसे परमात्मा को अपने ढंग से खोजने दो। और न तुम किसी को अपना मालिक बनाना। कोई तुम्हारा मालिक नहीं है।

इस प्ररम स्वतंत्रता में जो जीता है, वही एक दिन अपने भीतर के दीए को खोजपाता है, जला पाता है।
उसी को बुद्ध ने कहा है—
अप्प दीपो भव, अपने दीए बनो।
         एस धम्मो सनंतनो
             ओशो

Sunday, 13 March 2016

Gujarati gajal તમારા વિના એકલાં,મને જીવતા નથી આવડતું.

તમારા વિના એકલાં,મને જીવતા નથી આવડતું.

તમારા પ્રત્યેનાં પ્રેમને વધું,મને વર્ણવતા નથી આવડતું.

કહીશ હવે બસ એટલું કે,તમે જ મારી જિંદગી છો.આનાથી વિશેષ હું શું કહું ?

મને તો હવે કંઈ કહેતા નથી આવડતું.

GUJRATI GAJAL હળવે હાથે હથેળી ઉપર જરા તમારું નામ લખી દો,

હળવે હાથે હથેળી ઉપર જરા તમારું નામ લખી દો,

નામ ની સાથે સાથે સાજન, સરનામુ પણ ખાસ લખીદો.

થોક થોક લોકો ની વચ્ચે હવે નથી ગમતું મળવાનું,ઢેલ સરીખુ વળગુ ક્યારે, મળશો ક્યાં એ સ્થાન લખી દો.

એકલતાનુ ઝેર ભરેલા વીંછી ડંખી લે એ પહેલા,મારે આંગણ સાજન ક્યારે, લઇ આવો છો જાન લખીદો.

બહુ બહુ તો બે વાત કરી ને લોકો પાછા ભુલી જાશે,નામ તમારું મારા નામ ની પાછળ ખુલ્લે આમ લખી દો.

હળવે હાથે હથેળી ઉપર જરા તમારું નામ લખી દો,નામની સાથે સાથે સાજન, સરનામુ પણ ખાસ લખી દો.

       -અરૂણ દેશાણી.

OSHO कई बार कुछ शराबियों ने आकर मुझसे संन्यास ले लिया। फंस गए भूल में। सोच कर यह आये कि यह आदमी तो कुछ मना करता ही नहीं है,कि पीओ कि न पीओ,

((((((एक अनूठी घटना मैंने घटते देखी, ))))))

कई बार कुछ शराबियों ने आकर मुझसे संन्यास ले लिया। फंस गए भूल में। सोच कर यह आये कि यह आदमी तो कुछ मना करता ही नहीं है,कि पीओ कि न पीओ, कि खाओ, कि यह न खाओ, वह न खाओ, कोई हर्जा नहीं। वे बड़े प्रसन्न हुए।

उन्होंने कहा कि आप की बात हमें बिलकुल जंचती है,यह किसी ने बताई ही नहीं। लेकिन जैसे—जैसे ध्यान बढ़ा, जैसे—जैसे संन्यास का रंग छाया,वैसे—वैसे उनके पैर मधुशाला की तरफ जानेबंद होने लगे,

दूसरी मधुशाला पुकारने लगी।एक शराबी ने छह महीने ध्यान करने के बाद मुझे कहा कि पहले मैं शराब पीता था क्योंकि मैं दुखी था, तो दुख भूल जाता था;अब मैं थोड़ा सुखी हूं शराब पीता हूं? तो सुख भूल जाता है।

अब बड़ी मुश्किल हो गई।सुख तो कोई भुलाना नहीं चाहता। यह आपने क्या कर दिया?मैंने कहा, अब तुम चुन लो।

वह कहने लगा कि अब शराब पी लेता हूं,तो ध्यान खराब हो जाता है,नहीं तो ध्यान की धीमी—धीमी धारा भीतर बहती रहती है, शीतल—शीतल, मंद—मंद बयार बहती रहती है।

शराब पी लेता हूं तो दो—चार दिन के लिए ध्यान की धारा अस्तव्यस्त हो जाती है; फिर बामुश्किल सम्हाल पाता हूं। अब बड़ी मुश्किल हो गई है।तो मैंने कहा, अब तुम चुन लो,तुम्हारे सामने है।

ध्यान छोड़ना है, ध्यान छोड़ दो, शराब छोड़नी है, शराब छोड़ दो।दोनों साथ तो चलते नहीं,तुम्हें दोनों साथ चलाना हो, साथ चला लो।उसने कहा, अब मुश्किल है। क्योंकि ध्यान से जो रसधार बह रही है, वह इतनी पावन है और वह मुझे ऐसी ऊंचाइयों पर ले जा रही है,

जिनका मुझे कभी भरोसा न था कि मुझ जैसा पापी और कभी ऐसे अनुभव कर पायेगा!आपको छोड़ कर किसी दूसरे को तो मैं कहता हीनहीं, क्योंकि मैं दूसरों को कहता हूं तो वे समझते हैं कि शराबी है, ज्यादा पी गया होगा।

वे कहते हैं :होश में आओ, होश की बातें करो।मैं भीतर के भाव की बात करता हूं तो वे समझते हैं कि ज्यादा पी गया होगा। उन्हेंभरोसा नहीं आता।

मेरी पत्नी तक को भरोसा नहीं आता। वह कहती है कि बकवास बंद करो। तुम ये ज्ञान—वान की बातें नहीं,तुम ज्यादा पी गए हो।

मैं कहता हूं,मैंने आज महीने भर से छुई नहीं है।तो आप से ही कह सकता हूं वह शराबी कहने लगा, आप ही समझेंगे। और अब छोड़ना मुश्किल है ध्यान।

जीवन को विधायक दृष्टि से लो। तुम सुखी होने लगो, तो जो चीजें तुमने दुख के कारण पकड़ रखी थीं, वे अपने—आप छूट जायेंगी।ध्यान आये तो शराब छूट जाती है। ध्यान आये तो मांसाहार छूट जाता है।

ध्यान आये तो धीरे —धीरे काम—ऊर्जा ब्रह्मचर्य में रूपांतरित होने लगती है।बस ध्यान आये। तो मैं ध्यान की शराब पीने को तुमसे कहता हूं;समाधि की मधुशाला में पियक्कड़ों की जमात में सम्मिलित हो जाने को कहता हूं।

अष्टावक्र महागीता, भाग-१, प्रवचन#१०
           OSHO

OSHO परमात्मा को जाननेवाला तो सिर्फ रहस्य-विमुग्ध रह जाता है; मौन हो जाता है।

परमात्मा को जाननेवाला तो सिर्फ रहस्य-विमुग्ध रह जाता है; मौन हो जाता है। और जिस दिन तुम परमात्मा के साथ थोड़ा सा भी संबंध जोड़ लेते हो, उस दिन परमात्मा तो ज्ञात होता ही नहीं,

यह संसार भी अज्ञात हो जाता है।

जिसने परमात्मा के साथ थोड़ा संबंध जोड़ लिया, उस दिन उसकी पत्नी भी अज्ञात हो गई, पति भी अज्ञात हो गया, अपना बेटा भी अज्ञात हो गया, क्योंकि इस बेटे की आंखों में भी परमात्मा ही झांकेगा। इस मित्र केहाथ में भी परमात्मा का ही स्पर्श होगा।

यह पत्नी भी कोई और नहीं, उसका ही एक रूप है। यह वृक्षों में भी वही हरा है। इन पक्षियों में भी वही गीत गा रहा है।

इस सूरज में वही प्रकाश है। इस अंधेरी रात में वही अंधेरी रात है।परमात्मा को जानने से परमात्मा ही अज्ञात नहीं होता; सारा जगत् पुनः अज्ञातहो जाता है।

इसको दूसरी भाषा में अगर कहें तो फिर से जगत् रहस्यपूर्ण हो जाता है; फिर से आश्चर्य का जन्म होता है; फिर से तुम्हें बच्चे की आंख मिलती है; पुनर्जन्म हुआ; द्विज बने।

यह नया जन्म ही संन्यास है।

          ~ ओशो ~
(अजहूं चेत गंवार, प्रवचन #18)

OSHO आनंद के विपरीत कोई अवस्था ही नहीं है। और आनंद सुख नहीं है, अगर उसे सुख बनाया तो वह बात और होगी।

आनंद के विपरीत कोई अवस्था ही नहीं है। और आनंद सुख नहीं है, अगर उसे सुख बनाया तो वह बात और होगी।

वह फिर दुख की दुनिया शुरू हो गई।तो साधारणतः हम कहते हैं, वह व्यक्ति आनंद को उपलब्ध होता है, जो दुख से मुक्त हो जाता है।लेकिन इस कहने में थोड़ी भ्रांति है।

कहना ऐसा चाहिए, आनंद को वह व्यक्ति उपलब्ध होता है, जो सुख-दुख से मुक्त हो जाता है।

क्योंकि वे जो सुख-दुख हैं, वे कोई दो चीजें नहीं हैं।और इसलिए साधारणजन को निरंतर यह गलती हो जाती है समझने में, वह समझता है, दुख से मुक्त हो जाना सुख है।इसलिए बहुत से लोग सत्य की खोज में या मोक्ष की खोज में भी वस्तुतः सुख की ही खोज में होते हैं।इसलिए महावीर ने एक बहुत बढ़िया काम किया।

सुख के खोजी को उन्होंने कहा, वह स्वर्ग का खोजी है। आनंद के खोजी को उन्होंने कहा, वह मोक्ष का खोजी है।मोक्ष और स्वर्ग में जो फर्क है, वह खोज का है।

दुख का खोजी नरक का खोजी है, सुख का खोजी स्वर्ग का खोजी है, लेकिन दोनों से जो मुक्ति का खोजी है, वह मोक्ष का खोजी है।
स्वर्ग मोक्ष नहीं है।

           ~ ओशो ~

(महावीर मेरी दृष्टि में, प्रवचन #24)

OSHO मैंने सुना है, दो फकीर थे और उन दोनों फकीरों में एक विवाद था, बड़ा लंबा विवाद था।

मैंने सुना है, दो फकीर थे और उन दोनों फकीरों में एक विवाद था, बड़ा लंबा विवाद था।

उनमें एक फकीर था, जो इस बात को मानता था कि कुछ पैसे वक्त - बेवक्त के लिए अपनेपास रखना जरूरी है।

दूसरा मित्र कहता था, पैसे की रखने की क्या जरूरत है? हम संन्यासी हैं, हमें पैसे की क्या जरूरत है? पैसे तो वे रखते हैं, जो संसारी हैं।

इस जगत का बड़ा रहस्य यह है कि -- न पदार्थवादी जीतता है, न अध्यात्मवादी जीतता है।
जीत भी नहीं सकते हैं, क्योंकि वे जिंदगी को आधा - आधा तोड़कर कह रहे हैं।तो उन दोनों में बड़ा विवाद था।

वे दोनों एक दिन सांझ एक नदी के किनारे भागे हुए पहुंचे हैं। रात उतरने के करीब है। माझी नाव बांध रहा है। नाव बांधते उस मांझी से उन्होंने कहा, नाव मत बांधो, हमें उस पार पहुंचा दो, रात उतरने को है, हमें उस पार जाना जरूरी है।

हमारा गुरु मृत्यु के निकट है और खबर आई है कि सुबह तक उसके प्राण निकल जाएंगे। तो माझी ने कहा कि मैं पांच रुपए लूंगा, तो उतार दूंगा।

तो जो फकीर कहता था कि रुपए पास रखना चाहिए, वह हंसा और उसने कहा, कहो दोस्त, अब क्या खयाल है? पैसा रखना व्यर्थ है या सार्थक है? वह दूसरा फकीर सिर्फ हंसता रहा। फिर उसने पांच रुपए निकाले, मांझी को दिए।

फिर वे नाव पर सवार हुए और उस पार पहुंच गए। फिर उतर कर उसने कहा, कहो मित्र, आज नदी के पार न उतर पाते, अगर पैसे पास न होते। वह दूसरा खूब हंसने लगा। उसने कहा, हम पैसे पास होने की वजह से नदी पार नहीं उतरे हैं।

तुम पैसे छोड़ सके, इसलिए नदी केपार उतरे हैं। पैसा होने से नहीं, पैसा छोड़ने से उतरे हैं नदी के पार। दलील फिर अपनी जगह खड़ी हो गई।वे दोनों अपने गुरु के पास गए और मरते हुएगुरु से उन्होंने पूछा कि क्या करें? बड़ीमुश्किल है! हमारे दोनों के सिद्धान्त ठीक मालूम पड़ते हैं।वह गुरु खूब हंसा।

उसने कहा कि तुम दोनों पागल हो। तुम वही पागलपन कर रहे हो, जो आदमी बहुत जमाने से कर रहा है। क्या पागलपन है, उन्होंने पूछा।

गुरु ने कहा, तुम एक सत्य के आधे हिस्से को देख रहे हो।यह सच है कि पैसे छोड़ने से ही तुम नाव से उतर सके, लेकिन दूसरी बात भी उतनी ही सच है कि तुम पैसे इसलिए छोड़ सके कि पैसे तुम्हारे पास थे। और यह भी सच है कि पैसे पास होने से ही तुम नदी पार उतरे, लेकिन दूसरी बात भी उतनी ही सच है कि अगर पास ही होते तो तुम नदी उतर न सकते थे।

तुम पास से दूर कर सके, इसलिए तुम नदी उतरे। ये दोनों ही बातें सच हैं। और ये दोनों बातें ही इकट्ठा जीवन है और इनमें विरोध नहीं है।

         ~ ओशो ~
(मैं मृत्यु सिखाता हूँ, प्रवचन #9)