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Thursday, 31 March 2016

દિલ એની શ્યામ શ્યામ લટોને દઈ દીધું,

દિલ એની શ્યામ શ્યામ લટોને દઈ દીધું,

બળતું'તું ઘર એ કૃષ્ણને અર્પણ કરી દીધું.

*અવગણના કાં કરો છો સબબ ના કહો મને,

મેં પણ તો મારા પ્રેમનું કારણ નથી દીધું.

*પહેલાનાં સૌ રૂપાળા સ્મિતોથી છે રમ્યતર,

વર્ષો પછી તમે જે આ ફીકું હસી દીધું.

*મહેનત મને દીધી છે હવે ફેરફારની,ચાહ્યું

તમે તે મારું મુકદ્દર લખી દીધું.

*સાધુતાનો અમારો આ મહિમા જરા જુઓ,

અપનાવે છે બીજાઓ અમે જે તજી દીધું.

*સંયમ રુદન ઉપરનો નકામો હતો

'મરીઝ'કંઈ પણ થયું નહી અમે જયારે રડી દીધું.

एक सूफी फकीर हज की यात्रा पर गया। बूढ़ा फकीर था, तो शिष्यों ने सोचा कि उसके लिए एक गधा ले आना ठीक है। उन इलाकों में लोग गधों से यात्रा करते। तो गधा ले आए। लेकिन बड़े चकित हुए। क्योंकि फकीर जब उस पर बैठा

एक सूफी फकीर हज की यात्रा पर गया। बूढ़ा फकीर था, तो शिष्यों ने सोचा कि उसके लिए एक गधा ले आना ठीक है। उन इलाकों में लोग गधों से यात्रा करते। तो गधा ले आए। लेकिन बड़े चकित हुए। क्योंकि फकीर जब उस पर बैठा तो उलटा बैठा। गधे के सिर की तरफ उसने पीठ कर ली और पूंछ की तरफ मुंह कर लिया।

शिष्य कुछ कह न सके। क्या कहें? गुरु बहुत मान्य था और वह जो भी करता सदा ठीक ही करता। कोई राज होगा, मगर यह बड़ा बेहूदा लगता है।वे सब चले। जैसे ही गांव में प्रविष्ट हुए, लोग हंसने लगे। भीड़ लग गई। आवारा बच्चे पत्थर-कंकड़ फेंकने लगे। लोग बाहर निकल आए घरों के। बड़ा तमाशा होने लगा।

आखिर शिष्यों को भी बड़ी बेचैनी लगने लगी। वे भी नीचा देख कर चल रहे हैं,कि जिस गुरु के साथ हम जा रहे हैं, वह गधे पर उलटा बैठा हुआ है। बदनामी तो हमारी भी हो रही है। उनकी तो हो ही रही है, मगर हम भी तो उनके पीछे चल रहे हैं, तो लोग हम पर हंस रहे हैं।लोग उनसे भी कहने लगे, किसके पीछे जा रहे हो, दिमाग खराब हो गया है?

यह हज की यात्रा हो रही है? बहुत यात्राएं देखीं। यह तुम्हारा गुरु गधे पर उलटा क्यों बैठा है?आखिर उन्होंने कहा कि सुनिए–अपने गुरु को–कि इस बात को आप साफ ही कर दें।राज जरूर होगा। मगर हम बड़े मुश्किल मेंपड़ गए हैं।गुरु ने कहा, ऐसा है कि अगर मैं गधे पर सीधा बैठूं, तो मेरी पीठ तुम्हारी तरफ होगी। और कभी किसी गुरु की पीठ अपने शिष्यों की तरफ नहीं हुई। अगर तुम मेरेपीछे चलो, मैं गधे पर सीधा बैठूं तो मेरी पीठ तुम्हारी तरफ होगी। यह भी हो सकता है। क्योंकि मैंने सभी विकल्प सोच लिए तुम आगे चलो, मैं गधे पर पीछे बैठकर सीधा चलूं तो तुम्हारी पीठ गुरु की तरफ होगी। जब गुरु की पीठ भी क्षमा योग्य नहीं है कि शिष्य की तरफ हो, तो शिष्य की पीठ गुरु की तरफ हो तो यह तो अक्षम्य अपराध हो जाएगा।

तो यही एक सुगम उपाय है, कि मैं गधे पर उलटा बैठूं,तुम मेरे पीछे चलो। आमने-सामने हम रहे।कहानी बड़ी प्रीतिकर है। बड़ी रहस्यपूर्ण है।कबीर कहते हैं, आगे थे सदगुरु मिला।गुरु सदा आगे से मिलता है। गुरु सदा तुम्हारे आमने-सामने मिलता है। वह तुम्हारी आंखों में आंखें डाल कर देखेगा। वह तुम्हारे हृदय से हृदय की बातें कहेगा।वह तुम्हारे सम्मुख होगा। वह तुम्हें अपने सम्मुख करेगा। यह मिलन सीधा-सीधा है। आमने-सामने है। यह साक्षात्कार है।

कहे कबीर दीवाना,
प्रवचन-२, ओशो

प्रश्न: दुनिया में इतनी गलतफहमी क्योंहै? क्योंकि लोग बेहोश हैं, क्योंकि लोग गहरीनींद में हैं, क्योंकि लोग रोबोट की तरहहैं।संवाद असंभव है; तुम कुछ कहते हो, कुछ औरहीसमझा जायेगा।संवाद का एकमात्र ढंग है प्रेम में, मौनमें। लेकिन कोईनहीं जानता कि प्रेम में कैसे हों, औरकिसी को पता नहीं कि मौन कैसे हों! जबकिसिर्फ प्रेम और मौन में संवाद संभव है।

प्रश्न:
दुनिया में इतनी गलतफहमी क्योंहै?

क्योंकि लोग बेहोश हैं, क्योंकि लोग गहरीनींद में हैं, क्योंकि लोग रोबोट की तरहहैं।संवाद असंभव है; तुम कुछ कहते हो, कुछ औरहीसमझा जायेगा।संवाद का एकमात्र ढंग है प्रेम में, मौनमें। लेकिन कोईनहीं जानता कि प्रेम में कैसे हों, औरकिसी को पता नहीं कि मौन कैसे हों! जबकिसिर्फ प्रेम और मौन में संवाद संभव है।

लेकिन हम बौद्धिकता सेभरे हैं, इसलिए संवाद असंभव है। दुनिया में इतनीगलतफहमी के लिए भाषा भी एक कारणहै।मौन से संवाद स्थापित करना प्रारंभ करो। अपने मित्र का हाथ अपनेहाथ में ले लो, मौन बैठ जाओ।

चाँद को देखो, चाँद को महसूस करो,और दोनों मौन में इसे महसूस करो। और तुम देखोगे, वहां संवादघटता है --
सिर्फ संवाद ही नहीं बल्किसम्प्रेषण घटता है। और तुम्हारे हृदय एक ही लयमें धड़कने लगते हैं, तुम अपने भीतर एकही आकाश, एक ही आनंद महसूस करनेलगते हो। और तब तुमदोनों एक-दूसरे के होने पर ओवरलैप करनेलगते हो। वहां संवाद है! तुमने बिना कुछ कहे कह दिया, और वहांकिसी तरह का गलत समझना नहीं होगा।

अगर तुम गलतफहमी को टालना चाहते हो तो तुम्हेंअनिवार्य रूप से मौन सीखना होगा। अगर तुम मौनसीखते हो तो पहली चीज यहहोगी कि तुम कभी किसी कोगलत नहीं समझोगे। और यह बहुत बड़ा आनंद है --किसी को भी गलत नहींसमझना! तब तुम अच्छे श्रोता हो गए, तुम सम्यक श्रवण जानोगे।और हर चीज तुम्हारे लिए स्पष्ट और साफ-सुथरी होगी।

यह स्पष्टता तर्क से नहीं आएगी,बौद्धिकता से नहीं आएगी, विश्लेषण सेनहीं आएगी -- यह स्पष्टता मौन के द्वाराआती है। अगर तुम्हारे मौन में किसी केशब्द उतरते हैं तो तुम गलत अर्थ नहीं लगाओगेक्योंकि वहां कोई दखल देने वाला नहीं है; या तो तुमसमझते हो या तुम नहीं समझते, लेकिन वहांगलतसमझने का कोई कारण नहीं है।मौन सीखो! और कम से कम अपने मित्र के साथ,अपने प्रेमी के साथ, अपने परिवार के साथ, या यहांपर, कभी-कभी मौन में बैठो। गपशप मतकरते रहो, बातचीत मत करते रहो।

बातचीत बंद करो, और सिर्फ बाहर हीनहीं, भीतरीबातचीत भी बंद करो। अंतराल में बने रहो।बस बैठ जाओ, कुछ नहीं करो, सिर्फ एक-दूसरे केलिए उपस्थित रहो। और जल्दी ही तुमसंवाद का एक नया ढंग पा लोगे, और वहीसही ढंग है

परम प्यारे ओशो
दिस वेरी बॉडी दि बुद्धा

जीवन की मृत्यु नहीं औरमृत का जीवन नहींएकबार ऐसा हुआ कि किसी साधु का शिष्य मर गया था।वह साधु उस शिष्य के घर गया।

जीवन की मृत्यु नहीं औरमृत का जीवन नहींएकबार ऐसा हुआ कि किसी साधु का शिष्य मर गया था।वह साधु उस शिष्य के घर गया।

उसके शिष्य की लाशरखी थी और लोग रोते थे। उस साधु नेजाकर जोर से पूछा, 'यह मनुष्य मृत है या जीवित?

'इस प्रश्न से लोग बहुत चौंके और हैरान हुए। यह कैसा प्रश्नथा! लाश सामने थी और इसमें पूछने कीबात ही क्या थी?

थोड़ी देरसन्नाटा रहा और फिर किसी ने साधु से प्रश्न किया,'आप ही बतावें?

' जानते हैं कि साधु ने क्या कहा? साधुने कहा, 'जो मृत था, वह मृत है; जो जीवित था, वहअभी भी जीवित है। केवलदोनों का संबंध टूटा है।

'जीवन की कोई मृत्युनहीं होती है और मृत का कोईजीवन नहीं होता है।जीवन कोजो नहीं जानते हैं, वे मृत्यु को जीवन काअंत कहते हैं।

जन्म जीवन का प्रारंभनहीं है और मृत्यु उसका अंत नहीं है।जीवन, जन्म और मृत्यु के भीतरभी है और बाहर भी है। वह जन्म केपूर्व भी है और मृत्यु के पश्चात भी है।

उसमें ही जन्म है, उसमें ही मृत्यु है;पर न उसका कोई जन्म है, न उसकी कोई मृत्यु है।एक शवयात्रा से लौटा हूं। वहां चिता सेलपटें उठीं, तोलोग बोले, 'सब समाप्त हो गया।' मैंने कहा, 'आंखें नहींहैं, ऐसा इसलिए लगता है।

'ओशो

साधारणत: लोग सोचते हैं, दूसरे को कष्ट देना पाप है। यह नजर भी दूसरे पर हो गई। यह नजर भी धर्म की न रही। धर्म का कोई प्रयोजन दूसरे से नहीं। धर्म का संबंध स्वयं से है। स्वयं को दुख देना पाप है।हां, जो स्वयं को दुख देता है, उससे बहुतों को दुख मिलता है-यह बात और। जो स्वयं को ही दुख देता है, वह किसको दुख नदेगा? जो स्वयं दुर्गंध से भरा है, उसकेपास जो भी आएंगे, उनको दुर्गंध झेलनी पड़ेगी। लेकिन वह बात ‘गौण है।तुम दूसरों की फिक्र मत करना। क्योंकि दूसरों की फिक्र से एक बहुत उपद्रव पैदा होता है, वह यह कि तुम भीतर की दुर्गंध तो नहीं मिटाते, बाहर से इत्र-फुलेल छिड़क लेते हो। तो दूसरे को दुर्गंध नहीं मिलती, लेकिन तुम तो दुर्गंध में ही जीयोगे। ‘परमात्मा तक इत्र को ले जाने की कोई सुविधा नहीं है। वहां तो जब भीतर की सुवास पैदा होगी, तभी सुवास होगी। वहां धोखा नहीं चलेगा। वहा बाजार से खरीदी गई सुगंधियां काम न आएंगी।इसलिए दूसरी बात खयाल रख लो कि पाप का कोई सीधा संबंध दूसरे से नहीं है, न पुण्य का कोई सीधा संबंध दूसरे से है।पुण्य का अर्थ है : तुम्हारे आनंद की, अहोभाव की दशा।पुण्य का अर्थ है : तुम्हारा नाचता हुआ, आनंदमग्न चैतन्य।पुण्य का अर्थ है : तुम्हारे भीतर की बांसुरी बजती हुई।ओशो, एस धम्मो सनंतनो, भाग -3

*E-PAPER GUJARAT ROZGAAR SAMACHAR (30/03/2016) DECLARE**DIRECT LINK*

જિંદગીભર આપણો છે સાથ, સાથે ચાલ તું !

જિંદગીભર આપણો છે સાથ, સાથે ચાલ
        તું !

હાથમાં મારા મૂકી દે હાથ, સાથે ચાલ

       તું !

હરકદમ પર કેટલાં પ્રશ્નો કસોટી કેટલી !

આ હજી તો માત્ર છે શરુઆત, સાથે ચાલ

       તું !

આપણું આ મૌન પણ દુનિયાને સંભળાતું હશે,

લે હવે કરવી નથી કંઈ વાત, સાથે ચાલ

      તું !

કોઈ પણ મારા વિચારોમાંય ફરકે ના હવે,

એકલી છે ખૂબ મારી જાત, સાથે ચાલ

તું !

– રિષભ મહેતા