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Tuesday, 15 March 2016

मंत्र का अर्थ है: किसी चीज को बार—बारदोहराना। यह सूत्र कह रहा है: चित्त ही मंत्र है—चित्त मंत्र:। यह कहता है, औरकिसी मंत्र की जरूरत नहीं;

मंत्र का अर्थ है: किसी चीज को बार—बारदोहराना। यह सूत्र कह रहा है: चित्त ही मंत्र है—चित्त मंत्र:। यह कहता है, औरकिसी मंत्र की जरूरत नहीं;

अगर तुम चित्त को समझ लो तो चित्त की प्रक्रियाही पुनरुक्ति है। तुम्हारा मन कर क्या रहा है जन्मों—जन्मों से—सिर्फ दोहरा रहा है।

सुबह से सांझ तक तुम करते क्या हो—रोज वही दोहराते हो, जो तुमने कल किया था, जो परसों किया था,

वहीतुम आज कर रहे हो; वही तुम कल भी करोगे, अगर न बदले। और तुम जितना वही करते जाओगे उतनी ही पुनरुक्ति प्रगाढ होती जायेगी और तुम झंझट में इस तरह फंस जाओगे कि बाहर आना मुश्किल हो जायेगा।

लोग मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि सिगरेट नहीं छूटती। सिगरेट मंत्र बन गयी है। उन्होंने इतनी बार दोहराया है—दिन में दो पैकेट पी रहे है। इसका मतलब हुआ कि चौबीस बार दोहरा रहे है; बीस बार दोहरा रहे हैं, बार—बार दोहराया है और सालों से दोहरा रहे है;

आज अचानक छोड़ देना चाहते हैं। लेकिन जोचीज मंत्र बन गयी, उसको अचानक नहीं छोड़ाजा सकता। तुम छोड़ दोगे इससे क्या फर्क पड़ता है;

पूरा मन मांग करेगा। पूरा शरीर उसको दोहरायेगा। वह कहेगा—चाहिए। उसी को तुम तलफ कहते हो। तलफ का मतलब हुआ कि जिस चीज को तुमने मंत्र बना लिया,

उसे अचानक छोड़ना चाहते हो—यह नहीं हो सकता। तलफ का मतलब है किजो चीज मंत्र बन गयी है, उसके विपरीत मंत्र से तोड़ना होगा।

रूस में पावलव ने इस पर बहुत काम किया। और पावलव अकेला आदमी है, जिसने तलफ वालेमरीजों को ठीक करने में सफलता पायी।

अगर आप सिगरेट पीने के रोगी हो गये हैं छोड़ना चाहते हैं और नहीं छूटती तो पावलव मंत्र का प्रयोग करता था। उसके मंत्र जरा तेज थे।

वह आपको सिगरेट देगाऔर जैसे ही आप सिगरेट हाथ में लेंगे, आपको बिजली का शाक लगेगा; झनझना जायेगीपूरी तबीयत, सिगरेट हाथ से छूट जायेगी।

ऐसा सात दिन आपको पावलव भरती रखेगा अपने अस्पताल में और जब भी आप सिगरेट पियेंगे, तब बिजली का शाक लगेगा।

सात दिन में मंत्र सिगरेट से ज्यादा गहरा हो जायेगा। सिगरेट का नाम ही सुनकर आपको कंपकंपी आने लगेगी। पीने का रस तोदूर, एक वैराग्य का उदय हो जायेगा।

पावलव ने हजारों मरीज विपरीत मंत्र से ठीक किये। और पावलव कहता है कि जो लोग भी आदतों से ग्रस्त हो गये हैं,

जब तक उनको विपरीत आदतें न दी जायें, जो पहली आदत से ज्यादा मजबूत हों तब तक कोई छुटकारा नहीं।

शिव–सूत्र–प्रवचन–4चित्त के अतिक्रमण के उपाय—(प्रवचन—चौथा)

OSHO कभी-कभी नहीं, सदा ही ज्ञानी साथ-साथ रोता और हंसता है। हंसता है अपने को देखकर, रोता है तुम्हें देखकर। हंसता है यह देखकर, कि जीवन की संपदा कितनी

कभी-कभी नहीं, सदा ही ज्ञानी साथ-साथ रोता और हंसता है। हंसता है अपने को देखकर, रोता है

तुम्हें देखकर। हंसता है यह देखकर, कि जीवन की संपदा कितनी सरलता से उपलब्ध है। रोता है यह देखकर, कि करोड़ों-करोड़ों लोग व्यर्थ ही निर्धन बने हैं।

हंसता है यह देखकर कि सम्राट होना बिलकुल सुगम था और रोता हैयह देखकर कि फिर क्यों अरबों लोग भिखारी बने हैं?जिसे तुम पाकर ही पैदा हुए हो, जिसे तुमने कभी खोया नहीं,

जिसे तुम चाहो तो भी खो न सकोगे, जिसे खोने का उपाय ही नहीं है, उसे तुमने खो दिया है यह देखकर रोता है।यह देखकर हंसता है, कि जो मुझे मिल गया है, उससे मिलाने के लिए कुछ भी करने की कभी कोई जरूरत न थी।

कहीं जाने की, किसी यात्रा की कोई जरूरत न थी। यह देखकर हंसता है कि सभी मेरे भीतर था और मैं कैसे चूकता रहा!और अचानक एक क्षण में आती है आंधी और सब कूड़ा-करकट उड़ जाता है। और भीतर परमात्मा विराजमान है।

तुम उसके मंदिरहो।तो जब भी भीतर देखता है, मुस्कुराता है; जब भी बाहर देखता है, उसकी आंखें आंसुओंसे भर जाती हैं।और ऐसा एक ज्ञानी के साथ नहीं होता, सभी ज्ञानियों के साथ होता है–और होगा ही।

इससे अन्यथा होने का उपाय नहीं है।इतना सरल है और इतना कठिन हो गया है!कबीर कहते हैं, कि मुझे हंसी आती है कि मछली पानी में क्यों प्यासी है?

चारों तरफ पानी ही पानी है, बाहर भीतर पानी ही पानी है; मछली पानी में ही पैदा होती है,पानी में ही जीती है, पानी में ही लीन होजाती है; फिर भी प्यासी!
    
    तो कबीर कहते हैं,

“मुझे आवै हांसी”; मुझे बड़ी हंसी आती है।आदमी परमात्मा में ही पैदा होता है, जैसे परमात्मा सागर हो तुम्हारे चारोंतरफ–और चारों तरफ ही नहीं, भीतर भी। वही हो भीतर, वही हो बाहर और फिर भी तुम अतृप्त रह जाओ।

अहर्निश उसका नाद बज रहा हो और तुम्हें धुन भी न सुनाई पड़े, एक कण भी तुम्हारे कानों में न आए। चारों ओर उसी के फूल खिलते हों

और तुम्हें कोई सुगंध न मिले। सब तरफ उसी की रोशनी हो और तुम अंधे ही बने रहो और अपने अंधेरे में ही जी लो।इस उलझन को देखकर ज्ञानी हंसता भी है, रोता भी है।

तुम पर उसे दया भी आती है और तुम्हारी अत्यंत हास्यास्पद स्थिति देखकर वह हैरान भी होता है।और इसलिए अक्सर ज्ञानी पागल मालूम होगा। क्योंकि तुम उस आदमी को भी समझ सकते हो, जो रोता हो–दुखी होगा।

तुम उस आदमी को भी समझ सकते हो, जो हंसताहै–सुखी होगा। वह आदमी तुम्हारी समझ के बाहर हो जाता है, जो हंसता भी है, रोता भी है साथ-साथ!अलग-अलग तुम समझ लेते हो। तुम भी हंसे हो, तुम भी रोए हो। हंसे हो, जब प्रसन्न थे;

एक मनोदशा थी। रोए हो, जब दुखी थे; एकदूसरी मनोदशा थी। कभी दिन था, कभी रात थी; कभी सुख था, की दुख था; कभी खिले थे, कभी मुरझा गए थे। उन दोनों स्थितियों को तुम जानते हो; लेकिन दोनों साथ-साथ तो तुमने या तो पागल में देखी हैं,

या ज्ञानी में देखी हैं।पागलखाने में जाओ तो तुम्हें पागल कभी-कभी, हंसते-रोते, साथ-साथ मिल जाएंगे। और ज्ञानी में फिर यही घटना घटती है।तो ज्ञानी पागल जैसा लगता है।

इसलिए बहुत बार ज्ञानियों से हम वंचित ही रह गए हैं। क्योंकि बेबूझ मालूम पड़ती है, वह जो कहता है, पहेलियां मालूम होती हैं। वह जो कहता है, उससे कुछ सुलझता नहीं, और उलझता मालूम पड़ता है।

उसे देखकर ऐसा नहीं लगता है, कि कोई समाधान मिल जाएगा। ऐसा लगता है, कि तुम वैसे ही उलझे थे, इसे देखकर और उलझ जाओगे।हंसता और रोता है साथ-साथ, इसका गहरा अर्थ है। इसका अर्थ है, कि जिनको तुमने अब तक विपरीत की तरह जाना है,

ज्ञानी उन्हें एक की तरह जानता है। उपनिषद कहते हैं, “एकं सत विप्रा बहुधा वदंति”। एक ही सत्य है; जानने वालों ने उसे बहुत ढंग से कहा। एक ही अवस्था है जीवन की, अभिव्यक्ति बहुत तरह से हो सकती है।वही रोता है, वही हंसता है; वह एक ही है–एकं सत। वह सत्य एक ही है, जो हंसता है और रोता है।

जो दुखी होता है, जो सुखीहोता है, वह एक ही है।लेकिन तुम कभी उसे देख नहीं पाए। या तो तुमने उसे दुखी देखा, जब दुखी देखा, तब तुम सुख को भूल गए। और जब तुमने उसे सुखी देखा, तब तुम दुख को भूल गए। इसलिए तुम्हारे जीवन में अधूरापन है।

तुम उसे अखंड न देख पाए, कि वही हंसता है, वही रोता है। और अगर तुम यह देख पाओ कि वही हंसता है, वही रोता है, तो तुम दोनोंके पार हो गए। हंसना एक भाव-दशा रह गई, रोना भी एक भाव-दशा रह गई, तुम साक्षी हो गए। तुम जाग गए।तो ज्ञानी जागता है।

उस जागने में सभी अवस्थाएं सम्मिलित हो जाती हैं एक साथ। तुम खंड-खंड हो, ज्ञानी अखंड है। इसलिए ज्ञानी के सुख में भी तुम दुख की छाया पाओगे। और ज्ञानी के दुख में भी तुम सुख का रंग देखोगे।

      ��ओशो��
कहे कबीर दीवाना–प्रवचन–16

OSHO धार्मिक लोगों ने कैसी-कैसी तरकीबें निकाली हैं। पाप करते हैं गंगा में स्नान कर आते हैं।

धार्मिक लोगों ने कैसी-कैसी तरकीबें निकाली हैं।
पाप करते हैं गंगा में स्नान कर आते हैं।

अब गंगा में स्नान करने का और पाप के मिटने से क्या संबंध हो सकता है!
दूर का भी कोई संबंध नहीं हो सकता। गंगा का कसूर क्या है,

पाप तुमने किया! और ऐसे अगर गंगा धो-धोकर सबके पाप लेती रही, तो गंगा के लिए तो नर्क में भी जगह न मिलेगी।
इतने पाप इकट्ठे हो गए होंगे!

और अगर इतना ही आसान हो-पाप तुम करो, गंगा में डुबकी लगा आओ और पाप हल हो जाएं-तब तो पाप करने में बुराई ही कहा रही?

सिर्फ गंगा तक आने-जाने का श्रम है। तो जो गंगा के किनारे ही रह रहे हैं, उनका तो फिर कहना ही क्या!तुमने तीर्थ बना लिए।

तुमने छोटे-छोटेपुण्य की तरकीबें बना लीं, ताकि बड़े-बड़े पापों को तुम झुठला दो, भुला दो। छोटा-मोटा अच्छा काम कर लेते हो,

अस्पताल को दान दे देते हो-दान उसी चोरी में से देते हो जिसका प्रायश्चित्त कर रहे हो-लाख की चोरी करते हो, दस रुपया दान देते हो। लेकिन लाख की चोरी को दस रुपए के दान में ढांक लेना चाहते हो!

तुम किसे धोखा दे रहे हो?या, इतना भी नहीं करता कोई। रोज सुबह बैठकर पांच-दस मिनट माला जप लेता है। माला के गुरिए सरका लेता है, सोचता है हल हो गया।

या राम-राम जप लेता है। या रामनाम छपी चदरिया ओढ़ लेता है। सोचता है मामला हल हो गया। जैसे राम पर कुछ एहसान हो गया।

अब राम समझें! चदरिया ओढ़ी थी। कहने को अपने पास बात हो गई। मंदिर गए थे, हिसाब रख लिया है।

जीवन अंधेरे से भरा रहे और प्रकाश की ज्योति भी नहीं जलती! सिर्फ अंधेरी दीवालों पर तुम प्रकाश शब्द लिख देते हो, या दीए के चित्र टल देते हो।

प्यास लगी हो तो पानी शब्द से नहीं बुझती। अंधेरा हो तो दीए शब्द से नहीं मिटता।मंजरे-तस्वीर दर्दे-दिल मिटा सकता नहीं,आईना पानी तो रखता है पिला सकता नहीं..

ओशो, एस धम्मो सनंतनो, भाग -2

ताओ उपनिषाद ( भाग-३) लाओत्से भी ठीक कृष्ण से सहमत है। लाओत्से कहता है, “वह युद्ध करता है, लेकिन हिंसा से प्रेम नहीं करता।’और फिर एक बात कहता है, जो बड़े मतलब की है,


“चीजें अपना शिखर छूकर फिर गिरावट को उपलब्ध हो जाती हैं।’लाओत्से कहता है, विजय अगर तुमने पा ली, तोजल्दी ही तुम हारोगे।

इसलिए विजय पाना मत, विजय को शिखर तक मत ले जाना। किसी चीज को इतना मत खींचना कि ऊपर जाने का फिर उपाय ही न रह जाए।

फिर नीचे ही गिरना रह जाता है। लाओत्से कहता है, सदा बीच में रुक जाना।अतिवादी कभी बीच में नहीं रुकता, खींचता जाता है। और एक जगह आती है, जहां से फिर नीचे उतरने के सिवाय कोई रास्ता नहीं रह जाता।

आखिर हर शिखर से उतराव होगा ही। लेकिन लाओत्से की बात किसी ने भी नहीं सुनी है कभी। सभी सभ्यताएं अति कर जाती हैं; एक शिखर पा लेती हैं, और गिर जाती हैं।

कितनी सभ्यताएं शिखर छूकर गिर चुकी हैं! फिर भी वह दौड़ नहीं रुकती। बेबीलोन, असीरिया, मिस्र अब कहां हैं? एक बड़ा शिखर छुआ, फिर नीचे गिर गए

अभी भी वैज्ञानिक कहते हैं कि इजिप्त के जो पिरामिड्स हैं, उतने बड़े पत्थर किस भांति चढ़ाए गए, यह अभी भी नहीं समझा जा सकता।

कुछ पत्थर गिजेह के पिरामिड में इतने बड़े हैं कि हमारे पास जो बड़ी से बड़ी क्रेन है, वह भी उन्हें उठा कर ऊपर नहीं चढ़ा सकती।

बड़ी हैरानी की बात मालूम पड़ती है! तो फिर इजिप्त उनको आज से कोई छह हजार साल पहले, सात हजार साल पहले, कैसे चढ़ा सका? अब तक यही समझा जाता था कि आदमियों के सहारे। लेकिन उस पत्थर को चढ़ाने के लिए तेईस हजार आदमियों की एक साथ जरूरत पड़ेगी।

तो उनके हाथ ही नहीं पहुंच सकते पत्थर तक। तेईस हजार आदमी एक पत्थर को उठाएंगे कैसे? क्या राज रहा होगा?

वे पत्थर कैसे चढ़ाए गए?इजिप्त की पुरानी किताबें कहती हैं कि इजिप्त ने ध्वनि की कीमिया खोज ली थी। और एक विशेष ध्वनि करते ही पत्थर ग्रेविटेशन खो देते थे; उनका जो वजन है, वह खो जाता था।

आज कहना मुश्किल है कि यह कहां तक सही है। लेकिन और कोई उपाय भी नहीं है सिवाय यह मानने के कि उन्होंने कुछ मंत्र का, कुछ ध्वनि का उपाय खोज लियाथा।

चारों तरफ एक विशेष ध्वनि करने से एंटी-ग्रेविटेशन, जो गुरुत्वाकर्षण है, उसकी विपरीत स्थिति पैदा हो जाती थी, और पत्थर उठाया जा सकता था।

यहां पूना के पास, कोई पचास मील दूर, सिरपुर में एक पत्थर है। एक मस्जिद के पास पड़ा हुआ है।

जिस दरवेश की, जिस फकीर की वह मजार है, नौ आदमी, ग्यारह आदमी अपनी छिगलियां उस पत्थर में लगा दें और फकीर का नाम लें जोर से, तो अंगुलियों के सहारेवह बड़ा पत्थर उठ आता है सिर के ऊपर तक। बिना नाम लिए ग्यारह आदमी कितनी ही कोशिशकरें, वह पत्थर हिलता भी नहीं।

पर एक क्षणको वह पत्थर ग्रेविटेशन खो देता है। वैज्ञानिक उसका अध्ययन करते रहे, लेकिन अब तक उसकी कोई बात साफ नहीं हो सकी कि मामला क्या है।

उस फकीर के नाम में कोई ध्वनि, आस-पास पत्थर के, निर्मित हो जाती है और पत्थर उठ जाता है।पर जिन्होंने ध्वनि के सहारे इतने बड़े पत्थर पिरामिड पर चढ़ाए होंगे, वे आज कहां हैं? वे खो गए। एक शिखर छुआ।

आज पिरामिड खड़े रह गए हैं, लेकिन उनको बनाने वालों काकुछ भी पता नहीं रहा। असीरिया, बेबीलोन, सब खो गए, जहां सभ्यता जनमी।प्लेटो ने अपने संस्मरणों में लिखा है किइजिप्त से यात्रा करके लौटे हुए एक व्यक्ति ने बताया कि इजिप्त के मंदिर के बड़े पुजारी ने, सोलन ने, उसे बताया है कि कभी एक महाद्वीप परम सभ्यता को उपलब्ध होगया था।

अटलांटिस उस महाद्वीप का नाम था; फिर वह पूरी सभ्यता के साथ समुद्र में खो गया। क्यों खो गया, इसका कोई कारण आज तक नहीं खोजा जा सका। लेकिन जो भी मनुष्य जान सकता है,

वह अटलांटिस की सभ्यता ने जान लिया था। खो जाने का क्या कारण होगा, इस पर लोग चिंतन करते हैं। हजारों किताबें लिखी गई हैं

अटलांटिस पर। और अधिक लोगों का यही निष्कर्ष है कि अटलांटिस ने इतनी विज्ञान की क्षमता पा ली कि अपने ही विज्ञान के शिखर से गिरने के सिवाय कोई उपाय नहीं रह गया।

वह अपनी ही जानकारी के भार से डूब गया। या तो कोई विस्फोट उसने कर लिया अपनी ही जानकारी से, जैसा आज हम कर सकते हैं।

आज कोई पचास हजार उदजन बम अमरीका और रूस के तहखानों में इकट्ठे हैं।

अगर जरा सी भी भूल हो जाए और इनका विस्फोट हो जाए, तो अटलांटिस नहीं, पूरी पृथ्वी बिखर जाएगी।

इसलिए आज जहां-जहां एटम बम इकट्ठे हैं, उनकी तीनत्तीन चाबियां–क्योंकिएक आदमीका दिमाग जरा खराब हो जाए, गुस्सा आ जाए,

किसी का पत्नी से झगड़ा हो जाए और वह सोचे कि खतम करो इस दुनिया को–तो तीनत्तीन चाबियां रखी हुई हैं कि जब तक तीन आदमी राजी न हों, तब तक कुछ भी नहीं किया जा सकता।

लेकिन तीन आदमी भी राजी हो सकते हैं। तीन आदमी राजी हो सकते हैं, सारी पृथ्वी मिटाई जा सकती है।अटलांटिस पूरा डूब गया शिखर को पाकर। खयाल यह है कि उसका ज्ञान ही उसकी मृत्यु का कारण बना।

अभी इस तरह के पत्थर मिलने शुरू हुए हैं सारी दुनिया में। अब तक उन पत्थरों पर खुदी हुई तस्वीरों का कुछ अंदाज नहीं लगता था।

लेकिन अब लगता है। अभी आपके जो चांद से यात्री आकर लौटे हैं, वे जिस तरह का नकाब पहनते हैं और जिस तरह के वस्त्र पहनते हैं,

उस तरह के वस्त्र और नकाब पहनेहुए दुनिया के कोने-कोने में पत्थरों पर मूर्तियां हैं और चित्र हैं।

अब तक हम जानते भी नहीं थे कि ये क्या हैं। लेकिन अब बड़ी कठिनाई है।

जिन लोगों ने ये चित्र खोदे हैं पत्थरों पर, उन्होंने अगर अंतरिक्ष यात्री न देखे हों, तो ये चित्र खोदे नहीं जा सकते।

और अगर ये दस-दस हजार साल पुराने चित्र पत्थरों पर जो खुदे हैं, अगर इन्होंने भी अंतरिक्ष यात्री देखे हैं, तो सभ्यताएं हमसे भी पहले काफी यात्राएं कर चुकी हैं,

शिखर छू चुकी हैं।मैक्सिको में कोई बीस मील के बड़े पहाड़ पर चित्र खुदे हुए हैं। वे चित्र ऐसे हैं कि नीचे से तो देखे ही नहीं जा सकते;

क्योंकिउनका विस्तार बहुत बड़ा है। बीस मील की सीमा में वे चित्र खुदे हुए हैं, और एक-एक चित्र मीलों तक फैला है।

तो नीचे से तो उनको देखने का ही उपाय नहीं है; उनको देखने के लिए सिवाय हवाई जहाज के कोई उपाय नहीं है।

और वे चित्र कोई पंद्रह हजार वर्ष पुराने हैं।तो अब बड़ी कठिनाई है यह कि या तो जिन्होंने चित्र खोदे थे,

उन्होंने हवाई जहाज के यात्रियों को देखने के लिए खोदे थे। और अगर हवाई जहाज नहीं था पंद्रह हजार साल पहले, तो इन चित्रों को खोदना भीमुश्किल है।

इनके खोदने का कोई प्रयोजन भी नहीं है। क्योंकि इनको कोई देख ही नहीं सकेगा जमीन पर। इतनी दूरी से ही वे चित्र दिखाई पड़ सकते हैं!

तो वैज्ञानिक कठिनाई में हैं कि अगर हम यह मानें कि पंद्रह हजार साल पहले हवाई जहाज था, तो हमें यह भ्रांति छोड़ देनी पड़ेगी कि हमने ही पहली दफा हवाई जहाज निर्मित कर लिया है।

अगर पंद्रह हजार साल पहले हवाई जहाज था, तो सभ्यताएं हमसे पहले भी शिखर पा चुकी हैं।वे सभ्यताएं कहां हैं आज? आज उनका कोई नामलेवा भी नहीं है।

आज उनका कुछ निशान भी नहीं छूट गया है। ये भी अनुमान हैं हमारे। इनके बाबत भी कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता।

लाओत्से कहता है, सभी चीजें शिखर पर जाकर नीचे गिर जाती हैं। सभी चीजें! विजय भी शिखर पर जाकर गिर जाती है। सफलता भी शिखर पर जाकर गिर जाती है।

यश भी शिखर पर जाकर गिर जाता है।लाओत्से कहता है, इसलिए बुद्धिमान आदमी कभी किसी चीज को शिखर तक नहीं खींचता। वह गिरने का उपाय है।

वह अपने हाथ नीचे उतर आने की व्यवस्था है।

     -ओशो

,,,,,,,संभोग से समाधिकी और,,,,,,एक आदमी बीमार था और बीमारी कुछ उसे ऐसी थी कि दिन रात उसेभूख लगता थी। सच तो यह है कि उसे बीमारी कुछ भी नहीं थी। भोजन केसंबंध में उसने कुछ विरोध की किताबें पढ़ली थी। उसने पढ़ लिया था कि भोजन पाप है। उपवास पुण्य है। कुछ भी खाना हिंसा है।

जितना वह यह सोचने लगा कि भोजन करना पाप है, उतना ही भूख को दबाने लगा। जितना भूख को दबाने लगा, भूखअसर्ट करने लगी। जो से प्रकट होने लगी।

तो वह दो चार दिन उपवास करता था और एक दिन पागल की तरह से कुछ भी खा जाता था। जब कुछ भी खा लेता था तो बहुत दुख होता था।

क्योंकि फिर खाने की तकलीफ झेलनी पड़ती थी। फिर पश्चाताप में दो-चार दिन उपवास करता था। और फिर कुछ भी खा लेता था।

आखिरउसने तय किया कि यह घर रहते हुए न हो सकेगा ठीक मुझे जंगल चल जानचाहिए।वह पहाड़ पर गया। एक हिल स्टेशन परजाकर एक कमरे में रहा।

घर के लोग भी परेशान हो गये। उसकी पत्नी ने यह सोच कर की शायद वह पहाड़ पर अब जाकर भोजन की बीमारियों से मुक्त हो जायेगा।

उसने बहुत से फूल पहाड़ पर भिजवाये। और कहलवाया कि मैं बहुत खुश हूं कि तुम शायद पहाड़ से स्वस्थ होकर लौटोगे। मैं शुभ कामना के रूप में ये फूल भेज रही हूं।

उस आदमी का वापस तार आय। तार में लिख था—‘’मेनी थैंक्स फॉर दी फ्लावर्स, दे आर सो डैलिसियस’’ उसने तार किया कि बहुत धन्यवाद फूलों के लिए, बड़े स्वादिष्ट है।

वह फूलों को खा गया, वहां पहाड़ पर जो फूल उसको भेजे गये थे। अब कोई आदमी भोजन से लड़ाई शुरू कर देगा। वह फूलों को खा सकता है।

आदमी सेक्स से लड़ाई शुरू किया ओर उसने क्या-क्या सेक्स के नाम पर खाया,इसका आपने कभी हिसाब लगाया? आदमी कोछोड़ कर, सभ्य आदमी को छोड़ कर, होमोसेक्सुअलिटीकहीं है? जंगल में आदिवासी रहते है, उन्होंने कभी कल्पना भीनहीं की कि होमोसेक्सुअलिटीभी कोई चीज होती है।

कि पुरूष और के साथ संभोग कर सकता है। ये सब कल्पना के बहार की बात है।मैं आदि वासियों के पास रहा हूं, मैंने कहां की सभ्य लोग इस तरह भी करते है, वे कहने लगे हमारे विश्वास के बहार की बातहै। यह कैसे हो सकता है?लेकिन अमेरिका में उन्होंने आंकड़े निकाले है—

पैंतीस प्रतिशत लोग होमोसेक्सुअल है। और बेल्जियम और स्वीडन और हॉलैंड मेंहोमोसेक्सुअल के क्लब हे, सोसाइटी है, अख़बार निकलते है और सरकार से यह दावा करते है कि होमोसेक्सुअलिटीके ऊपर से कानून उठा दिया जाना चाहिए।

हम तो यह मानते है होमोसेक्सुअलिटीठीक है। इसलिएहमको हकमिलना चाहिए। कोई कल्पना नहीं कर सकता कि यह होमोसेक्सुअलिटीकैसे पैदा हो गई।

सेक्स के बाबत लड़ाई का यह परिणाम है।जिन सभ्य समाज है, उतनी वेश्याएं है। कभी आपने सोचा कि वेश्याएं कैसे पैदा हो गयी? किसी आदिवासी गांव में जाकर वेश्या खोज सकते हे आप। आज भी बस्तर के गांव में वेश्या खोजनी मुश्किल है।

और कोई कल्पना में भी मानने को राज़ी नहीं होगा कि स्त्रीयां ऐसी भी हो सकती है। जो अपनी इज्जतबेचती हो। अपना संभोग बेचती हो।

लेकिन सभ्य आदमी जितना सभ्य होता चला गया। उतनी वेश्याएं बढ़ती चली गयी—क्यों?यह फूलों को खाने की कोशिश शुरू हुई है। और आदमी की जिंदगी में कितने विकृत रूप से सेक्स ने जगह बनायी है,

इसका अगर हम हिसाब लगाने चलेंगे तो हैरान रह जायेंगे कि आदमी को क्या हुआ है? इसका जिम्मा किस पर, किन लोगों पर।इसका जिम्मा उन लोगों पर है, जिन्होंने आदमी को—सेक्स कोसमझना नहीं लड़ना सिखाया। जिन्होंने सप्रेशन सिखाया है,

जिन्होंने दमन सिखाया हे। दमनके कारण सेक्स की शक्ति जगह-जगह से फूट कर गलत रास्तों से बहनी शुरू हो गयी है। हमारा सारा समाज रूग्ण और पीड़ित हो गया है।

इस रूग्ण समाज को अगर बदलना है तो हमें यह स्वीकार कर लेना होगा कि काम का आकर्षण है।क्यों है काम का आकर्षण? ,,,

         ओशो

ओशो वैश्या के घर भिक्षु का चातुर्मासबुद्ध के जीवन में ऐसा उल्लेख है। एक भिक्षु बुद्ध कागांव से गुजरा, गांव की नगरवधू ने, वेश्या ने उस भिक्षुको आते देखा, भिक्षा मागते देखा। वह थोड़ीचकित हुई, क्योंकि वेश्याओं के मुहल्ले में भिक्षुभिक्षा मांगने आते नहीं थे।

यह भिक्षु कैसे यहां आगया? और यह भिक्षु इतना भोला और निर्दोषलगता था।इसीलिए आ भी गया था।

सोचा ही नहीं किवेश्याओं का मौहल्ला कहां है! नहीं तो साधु पहलेपूछ लेते हैं, वेश्याओं का मुहल्ला कहाँ है?

जहां नहींजाना, वहां का पहले पक्का कर लेना चाहिए। जानेवाला भी पता कर लेता है, न जाने वाला भी पताकर लेता है।

दोनों के मन वहीं अटके हैं’।वह वेश्या नीचे उतरकर आ गयी। उसने इससेज्यादासुंदर व्यक्ति कभी देखा नहीं था।

संन्यस्त से ज्यादासौंदर्य हो भी नहीं सकता। संन्यास का सौंदर्यअपरिसीम है। क्योंकि व्यक्ति अपने मेंथिर होता है।

सारी उद्विग्नता खो गयी होती है। सारे ज्वर खोगए होते हैं। एक गहन शांति और शीतलता होती है।

ध्यान की गंध होती है। अनासक्ति का रस होता है।विराग की वीणा बजती है।तो सन्यासी से ज्यादा सुंदर कोई व्यक्ति कभीहोता ही नहीं।

इसलिए तो बुद्धों के सौंदर्य को,सदियां बीत जाती हैं, भूला नहीं जा सकता। औरजितनी स्त्रियां संन्यासियों के सौंदर्य पर मोहितहोती हैं, उतनी किसी के सौंदर्य पर मोहित नहींहोतीं।

महावीर के भिक्षु थे दस हजार, भिक्षुणियांथीं तीस हजार। वही अनुपात बुद्ध का था।वहीअनुपात जीसस का भी था। जहा एक पुरुष आया,वहां तीन स्त्रिया आयीं।

इतना, तीन गुना फर्कथा। स्वभावत: स्त्रियां निष्कलुष सौंदर्य को जल्दीपरख पाती हैं, ज्यादा आंदोलित हो जाती हैं,ज्यादा भावाविष्ट हो जाती हैं।

उस वेश्या ने इस भिक्षु को कहा, इस वर्षाकाल तुममेरे घर रुक जाओ। चार महीने वर्षा के बौद्ध भिक्षुनिवास करते थे एक स्थान पर। तो उसने कहा, इसवर्षाकाल तुम मेरे घर रुक जाओ।

मैं सब तरह तुम्हारीसेवा करूंगी। उस भिक्षु ने कहा, मैं जाकर अपने गुरु कोपूछ लूं। कहा उन्होंने, कल हाजिर हो जाऊंगा। नहींकहा, तब मजबूरी है।

भिक्षु ने जाकर बुद्ध को पूछा भरी सभा में, उनके दसहजार भिक्षु मौजूद थे, उसने खड़े होकर कहा कि मैंएक गांव में गया, एक बड़ी सुंदर स्त्री ने निमंत्रणदिया है।

दूसरे भिक्षु ने खड़े होकर कहाकि क्षमाकरना, वह सुंदर स्त्री नहीं है, वेश्या है। सारे भिक्षुओंमें खबर पहुंच गयी थी। सारे भिक्षु उत्तेजित हो रहेथे।

उस भिक्षु ने कहा, मुझे कैसे पता हो कि वह वेश्याहै या नहीं है? फिर इससे मुझे प्रयोजन क्या? उसनेनिमंत्रण दिया है,

आपकी आज्ञा हो तो चारमहीने उसके घर वर्षाकाल निवास करूं। आपकी आशान हो तो बात समाप्त हो गयी।

और बुद्ध ने आज्ञा दी कि तू वर्षाकाल उसके घरबिता। आग लग गयी और भिक्षुओं में। उन्होंने कहा,यह अन्याय है।

यह भ्रष्ट हो जाएगा। फिरतो हमेंभी इसी तरह की आशा चाहिए। बुद्ध ने कहा, इसनेआशा मांगी नहीं है, मुझ पर छोड़ी है।

इसने कहा नहींहै कि चाहिए। और मैं इसे जानता हूं। चार महीने बादसोचेंगे। जाने भी दो। अगर वेश्या इसके संन्यास कोडुबा ले, तो संन्यास किसी काम का ही न था।

अगरयह वेश्या को उबार लाए, तो ही संन्यास का कोईमूल्य है। तुम्हारे संन्यास की नाव में अगर एक वेश्याभी यात्रा न कर सके, तो क्या मूल्य है!

वह भिक्षु वेश्या के घर चार महीने रहा।चार महीनेबाद आया तो वेश्या भी पीछे चली आयी। उसनेदीक्षा ली, वह संन्यस्त हुई।

बुद्ध ने पूछा, तुझे किसबात ने प्रभावित किया? उस वेश्या ने कहा, आपकेभिक्षु के सतत अप्रभावित रहने ने। आपका भिक्षुकिसी चीज से प्रभावित होता ही नहीं

मालूमपड़ता। जो मैंने कहा, उसने स्वीकार किया। संगीतसुनने को कहा, तो सुनने को राजी। नृत्य देखने कोकहा, तो नृत्य देखने को राजी। जैसे कोई चीज उसेछूती नहीं।भीतर घाव न हो तो कोई चीज छूती नहीं।

एस धम्मो सनंतनो ( भाग 5 )