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Wednesday, 10 August 2016

પાનખરોમાં પાન ખરે ને, ઝાડનો આખો વાન ખરે ને,

પાન પાનખરોમાં પાન ખરે ને, ઝાડનો આખો વાન ખરે ને, ખરોમાં પાન ખરે ને, ઝાડનો આખો વાન ખરે ને,

ત્યારે સાલું લાગી આવે
જંગલને બાઝીને બેઠું,

વ્હાલકડું એકાંત ખરે ને, ત્યારે સાલું લાગી આવે

વર્ષોથી પર્વત ચઢનારા માણસની ચારે બાજુ હો ખાઈ ખાઈ ને ઊંડી ખીણો

એક જ ડગલું બાકી હો ને અંતે એનું ધ્યાન ચળે ને,
ત્યારે સાલું લાગી આવે

સામેની ફૂટપાથ ઉપર સૂતાં હો બાળક ભૂખ્યાં પેટે આંસુ પીને ઊના શ્વાસે

સામેની ફૂટપાથે કોઈ હોટલ આલીશાન મળે ને, ત્યારે સાલું લાગી આવે

તમે હોવ મુશ્તાક, તમારી તલવારો પર, દુશ્મનને પડકારી લાવો

રણની વચ્ચે હાથ જરા સરકાવો પાછળ,

સાવ જ ખાલી મ્યાન મળે ને, ત્યારે સાલું લાગી આવે

-મુકેશ જોષી

તારા સ્મરણને મારામાંથી બાદ કરી જોઉં,

તારા સ્મરણને મારામાંથી બાદ કરી જોઉં,

કોશિશ હું આપઘાતની એકાદ કરી જોઉં.

શા માટે બાંધી રાખવા સગપણના પાંજરે?

લાવો, તમામ શ્વાસને આઝાદ કરી જોઉં.

કોનામાં લીલો મોલ લચી પડશે, શી ખબર

સર્વત્ર મારા જીવનો વરસાદ કરી જોઉં

આ ખાલી ઘરમાં હોતું નથી કોઈ આજકાલ,

રહેતુ’તું કોણ, લાવ, જરા યાદ કરી જોઉં છું

હું કોઇક માટેની સાષ્ટાંગ
પ્રાર્થના ,

મંદિરમાં કોણ છે, હું કોને સાદ કરી જોઉં?

જાઉં ને મૃત્યુ નામના રાજાધિરાજને

પેશેનજર રમેશની સોગાદ કરી જોઉં.

-રમેશ પારેખ

નમી જાય માથું શરમ થકી, એ સહાયતા નું હું શું કરું?

નમી જાય માથું શરમ થકી, એ સહાયતા નું હું શું કરું?

મળી નાં શકુ જો સ્વયં ને હું, એ મહાનતા નું હું શું કરું?

કરી પીંજરાની આ કેદથી,  મને મુક્ત એ તો જતાં રહ્યાં,

મળે નાં વિહાર ગગનમાં તો, આ સ્વતંત્રતા નું હું શું કરું?

લઈ પોટલું શિરે જ્ઞાનનું ,હજી ભટકું છું હું ય દરબદર, 

કરે ભૂખ શાંત ના પેટની, તો આ વિદ્વતા નું હું શું કરું?

બધી ભાન શાન ત્યજી જતે, તો હરીનાં હેત મળી જતે,

હું ય નરશી થૈ જતે તો પછી, આ સભાનતા નું હું શું કરું?

કરી સ્હેજ આંખને બંધતો, મને મારી માનાં દરશ થયાં

હવે આંખ ખોલી બહારની, બધી રમ્યતા નું હું શું કરું?

આ જુવાની પણ કરી બેખબર, બધું બાળપણ તો લઈ ગઈ,

હવે કાનમાં રહી ગુંજતી, બધી વારતા નું હું શું કરું?

વિપુલ માંગરોળીયા ( વેદાંત )

Saturday, 14 May 2016

मैं जब पढ़ता था। तो मेरे एक प्रोफेसर थे उनकी काम पर बड़ी नजर थी। उनके घर भी जाएंतो पहले ही वह पूछते थे कैसे आए? पहली दफाआए थे तो मैं रास्ते से निकला था तो मैं उनके घर गया,तो उन्होंने कहा कैसे आए।

मैं जब पढ़ता था। तो मेरे एक प्रोफेसर थे उनकी काम पर बड़ी नजर थी। उनके घर भी जाएंतो पहले ही वह पूछते थे कैसे आए? पहली दफाआए थे तो मैं रास्ते से निकला था तो मैं उनके घर गया,तो उन्होंने कहा कैसे आए।

मैंने कहा मैं वापस लौटा जाता हूं। क्योंकि कैसे का कोई उत्तर नहीं, मैं किसी काम से अया नहीं। और आप सोचते होंगे बिना काम आना ठीक नहीं। तो बात खतम हो गई आगे कभी आऊँगा नहीं।

लेकिन इतना मैं कह जाता हूं कि जो काम से आते है वह आपके पास नहीं आते, वह अपने काम से आते है। आप गौण होते है, काम ही सब कुछ होता है। आप केवल साधन होते है। काम ही सब कुछ होता है।

जिस आदमी से हमारा काम का संबंध है हमने उसे अभी आदमी भी स्वीकार नहीं किया, इंस्टुमेंट माना हुआ है। जिससे हमारा काम का संबंध नहीं है उससे ही हमारा प्रेम का संबंध शुरू हो जाता है। और प्रेम अकेली एक चीज है जो इस दुनिया में काम नहीं है।

बाकी फिर सभी काम है। सभी काम है। मगर हमारा सबका सोचना ऐसा हो गया है। हर चीज को हम लक्ष्य और उद्देश्य और प्रयोजन उसमें बाँध के देखते है। अर्थहीन जैसे कुछ भी नहीं है।

ओशो टाइम्स वार्षिक अंक
1996

Friday, 13 May 2016

स्त्री चित्त और पुरुष चित्तस्त्रैण चित्त और पुरुष चित्त एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं।स्त्री जल्दी में नहीं है,उसके लिए कोई जल्दी नहीं है। दरअसलउसे कहीं पहुंचना नहीं है।यही कारण है कि स्त्रियां महान नेता, वैज्ञानिक औरयोद्धा नहीं होतीं हो नहींसकतीं। और अगर कोई स्त्री हो जाए,जैसे जॉन आफ आर्क या लक्ष्मी बाई तो उसे अपवादमानना चाहिए।

स्त्री चित्त और पुरुष चित्तस्त्रैण चित्त और पुरुष चित्त एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं।स्त्री जल्दी में नहीं है,उसके लिए कोई जल्दी नहीं है। दरअसलउसे कहीं पहुंचना नहीं है।यही कारण है कि स्त्रियां महान नेता, वैज्ञानिक औरयोद्धा नहीं होतीं हो नहींसकतीं। और अगर कोई स्त्री हो जाए,जैसे जॉन आफ आर्क या लक्ष्मी बाई तो उसे अपवादमानना चाहिए।

वह दरअसल पुरुषचित्त है सिर्फ शरीरस्त्री का है, चित्त पुरुष का है। उसका चित्त जराभी स्त्रैण नहीं है। स्त्रैण चित्त के लिएकोई लक्ष्य नहीं है, मंजिल नहीं है।और हमारा संसार पुरुष प्रधान संसार है।

इस पुरुष प्रधान संसार मेंस्त्रियां महान नहीं हो सकतीं, क्योंकिमहानता किसी उद्देश्य से, किसी लक्ष्यसे जुड़ी होती है। यदि कोई लक्ष्यउपलब्ध करना है, तभी तुम महान हो सकते हो। औरस्त्रैण चित्त के लिए कोई लक्ष्य नहीं है। वहयहीं और अभी सुखी है।वह यहीं और अभी दुखीहै। उसे कहीं पहुंचना नहीं है। स्त्रैणचित्त वर्तमान में रहता है।

यही कारण है कि स्त्री कीउत्सुकता दूर दराज में नहीं होती है, वहसदा पास पड़ोस में उत्सुक होती है। वियतनाम में क्याहो रहा है, इसमें उसे कोई रस नहीं है। लेकिनपड़ोसी के घर में क्या हो रहा है, मोहल्ले में क्या होरहा है, इसमें उसका पूरा रस है।

इस पहलू से उसे पुरुष बेबूझमालूम पड़ता है। वह पूछती है कि तुम्हेंक्या जाननेकी पड़ी है कि निक्सन क्या कर रहा हैया माओ क्या कर रहा है! उसका रस पास पड़ोस में चलने वाले प्रेमप्रसंगों में है। वह निकट में उत्सुक है, दूर उसके लिए व्यर्थहै। उसके लिए समय का अस्तित्व नहीं है।समय उनके लिए है जिन्हें किसी लक्ष्य पर,किसी मंजिल पर पहुंचना है। स्मरण रहे, समयतभी हो सकता है जब तुम्हें कहींपहुंचना है।

अगर तुम्हें कहीं पहुंचनानहीं है तो समय का क्या मतलब है? तब कोईजल्दी नहीं है।इसे एक और दृष्टिकोण से समझने की कोशिशकरो।पूर्व स्त्रैण है और पश्चिम पुरुष जैसा है। पूर्व नेकभी समय के संबंध में बहुत चिंता नहींकी, पश्चिम समय के पीछे पागल है।पूर्व बहुत विश्रामपूर्ण रहा है; वहां इतनीधीमी गति है, मानो गति ही नहो।

वहां कोई बदलाहट नहीं है; कोई क्रांतिनहीं है। विकास इतना चुपचाप है कि उससेकहीं कोई शोर नहीं होता।पश्चिम बस पागल है; वहां रोज क्रांति चाहिए, हरचीज को बदल डालना है। जब तक सब कुछ बदल नजाए जब तक उसे लगता है कि हम कहीं जाही नहीं रहे, कि हम ठहर गए हैं। अगरसब कुछ बदल रहा है और सब कुछ उथल पुथल में है, तबपश्चिम को लगता है कि कुछ हो रहा है। और पूर्व सोचता है किअगर उथल पुथल मची है तो उसका मतलब है किहम रुग्ण हैं, बीमार हैं। उसे लगता है किकहीं कुछ गलत है, तभी तो उथल पुथलहो रही है।

अगर सब कुछ सही है तोक्रांति की क्या जरूरत? बदलाहट क्यों?पूर्वी चित्त स्त्रैण है। इसीलिए पूर्व मेंहमने सभी स्त्रैण गुणों का गुणगान किया है, हमनेकरुणा, प्रेम, सहानुभूति, अहिंसा, स्वीकार, संतोष,सभी स्त्रैण गुणों को सराहा है। पश्चिम मेंसभी पुरुषोचित गुणों की प्रशंसाकी जाती है, वहां संकल्प, संकल्प बल,अहंकार, आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और विद्रोह जैसे मूल्यप्रशंसित हैं। पूर्व में आज्ञाकारिता,समर्पण, स्वीकारजैसे मूल्य मान्य हैं। पूर्व की बुनियादीवृत्ति स्त्रैण है, कोमल है; और पश्चिम की वृत्तिपुरुष है, कठोर है।

समर्पण की विधि स्त्रैण चित्त के लिए है। औरप्रयत्न, संकल्प और श्रम की विधि पुरुष चित्त केलिए है। और वे एक दूसरे के बिलकुल विपरीत होनेही वाली हैं। अगर तुम दोनों में सामंजस्यबिठाने की चेष्टा करोगे तो तुम उनकीखिचड़ी बना दोगे। वह सामंजस्य अर्थहीनहोगा, बेतुका होगा, और खतरनाक भी होगा। वहकिसी के भी काम का नहींहोगा।

तंत्र सूत्रओशो

Sunday, 8 May 2016

वीर्य का ऊर्ध्वगमन ◆◆◆◆◆◆◆◆◆एक वीर्य-कण दो चीजों से बना है। तभी तोआपका पूरा शरीर भी दो चीजों से बन पाता है -- एक तो वीर्य-कण की देह -- दिखाई पड़ने वाली और एक वीर्य-कण की आत्मा है, ऊर्जा है -

वीर्य का ऊर्ध्वगमन ◆◆◆◆◆◆◆◆◆एक वीर्य-कण दो चीजों से बना है। तभी तोआपका पूरा शरीर भी दो चीजों से बन पाता है

-- एक तो वीर्य-कण की देह -- दिखाई पड़ने वाली और एक वीर्य-कण की आत्मा है, ऊर्जा है -- न दिखाई पड़ने वाली।संभोग में वीर्य-कण जैसे ही स्त्री योनि में प्रवेश करते हैं, दो घंटे तक जीवित रहते हैं।

अगर इस दो घंटे के बीच में उन्होंने स्त्री अंडे को उपलब्ध कर लिया, पा लिया, तो जो वीर्य-कण स्त्री अंडे के निकट पहुंचकर स्त्री अंडे में प्रवेश कर जाएगा, जन्म हो गया -- एक नए व्यक्तित्व का।

लेकिन लंबी यात्रा है वीर्य-कणों के लिए।एक संभोग में लाखों वीर्य-कण छूटते हैं और उनमें से एक पहुंच पाता है। लाखों नष्ट हो जाते हैं। और एक भी सदा नहीं पहुंच पाता, कभी-कभी पहुँच पाता है। शेष समय तो सभी नष्ट हो जाते हैं।

इसका मतलब यह हुआ कि वीर्य-कण जीवित भी होते हैं और मुर्दा भी होते हैं।वीर्य के दो अंग हैं। जब तक वीर्य जीवित है, तब तक उसमें दो चीजें हैं -- उसकी देह भी है, और उसकी ऊर्जा, आत्मा भीहै। दो घंटे में ऊर्जा मुक्त हो जाएगी, वीर्य कण मुर्दा पड़ा रह जाएगा।

अगर इस ऊर्जा-कण के रहते ही स्त्री-कण से मिलनहो गया, तो ही जीवन का जन्म होगा। अगर इसऊर्जा के हट जाने पर मिलन हुआ, तो जीवन का जन्म नहीं होगा।इसलिए वीर्य-कण तो केवल देह है, वाहन है।

वह जो ऊर्जा है, जो उसे जीवित बनाती है, वही असली वीर्य है। वीर्य-कण की देहतो उत्थान को उपलब्ध नहीं हो सकती, उसकातो पतन ही होगा।लेकिन उस छोटे से न दिखाई पड़ने वाले वीर्य-कण में जो जीवन की ऊर्जा है, वह ऊपर की तरफ भाग रही है।

उसके लिए मार्ग की कोई जरूरत नहीं है। वह अदृश्य है। अगर यही जीवन-ऊर्जा स्त्री-कण से मिल जाएगी, तो एक व्यक्ति का जन्म हो जाएगा।अगर यही ऊर्जा योग और तंत्र की प्रणालीसे मुक्त कर ली जाए वीर्य-कण से, तो आपके सहस्रार तक पहुंच सकती है।

और जब सहस्रार तक पहुंचती है यह वीर्य-ऊर्जा,तो आपके लिए नए लोक का जन्म होता है।आप का पुनर्जन्म हो जाता है। इस वीर्य-ऊर्जा के जाने के लिए कोई स्थूल, भौतिक मार्ग आवश्यक नहीं है। यह बिना भौतिक मार्ग के यात्रा कर लेती है।

इसलिए जिनसप्त चक्रों की हम बातें करते हैं, वे सात चक्र दृश्य नहीं हैं।उन अदृश्य चक्रों से ही यह ऊर्जा ऊपर की तरफ उठती है। इस ऊर्जा का नाम"वीर्य" है।

वीर्य बीज है, जैसे पौधों का बीज है, ऐसेआदमी का बीज है। उस बीज को तोड़कर भीतर की ऊर्जा का पता नहीं चलता। क्योंकि तोड़ते ही वह ऊर्जा आकाश में लीन हो जाती है।आपका वीर्य-कण दो तरह की आकांक्षाएं रखता है। एक आकांक्षा तो रखता है बाहर की स्त्री से मिलकर, फिर एक नए जीवन की पूर्णता पैदा करने की।एक और गहन आकांक्षा है,

जिसको हम अध्यात्म कहते हैं, वह आकांक्षा है, स्वयं के भीतर की छिपी स्त्री या स्वयंके भीतर छिपे पुरुष से मिलने की।अगर बाहर की स्त्री से मिलना होता है, तो संभोग घटित होता है। वह भी सुखद है, क्षण भर के लिए।अगर भीतर की स्त्री से मिलना होता है, तो समाधि घटित होती है। वह महासुख है, और सदा के लिए।

क्योंकि बाहर की स्त्रीसे कितनी देर मिलिएगा ?भीतर की स्त्री से मिलना शाश्वत हो सकता है। उस शाश्वत से मिलने के कारण ही समाधि फलित होती है।

~ ओशो ~

Tuesday, 19 April 2016

મન પરોવી ને , પ્રેમ કરવો હોય , તો જ આવજે . માગ્યા

તો જ  આવજે -

મન પરોવી   ને , પ્રેમ  કરવો  હોય , તો જ આવજે  .
માગ્યા  વગર, આનંદ  ધરવો  હોય  , તો જ આવજે.

જો  આજ   કાલથી   હું   ડાયેટ   કરતો  હોવ  છુ, મારી
સાથે સલાડ   નો   ચારો  ચરવો  હોય , તો જ આવજે 

ઉભડક  શ્વાસે  પ્રેમ   કરવાની  મને  આદત  જ  નથી
શ્વાસને ધીરો  રાખીને પ્રેમ કરવો  હોય ,તો જ આવજે

ખાલી  હૃદય  માં  પ્રેમ નું    હું   રી  -ફિલીંગ  કરું    છુ,
તારે  દિલમાં   પ્રેમ  રીફીલ કરવો   હોય  ,તો જ આવજે 

મન પરોવી   ને , પ્રેમ  કરવો  હોય , તો જ આવજે  .
માગ્યા  વગર, આનંદ  ધરવો  હોય  , તો જ આવજે.