NEWS UPDATE

Blogger Tips and TricksLatest Tips And TricksBlogger Tricks

Saturday, 14 May 2016

मैं जब पढ़ता था। तो मेरे एक प्रोफेसर थे उनकी काम पर बड़ी नजर थी। उनके घर भी जाएंतो पहले ही वह पूछते थे कैसे आए? पहली दफाआए थे तो मैं रास्ते से निकला था तो मैं उनके घर गया,तो उन्होंने कहा कैसे आए।

मैं जब पढ़ता था। तो मेरे एक प्रोफेसर थे उनकी काम पर बड़ी नजर थी। उनके घर भी जाएंतो पहले ही वह पूछते थे कैसे आए? पहली दफाआए थे तो मैं रास्ते से निकला था तो मैं उनके घर गया,तो उन्होंने कहा कैसे आए।

मैंने कहा मैं वापस लौटा जाता हूं। क्योंकि कैसे का कोई उत्तर नहीं, मैं किसी काम से अया नहीं। और आप सोचते होंगे बिना काम आना ठीक नहीं। तो बात खतम हो गई आगे कभी आऊँगा नहीं।

लेकिन इतना मैं कह जाता हूं कि जो काम से आते है वह आपके पास नहीं आते, वह अपने काम से आते है। आप गौण होते है, काम ही सब कुछ होता है। आप केवल साधन होते है। काम ही सब कुछ होता है।

जिस आदमी से हमारा काम का संबंध है हमने उसे अभी आदमी भी स्वीकार नहीं किया, इंस्टुमेंट माना हुआ है। जिससे हमारा काम का संबंध नहीं है उससे ही हमारा प्रेम का संबंध शुरू हो जाता है। और प्रेम अकेली एक चीज है जो इस दुनिया में काम नहीं है।

बाकी फिर सभी काम है। सभी काम है। मगर हमारा सबका सोचना ऐसा हो गया है। हर चीज को हम लक्ष्य और उद्देश्य और प्रयोजन उसमें बाँध के देखते है। अर्थहीन जैसे कुछ भी नहीं है।

ओशो टाइम्स वार्षिक अंक
1996

Friday, 13 May 2016

स्त्री चित्त और पुरुष चित्तस्त्रैण चित्त और पुरुष चित्त एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं।स्त्री जल्दी में नहीं है,उसके लिए कोई जल्दी नहीं है। दरअसलउसे कहीं पहुंचना नहीं है।यही कारण है कि स्त्रियां महान नेता, वैज्ञानिक औरयोद्धा नहीं होतीं हो नहींसकतीं। और अगर कोई स्त्री हो जाए,जैसे जॉन आफ आर्क या लक्ष्मी बाई तो उसे अपवादमानना चाहिए।

स्त्री चित्त और पुरुष चित्तस्त्रैण चित्त और पुरुष चित्त एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं।स्त्री जल्दी में नहीं है,उसके लिए कोई जल्दी नहीं है। दरअसलउसे कहीं पहुंचना नहीं है।यही कारण है कि स्त्रियां महान नेता, वैज्ञानिक औरयोद्धा नहीं होतीं हो नहींसकतीं। और अगर कोई स्त्री हो जाए,जैसे जॉन आफ आर्क या लक्ष्मी बाई तो उसे अपवादमानना चाहिए।

वह दरअसल पुरुषचित्त है सिर्फ शरीरस्त्री का है, चित्त पुरुष का है। उसका चित्त जराभी स्त्रैण नहीं है। स्त्रैण चित्त के लिएकोई लक्ष्य नहीं है, मंजिल नहीं है।और हमारा संसार पुरुष प्रधान संसार है।

इस पुरुष प्रधान संसार मेंस्त्रियां महान नहीं हो सकतीं, क्योंकिमहानता किसी उद्देश्य से, किसी लक्ष्यसे जुड़ी होती है। यदि कोई लक्ष्यउपलब्ध करना है, तभी तुम महान हो सकते हो। औरस्त्रैण चित्त के लिए कोई लक्ष्य नहीं है। वहयहीं और अभी सुखी है।वह यहीं और अभी दुखीहै। उसे कहीं पहुंचना नहीं है। स्त्रैणचित्त वर्तमान में रहता है।

यही कारण है कि स्त्री कीउत्सुकता दूर दराज में नहीं होती है, वहसदा पास पड़ोस में उत्सुक होती है। वियतनाम में क्याहो रहा है, इसमें उसे कोई रस नहीं है। लेकिनपड़ोसी के घर में क्या हो रहा है, मोहल्ले में क्या होरहा है, इसमें उसका पूरा रस है।

इस पहलू से उसे पुरुष बेबूझमालूम पड़ता है। वह पूछती है कि तुम्हेंक्या जाननेकी पड़ी है कि निक्सन क्या कर रहा हैया माओ क्या कर रहा है! उसका रस पास पड़ोस में चलने वाले प्रेमप्रसंगों में है। वह निकट में उत्सुक है, दूर उसके लिए व्यर्थहै। उसके लिए समय का अस्तित्व नहीं है।समय उनके लिए है जिन्हें किसी लक्ष्य पर,किसी मंजिल पर पहुंचना है। स्मरण रहे, समयतभी हो सकता है जब तुम्हें कहींपहुंचना है।

अगर तुम्हें कहीं पहुंचनानहीं है तो समय का क्या मतलब है? तब कोईजल्दी नहीं है।इसे एक और दृष्टिकोण से समझने की कोशिशकरो।पूर्व स्त्रैण है और पश्चिम पुरुष जैसा है। पूर्व नेकभी समय के संबंध में बहुत चिंता नहींकी, पश्चिम समय के पीछे पागल है।पूर्व बहुत विश्रामपूर्ण रहा है; वहां इतनीधीमी गति है, मानो गति ही नहो।

वहां कोई बदलाहट नहीं है; कोई क्रांतिनहीं है। विकास इतना चुपचाप है कि उससेकहीं कोई शोर नहीं होता।पश्चिम बस पागल है; वहां रोज क्रांति चाहिए, हरचीज को बदल डालना है। जब तक सब कुछ बदल नजाए जब तक उसे लगता है कि हम कहीं जाही नहीं रहे, कि हम ठहर गए हैं। अगरसब कुछ बदल रहा है और सब कुछ उथल पुथल में है, तबपश्चिम को लगता है कि कुछ हो रहा है। और पूर्व सोचता है किअगर उथल पुथल मची है तो उसका मतलब है किहम रुग्ण हैं, बीमार हैं। उसे लगता है किकहीं कुछ गलत है, तभी तो उथल पुथलहो रही है।

अगर सब कुछ सही है तोक्रांति की क्या जरूरत? बदलाहट क्यों?पूर्वी चित्त स्त्रैण है। इसीलिए पूर्व मेंहमने सभी स्त्रैण गुणों का गुणगान किया है, हमनेकरुणा, प्रेम, सहानुभूति, अहिंसा, स्वीकार, संतोष,सभी स्त्रैण गुणों को सराहा है। पश्चिम मेंसभी पुरुषोचित गुणों की प्रशंसाकी जाती है, वहां संकल्प, संकल्प बल,अहंकार, आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और विद्रोह जैसे मूल्यप्रशंसित हैं। पूर्व में आज्ञाकारिता,समर्पण, स्वीकारजैसे मूल्य मान्य हैं। पूर्व की बुनियादीवृत्ति स्त्रैण है, कोमल है; और पश्चिम की वृत्तिपुरुष है, कठोर है।

समर्पण की विधि स्त्रैण चित्त के लिए है। औरप्रयत्न, संकल्प और श्रम की विधि पुरुष चित्त केलिए है। और वे एक दूसरे के बिलकुल विपरीत होनेही वाली हैं। अगर तुम दोनों में सामंजस्यबिठाने की चेष्टा करोगे तो तुम उनकीखिचड़ी बना दोगे। वह सामंजस्य अर्थहीनहोगा, बेतुका होगा, और खतरनाक भी होगा। वहकिसी के भी काम का नहींहोगा।

तंत्र सूत्रओशो

Sunday, 8 May 2016

वीर्य का ऊर्ध्वगमन ◆◆◆◆◆◆◆◆◆एक वीर्य-कण दो चीजों से बना है। तभी तोआपका पूरा शरीर भी दो चीजों से बन पाता है -- एक तो वीर्य-कण की देह -- दिखाई पड़ने वाली और एक वीर्य-कण की आत्मा है, ऊर्जा है -

वीर्य का ऊर्ध्वगमन ◆◆◆◆◆◆◆◆◆एक वीर्य-कण दो चीजों से बना है। तभी तोआपका पूरा शरीर भी दो चीजों से बन पाता है

-- एक तो वीर्य-कण की देह -- दिखाई पड़ने वाली और एक वीर्य-कण की आत्मा है, ऊर्जा है -- न दिखाई पड़ने वाली।संभोग में वीर्य-कण जैसे ही स्त्री योनि में प्रवेश करते हैं, दो घंटे तक जीवित रहते हैं।

अगर इस दो घंटे के बीच में उन्होंने स्त्री अंडे को उपलब्ध कर लिया, पा लिया, तो जो वीर्य-कण स्त्री अंडे के निकट पहुंचकर स्त्री अंडे में प्रवेश कर जाएगा, जन्म हो गया -- एक नए व्यक्तित्व का।

लेकिन लंबी यात्रा है वीर्य-कणों के लिए।एक संभोग में लाखों वीर्य-कण छूटते हैं और उनमें से एक पहुंच पाता है। लाखों नष्ट हो जाते हैं। और एक भी सदा नहीं पहुंच पाता, कभी-कभी पहुँच पाता है। शेष समय तो सभी नष्ट हो जाते हैं।

इसका मतलब यह हुआ कि वीर्य-कण जीवित भी होते हैं और मुर्दा भी होते हैं।वीर्य के दो अंग हैं। जब तक वीर्य जीवित है, तब तक उसमें दो चीजें हैं -- उसकी देह भी है, और उसकी ऊर्जा, आत्मा भीहै। दो घंटे में ऊर्जा मुक्त हो जाएगी, वीर्य कण मुर्दा पड़ा रह जाएगा।

अगर इस ऊर्जा-कण के रहते ही स्त्री-कण से मिलनहो गया, तो ही जीवन का जन्म होगा। अगर इसऊर्जा के हट जाने पर मिलन हुआ, तो जीवन का जन्म नहीं होगा।इसलिए वीर्य-कण तो केवल देह है, वाहन है।

वह जो ऊर्जा है, जो उसे जीवित बनाती है, वही असली वीर्य है। वीर्य-कण की देहतो उत्थान को उपलब्ध नहीं हो सकती, उसकातो पतन ही होगा।लेकिन उस छोटे से न दिखाई पड़ने वाले वीर्य-कण में जो जीवन की ऊर्जा है, वह ऊपर की तरफ भाग रही है।

उसके लिए मार्ग की कोई जरूरत नहीं है। वह अदृश्य है। अगर यही जीवन-ऊर्जा स्त्री-कण से मिल जाएगी, तो एक व्यक्ति का जन्म हो जाएगा।अगर यही ऊर्जा योग और तंत्र की प्रणालीसे मुक्त कर ली जाए वीर्य-कण से, तो आपके सहस्रार तक पहुंच सकती है।

और जब सहस्रार तक पहुंचती है यह वीर्य-ऊर्जा,तो आपके लिए नए लोक का जन्म होता है।आप का पुनर्जन्म हो जाता है। इस वीर्य-ऊर्जा के जाने के लिए कोई स्थूल, भौतिक मार्ग आवश्यक नहीं है। यह बिना भौतिक मार्ग के यात्रा कर लेती है।

इसलिए जिनसप्त चक्रों की हम बातें करते हैं, वे सात चक्र दृश्य नहीं हैं।उन अदृश्य चक्रों से ही यह ऊर्जा ऊपर की तरफ उठती है। इस ऊर्जा का नाम"वीर्य" है।

वीर्य बीज है, जैसे पौधों का बीज है, ऐसेआदमी का बीज है। उस बीज को तोड़कर भीतर की ऊर्जा का पता नहीं चलता। क्योंकि तोड़ते ही वह ऊर्जा आकाश में लीन हो जाती है।आपका वीर्य-कण दो तरह की आकांक्षाएं रखता है। एक आकांक्षा तो रखता है बाहर की स्त्री से मिलकर, फिर एक नए जीवन की पूर्णता पैदा करने की।एक और गहन आकांक्षा है,

जिसको हम अध्यात्म कहते हैं, वह आकांक्षा है, स्वयं के भीतर की छिपी स्त्री या स्वयंके भीतर छिपे पुरुष से मिलने की।अगर बाहर की स्त्री से मिलना होता है, तो संभोग घटित होता है। वह भी सुखद है, क्षण भर के लिए।अगर भीतर की स्त्री से मिलना होता है, तो समाधि घटित होती है। वह महासुख है, और सदा के लिए।

क्योंकि बाहर की स्त्रीसे कितनी देर मिलिएगा ?भीतर की स्त्री से मिलना शाश्वत हो सकता है। उस शाश्वत से मिलने के कारण ही समाधि फलित होती है।

~ ओशो ~

Tuesday, 19 April 2016

મન પરોવી ને , પ્રેમ કરવો હોય , તો જ આવજે . માગ્યા

તો જ  આવજે -

મન પરોવી   ને , પ્રેમ  કરવો  હોય , તો જ આવજે  .
માગ્યા  વગર, આનંદ  ધરવો  હોય  , તો જ આવજે.

જો  આજ   કાલથી   હું   ડાયેટ   કરતો  હોવ  છુ, મારી
સાથે સલાડ   નો   ચારો  ચરવો  હોય , તો જ આવજે 

ઉભડક  શ્વાસે  પ્રેમ   કરવાની  મને  આદત  જ  નથી
શ્વાસને ધીરો  રાખીને પ્રેમ કરવો  હોય ,તો જ આવજે

ખાલી  હૃદય  માં  પ્રેમ નું    હું   રી  -ફિલીંગ  કરું    છુ,
તારે  દિલમાં   પ્રેમ  રીફીલ કરવો   હોય  ,તો જ આવજે 

મન પરોવી   ને , પ્રેમ  કરવો  હોય , તો જ આવજે  .
માગ્યા  વગર, આનંદ  ધરવો  હોય  , તો જ આવજે.

Monday, 11 April 2016

भगवान! पंडित -पुरोहित मनुष्य कोजगाने के क्यों सदा सेविरोधी है? और जन -सामान्य क्यों उनकेजालों में बार-बारउलझ जाता है? ‘रामस्वरूप!पंडित -पुरोहित का

भगवान! पंडित -पुरोहित मनुष्य कोजगाने के क्यों सदा सेविरोधी है? और जन -सामान्य क्यों उनकेजालों में बार-बारउलझ जाता है?

‘रामस्वरूप!पंडित -पुरोहित का अर्थहोता है! वह जो स्वयं तोजागा हुआ नहीं है, लेकिनजागे हुए लोगों के वचनोंका व्यापार कर रहा है।जो स्वयं तो अनुभव नहींकिया है, लेकिन अनुभवीजो संपदा छोड़ गये हैं उसपर फन मारकर बैठ गयाहै, उस पर कब्जा करलिया है।

जो खुद भी कुछनहीं समझता कि जिससंपदा पर उसने कब्जाकिया है वह क्या है,लेकिन फिर भी लोगों मेंयह भ्रांति बनाए रखताहै कि वह समझता है। शब्दसमझता है, सार नहींसमझता। शास्त्र समझताहै, सत्य नहीं समझता। औरये सत्य का जो जगत है,अनुभव का जगत है, विचारका जगत नहीं है।

पंडित -पुरोहित बड़ेविचारपूर्ण हैं; मगर सत्यका अनुभव ही विचार सेनहीं हैं, ध्यान से है। बुद्धपैदा होंगे तो उनके पासआसपास प्रेमियों की,पियक्कड़ों की जमातबनेगी। लेकिन बुद्ध ने जानेपर अड़चन आएगी। बुद्ध केजाते ही पंडित इकट्ठे होजायेंगे।

स्वभावत: उस भीड़– भाड़ में जो सर्वाधिकमुखर होंगे, बोलने में समर्थहोंगे, समझाने में समर्थहोंगे-वें नेता हो जाएंगे।चाहे वे अनुभवी हों या नहों लेकिन चूंकि बोल सकतेहैं, वे नेता, और नेतृत्वग्रहण कर लेंगे। धीरे –धीरे अनुभवियों को तो वेबाहर कर देंगे, क्योंकिअनुभवियो के कारण उनकोअड़चन होगी। उनकागिरोह इकट्ठा होजाएगा। और अनुभवी काचिंता भी नहीं है नेतृत्वकरने की। और अनुभवी कोकोई जनता के ऊपर कब्जाभी नहीं करना है।

औरअनुभवी को कोई जनताको शोषण भी नहीं करनाहै। लेकिन ये पंडित मौकान छोड़ेंगे। इन पंडितों कीजमात फिर सदियों तकलोगों का शोषण करेगी।नाम चलेगा बुद्ध का, बुद्धके नाम की आडू में पंडितकी दुकान चलेगी। यहपंडित कैसे राजी होगाकि कोई दूसरा बुद्धलोगों को जगाए?

क्योंकिअगर लोग जाग जायें तोइसके ग्राहक कम होजाएंगे, उसकी दुकानटूटती है।एक होटल में दो बैरे बातकर रहे हैं।पहला बैरा : यह आदमीशराब पी कर टेबल पर हीसो गया है। उसे दो बारजगा चुका हूं, अब तीसरीबार जगाने जा रहा हू।दूसरा बैरा : उसे बाहरक्यों नहीं निकाल देते?पहला बैरा : वह मैं नहींकर सकता, क्योंकि हरबार जगाने पर वह बिलअदा करता है और फिर सोजाता है।

ऐसे आदमी को बाहर कैसेकरो! सोये लोगों कीजमात है, इसमें पंडित खूबशोषण कर रहा है। अगरकोई जगाने वाला आएगातो पंडित को दुश्मनमालूम होगा। अगर बुद्धस्वयं लौटें तो बुद्ध के हीभिक्षु और पंडित बुद्ध काविरोध करेंगे। अगर जीससवापिस लौटें तो पोप -पादरी ही उनका विरोधकरेंगे। स्वाभाविक,क्योंकि कोई भी जो जगादेगा, फिर लोग पंडित केजाल में नहीं पडेंगे।

पंडित तो चाहता है : औरलाओ अफीम। और दोअफीम! और पिलाओ अफीम!कार्ल मार्क्स ने ठीक हीकहा है कि धर्म अफीम कानशा है। निन्यानबेप्रतिशत यह बात सच है,सिर्फ एक प्रतिशत गलतहै। बुद्ध -महावीर, कृष्ण-क्राइस्ट के संबंध में गलतहै, बाकी निन्यानबेप्रतिशत-शंकराचार्य औरवेटिकन के पोप और जामामस्जिद के इमाम, इन सबकेसंबंध में तो बिलकुल सहीहै।पंडित की इतनी पकड़क्यों है जन-मानस पर?

तुमपूछते हो… जन-मानस क्योंउसके जालों में फंस जाताहै? क्योंकि उसके पाससुंदर -सुंदर शब्द हैं, भाषाहै, तर्कजाल है।जज ने चोर से पूछा : तुम उसघर में क्यों घुसे थे? चोरकोई साधारण चोर नहींथा, संस्कृत भाषा काजानकार था।

असफल होगया था परीक्षाओं में,इसलिए पंडित न होजाया सो चोर हो गयाथा। सो उस चोर ने बड़ेसरल भाव से जवाब दिया: मैं क्या करता, दरवाजेपर स्वागतम लिखा था,इसलिए।शब्द ही समझ में आते हैं कुछलोगों को। शब्द ही उनकीनौका, शब्द ही उनकासार – सर्वस्व। और जनताको भी शब्द ही समझ मेंआते हैं। और शब्द अगर बहुतदिन तक दोहराए जायेंतो उनमें ऐसी प्रतीतिहोने लगती है कि सत्य हैं।

जैसे अगर सदियों -सदियोंतक कोई बात कही गयी हैतो तुम मान ही लेते होकि ठीक होगी, अन्यथाइतने दिन इतने लते कैसेमानते! जार्ज बर्नार्डशॉ को किसी आदमी नेकहा…।जार्ज बर्नार्ड शॉ नेबहुत व्यंग्य किए हैं और बड़ेमहत्वपूर्ण व्यंग्य किए हैं।अस सदी के कुछ समझदारलोगों में एक आदमी था।किसी आदमी ने कहा किआन बहुत-सी ऐसी बातेंकहते हैं जिनको दुनिया मैंकोई भी नहीं मानता।इतने लोग गलत कैसे होसकते हैं?

जार्ज बर्नार्ड शॉ नेपता है क्या उत्तर दिया!जार्ज बर्नार्ड शॉ नेकहा कि इतने लोग सहीकैसे हो सकते हैं? सही तोकभी कोई एकाध होता है।जागा तो कोई कभीएकाध होता है। बर्नार्डशॉ की बात में बल है, जोउसने पूछा कि इतने लोगसही कैसे हो सकते हैं।जार्ज बर्नार्ड शॉअमरीका मैं बोल रहा था,एक भाषणमाला दे रहाथा।

जैसे उसकी आदत थी,लोगों को चौंका देने की,कभी उल्टी-सीधी बातेंकह देने की, तो उसने शुरूही व्याख्यान इस तरहकिया… चारों तरफ देखाखड़े होकर मंच पर और कहाकि मैं देखता हूं कि यहांकम-से -कम पचासप्रतिशत महामूढ़ बैठे हुएहैं। अमरीका जैसा देश,लोग एकदम नाराज होगये! हों-हल्ला मच गया।लोगों ने कहा। : यह क्यामजाक है?

अपने शब्दवापिस लो!थोड़ी देर तो बर्नार्डशॉ खड़ा रहा, शोरगुलसुनता रहा। जब लोग खूबचिल्लाने लगे और कुर्सियोंफेंकने की नौबत करीब आनेलगी तो उसने कहा :अच्छा भाई, मैं अपने शब्दवापिस लेता हूं। यहांपचास प्रतिशत बड़ेबुद्धिमान लोग आए हुए हैं।और लोग प्रसन्न हो गये,और अपनी- अपनी जगह बैठगये। लोगों की समझ हीइतनी है। इससे ज्यादाकोई उसकी गर्दन पकड़लेगा जिसके भी हाथ मेंगर्दन आ जाए उसकी।जिनके भी करीब पड़ गया,वे ही उसकी गर्दन पकड़लेंगे। उसका पिलाने लगेंगे।घुटी के दूध के साथ, चलोरामायण, गीता, कुरान।उसे होश ही नहीं है, तुमउसे पिलाए जा रहे हो।

जब तक उसे होश आएगा तबतक उसकी हड्डी-मांस -मज्जा में समा गयीतुम्हारी बकवास। बस तुमहनुमान जी को पूजते हो,वह भी पूजने लगा। तुमहनुमान-चालीसा पढ़तेहो, वह भी पढ्ने लगा। तुममानते हो कि हनुमान-चालीसा में बड़ी शक्ति है,वह भी मानने लगा किहनुमान-चालीसा में बड़ीशक्ति है।हनुमान-चालीसा में क्याशक्ति हो सकती है?हनुमान की पूजा कैसे चलपड़ी? अगर तुम इसकेभीतर जाओ तो तुम्हें बड़ीहैरानी होगी। यह वैसाही जैसे अगर तुम्हें दिल्लीमें मोरारजी भाई तकपहुंचना हो तो पहलेकिसी चमचे को पकड़ो।चमचा-चालीसा! हनुमानजी सेवक हैं

रामचंद्र जीके, रामचंद्र जी तक सीधीपहुंच होना तो जरामुश्किल है, हनुमान जी कोपकड़ो! और ये रहे बंदर, सोजरा इनको फुसलाया,पीठ थपथपायी, जरा पूंछपर तेल-मालिश की, ये खुशहो गये। इन्होंने कंधे परबिठाया और ले चले किचलो रामचंद्र जी सेमिलवा दें! और इनके लिएतो सब द्वार खुले हैं,रामचंद्र जी के हों किसीता मैया के हों, ये तोकहीं भी घूस जाएं। ये तोअशोक वाटिका में घुस गयेथे। तो इनको तो कौनरोकेगा, कहां रोकेगा!हनुमान-चालीसा पढ़ो!तो तुम भी पढ्ने लगे।हनुमान जी की मूर्तिजाती है रास्ते में, तुम्हेंपता ही नहीं रहता कितुमने कब सिर झुका लिया।एक सज्जन मेरे साथ घूमनेजाते थे रोज सुबह। जो भीमंदिर इत्यादि मिलताजल्दी से वे सिर झुका लेते।दों-चार दिन मंजने देखा।मैंने उनसे कहा कि यह तुमहोश से करते हो कि ये एकयंत्रवत आदत हो गई है?

तो उन्होंने कहा : नहीं -नहीं होश से करता हूं। मैंनेकहा : तो फिर एक कामकरो, कल होश रखना किनहीं करना है। अगर होशसे करते हो तो कल एकदिन सबूत दो इस बात काकि नहीं करना है।कल मैं उनको लेकर फिरनिकला। बस पहले हीहनुमान जी का मंदिरआया कि मैंने कहा, कहो।…‘मैं भूल ही गया। ‘ फिर वेकहने लगे : डर भी लगता है,रात में मैं सोचता भी रहाकि एक दिन के प्रयोग केलिए और अपनी जिंदगी-भर की तपश्चर्याछोड़ना! और कहीं हनुमानजी नाराज हो जाएं,फिर? तो भय भी है!जनता भयभीत है औरलोभी है और मूड है औरसोई हुई है।

इसका शोषणबिलकुल आसान है। किसीभी तरह का इसका शोषणकर सकते हो।मैं सूरत गया। एक मित्र नेआ कर कहा कि आपकी बातेंसुनकर प्रीतिकर लगीं। मैंएक ऐसे संप्रदाय मैं पैदाहुआ हूं जहां एक अजीबसिलसिला है। वहसिलसिला यह है कि तुमलाख रुपया अभी दान करदो मौलवी को, जोप्रधान है संप्रदाय काउसको लाख रुपया अभीदान कर दो तो वहचिट्ठी लिख कर दे देता हैकि लिख दी भगवान केनाम कि सनद रहे, किइसने लाख रुपया दिया है,सो इसको ठीक -ठीकइंतजाम कर देनाइत्यादि…।

जो -जो लाखरुपये में हो सकता हैइंतजाम स्वर्ग में, वह सबचिट्ठी पर लिख कर देदेता है। और जब तुम मरोगेतो वह चिट्ठी तुम्हारीछाती पर रखकर कब्र मेंरख दी जाती है और लोगये कर रहे हैं। पैसा भगवानतक पहुंचता नहीं। औरचिट्ठी भी नहीं पहुंचती,क्योंकि चिट्ठी वहां कब्रमें पड़ी रहती है, वहचिट्ठी कहां जाने वाली!कौन चिट्ठी ले जाएगा?

मैंने उनसे कहा : तुम जरादों-चार कब्रें तो खोद करदेखो, चिट्ठी वहीं कीवहीं पड़ी होगी। उन्होंनेकहा कि वह तो पड़ी हीहै, वह जानी कहां हैचिट्ठी!मगर लोग दे रहे हैं लोभ!आदमी इतना कमजोर हैकि उसका शोषण करनाबहुत आसान है। उसे डरादेना बहुत आसान है। उसेघबड़ा देना बहुत आसान है।और पंडितों की सारीकला यह है कि घबड़ाओ,डराओ, भयभीत करो औरयह दावा करो कि हममध्यस्थ हैं। अगर तुमनेहमारी सुनी तो हमतुम्हारी सुरक्षा काइंतजाम करवा देंगे।

मौत केबाद, अगर तुमने अभीहमारी सुनी तो हमतुम्हारा साथ देंगे।और मौत का सबसे बड़ा भयहै। और जब तक मौत का भयहै तब तक पंडित तुम्हारीछाती पर हावी रहेगा।सदगुरु मौत के भय के मिटादेते हैं, क्योंकि वे तुम्हेंउसका अनुभव करवा देते हैंजिसकी कोई मृत्यु नहीं-उस अमृत का स्वाद तुम्हेंदिला देते हैं। अमी झरत,बिगसत कंवल! वे तुम्हारेभीतर उस लोक में प्रवेशकरा देते हैं जहां अमृत कीवर्षा हो रही है और कमलविकस रहे हैं।

ऐसे कमल, जोकभी मुरझाते नहीं! वे तुम्हेंशाश्वत और सनातन सेजोड़ देते हज।जो तुम्हें शाश्वत से जोड़देगा, जो तुम्हें मृत्यु केपार का दर्शन करा देगा,वही तुम्हें पंडित औरपुरोहित के जाल के बाहरले जा सकता है। इसलिएस्वभावत: पंडित औरपुरोहित, जो भी तुम्हेंजगाएगा उसके दुश्मन हैं।ईसा को सूली दी उन्होंने,सुकरात को जहरपिलाया, मैसूर की गर्दनकाटी। यही उनका कामरहा है! यही उनका कामआगे भी रहेगा। उनसेसावधान!

Sunday, 10 April 2016

મારુ મન બાળપણ ના એ દિવસો ખોળે છે.

મારુ મન બાળપણ ના એ દિવસો ખોળે છે.

મારુ મન બાળપણ ના એ દિવસો ખોળે છે.

જયાં બા કાંસકો લઇ મારા વાળ ઓળે છે.

કોઇ પણ ભુલે મારા બાપુજીનો એકજ ઠ્પકો

અલ્યા શું કામ મારુ નામ બોળે છે?

પાડોશી હ્ંમેશા ફરીયાદ લઇ ને આવતો

તમારો છોકરો વાડા ની બદામ તોડે છે.

મોંઘા ગાલીચાઓ માં ક્યાં ઊંઘ આવે છે.

પોઢવાની મજા તો બસ બા ના ખોળે છે.

ખાવામાં આડાઈ કરું તો બા બીક બતાવે,

“ખાઈલે બાકી બહાર બાવો તને ખોળે છે.

મરાસીમ તો હવે ગરજ ના રહ્યા બસ

સ્વાર્થ વગરના સંબંધ બાળપણ જોડે છે.-

સહુને ગમી ગઈ હતી એવી અસલ હતી,

સહુને ગમી ગઈ હતી એવી અસલ હતી,

નાજુક હતી પરંતુ ગજબની ગઝલ હતી.

છે આબરૂનો પ્રશ્ન ખબરદાર પાંપણો,

જાણી ન જાય કોઈ કે આંખો સજલ હતી.

બસ રાત પૂરતી જ હતી રંગની ઋતુ,

જોયું સવારનાં તો રૂદનની ફસલ હતી.

‘ઘાયલ’ને સાંભળ્યા પછી લાગ્યું બધાને,

જે આજ સાંભળી તે ખરેખર ગઝલ હતી.