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Sunday, 13 March 2016

dr.ambedakar

ખુશી ને સમજવા માટે દુઃખ નું હોવું જરૂરી છે,

ખુશી ને સમજવા માટે દુઃખ નું હોવું જરૂરી છે,
મૌન ને સમજવા માટે શોર નું હોવું જરૂરી છે,
સારપ ને સમજવા માટે ખરાબ નું હોવું જરૂરી છે,
પ્રેમ ને સમજવા માટે નફરત નુ હોવું જરૂરી છે,
અને જિંદગી ની અહેમિયત ને સમજવા માટે મૌત નું હોવું જરૂરી છે

મીંચેલી આંખે મળ્યો જ્યારે જાગરણનો અર્થ, ત્યારે ખબર પડી કે છે શું આવરણનો અર્થ.

મીંચેલી આંખે મળ્યો જ્યારે જાગરણનો અર્થ,
ત્યારે ખબર પડી કે છે શું આવરણનો અર્થ.

સંકોચ શું છે એની ખરી ત્યારે જાણ થઇ,
મૃગજળને જઇને પૂછ્યો મેં વહેતાં ઝરણનો અર્થ.

આબોહવા તો હોય છે – આબોહવાનું શું?
વાતાવરણ જો હોય તો વાતાવરણનો અર્થ ?!

છેવટનો અંત આવી ગયો સૌ પ્રયાસનો,
મારી નજીક એ જ છે મંગળાચરણનો અર્થ ?

નિષ્ઠુર છું – હું ચાહું તો તો હમણાં હસી શકું,
પણ એમાં દિલ ન લાગે તો શું આચરણનો અર્થ?

છૂટા પડી ગયા તો સમજદાર થઇ ગયા,
સમજી ગયા કે શું હતો એકીકરણનો અર્થ.

સ્વપ્નાની વાત કોઇને કહેતા નથી હવે,
સમજી ગયા છે ‘સૈફ’ હવે અવતરણનો અર્થ.

ગુસ્સે થયા જો લોક તો પત્થર સુધી ગયા, પણ દોસ્તો ના હાથ તો ખંજર સુધી ગયા.

ગુસ્સે થયા જો લોક તો પત્થર સુધી ગયા,
પણ દોસ્તો ના હાથ તો ખંજર સુધી ગયા.

જુલ્ફોય કમ નહોતી જરા એ મહેક માં,
મુરખા હતા હકીમ કે અત્તર સુધી ગયા.

એમ જ કદાપિ કોઇને લોકો ભજે નહિ,
ખપતું’તુ સ્વર્ગ એટલે ઇશ્વર સુધી ગયા.

‘ઘાયલ’ ની ભાવભીની અમારે તો દોસ્તી,
આ એટલે તો દુઃશ્મનોના ઘર સુધી ગયા.

OSHO !! निःशब्द मौन !!एक फकीर एक रास्ते से गुजरता था।सर्द रात थी और उसके हाथ—

!! निःशब्द मौन !!एक फकीर एक रास्ते से गुजरता था।सर्द रात थी और उसके हाथ—पैर ठंडे हो गए।उसके पास वस्त्र न थे।वह एक वृक्ष के नीचे रुका।सुबह जब उसकी नींद खुली,तब हाथ—पैर हिलाना भी मुश्किल था।उसने किसी किताब में पढ़ा था किजब हाथ—पैर ठंडे हो जाते हैंतो आदमी मर जाता है।किताबें पढ़ कर जो लोग चलते हैंवे ऐसी ही भूल में पड़ जाते हैं।उसने सोचा कि शायद मैं मर गया हूं।उसे पता था कि मरे हुए लोग कैसे हो जाते हैं।तो वह आंख बंद करके लेट रहा।कुछ लोग रास्ते से गुजरते थे,उन्होंने उस आदमी को मरा हुआसमझ कर उसकी अरथी बनाईऔर उसे वे मरघट की तरफ ले चले।वे एक चौरस्ते पर पहुंचे जहां चार रास्ते फूटते थेऔर वे चिंता में पड़ गए किमरघट को कौन सा रास्ता जाता है?वे अजनबी लोग थे,उस गांव के रास्तों से परिचित न थे।वे चारों विचार करने लगे किकोई मिल जाए गांव का रहने वाला तोहम पूछ लें कि मरघट को रास्ता कौन सा जाता है?फकीर तो जिंदा था।उसने सोचा कि बेचारे बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं।अब पता नहीं गांव वाला कोई आएगा कि नहीं आएगा।तो वह अरथी से बोला कि जब मैं जिंदा हुआ करता था,तब लोग बाएं रास्ते से मरघट जाते थे।हालांकि मैं मर गया हूं और अब बताने में असमर्थ हूंलेकिन इतनी बात तो कह ही सकता हूं।उन चारों ने घबड़ा कर अरथी छोड़ दी!वह फकीर नीचे गिर पड़ा!उन्होंने कहा, तुम कैसे पागल हो?तुम बोलते हो?कहीं मरे हुए आदमी बोलते हैं?उस फकीर ने कहा,मैंने ऐसे जिंदा आदमी देखे हैंजो नहीं बोलते हैं,तो इससे उलटा भी हो सकता है किकुछ मुर्दे ऐसे हों जो बोलते हों।अगर कोई जिंदा आदमी चाहे तो नहीं बोले,तो कोई मुर्दा आदमी चाहे तो बोल नहीं सकता है?इसमें इतनी आश्चर्य की क्या बात है?वह फकीर कहने लगा।मैंने जब यह कहानी सुनी तोमेरे मन में एक खयाल आयाऔर वह यह कि असलियत और भी उलटी है।यह तो हो भी सकता है कि मुर्दा आदमी बोलता हुआ मिल जाए;यह जरा मुश्किल ही है कि जिंदा आदमी और चुप हो जाए।जिंदा आदमी न बोले, यह जरा मुश्किल ही है।यही ज्यादा आसान मालूम पड़ता है किमरा हुआ आदमी बोल जाए।हम सब जिंदा हैं,लेकिन हमने जिंदगी में एक भी क्षण न जाना होगाजब किसी न किसी रूप में हम नहीं बोल रहे हैं—या बाहर, या भीतर।हमने न बोलने का, साइलेंस का,मौन का एक भी क्षण नहीं जाना है।हमने बहुत जन्म देखे होंगे,लेकिन वे सब जन्म शब्दों के जन्म हैं।और हमने इस जिंदगी में भी बहुत दिन व्यतीत किए हैं,लेकिन वे सब शब्द की यात्रा के दिन हैं।जब हम बोलते हैं; नहीं बोलते तो सोचते हैं;नहीं सोचते तो सपना देखते हैं—लेकिन शब्द, बोलनाकिसी न किसी तल पर जारी रहता है।और जिस आदमी के शब्द अभी जारी हैं,वह परमात्मा को नहीं पहचान पाएगा;क्योंकि उसकी पहचाननिःशब्द में, मौन में, साइलेंस में ही संभव है।
-जीवन-रहस्य-प्रवचन-02

OSHO गुरु का एक ही अर्थ है: जो तुम्हारी नींद तोड़ दे।

गुरु का एक ही अर्थ है: जो तुम्हारी नींद तोड़ दे। इसलिए तुम गुरु से बचोगे, भागोगे क्योंकि नींद बड़ी सुखद है। और नींद का टूटना हमेशा दुखद है। जो भी तुम्हारी नींद तोड़ेगा, उस पर तुम नाराज होओगे क्योंकि वह तुम्हें बेचैनी में डाल रहा है। तुम नींद से व्यवस्थित हो गये हो। सब ठीक चल रहा था, सपना भी अच्छा था, सब ठीक था। कोई आ गया, उसने नींद झकझोर दी। अब सब अस्त-व्यस्त होगा। अब पुराना सब जायेगा और नया फिर से संयोजन करना होगा। इसलिए गुरु शुरू में तो कष्टदायी मालूम पड़ता है, दुखदायी मालूम पड़ता है।इसलिए जो गुरु तुम्हें शुरू से सांत्वना देता हो, समझना कि वह नींद की दवा होगा; गुरु नहीं है। जो तुम्हें पुचकारता, थपकारता हो और कहता हो सब ठीक है, उससे बचना। वह गुरु नहीं है। जब तुम सो रहे होओगे, वह तुम्हारी जेब काट लेगा; और कुछ इससे ज्यादा होने वाला नहीं है।जब भी तुम गुरु के पास जाओगे तो वह कहेगा, कुछ भी ठीक नहीं है, तुम बिलकुल गलत हो। तुम पागल हो। तुम नींद में हो। तुम अस्वस्थ हो। वह तुम्हारे अहंकार को कोई तृप्ति न देगा।
वह सब तरफ से तुम्हें तोड़ेगा, मिटायेगा, जलायेगा।
गुरु तो मृत्यु जैसा है।
और मृत्यु से ही गुजरकर अमृत उपलब्ध होता है।
    ओशो
   बिन बाती बिन तेल–
  (झेन कथा)प्रवचन–7

ओशो ध्यान योग "दृष्टा साक्षी नहीं है।" द्रष्टा और दृश्य साक्षी के दो पहलू हैं।

"दृष्टा साक्षी नहीं है।"
द्रष्टा और दृश्य साक्षी के दो पहलू हैं।
जब वे एक-दूसरे में तिरोहित हो जाते हैं जब वे एक-दूसरे में लीन हो जाते हैं, जब वे एक हो जाते हैं, तो पहली बार साक्षी का उसकी समग्रता में प्रादुर्भाव होता है।
परंतु एक प्रश्न कई लोगों को उठता है।
इसका कारण है कि वे साक्षी को ही द्रष्टा समझते हैं।
उनके मन में द्रष्टा और साक्षी पर्याय हैं।
यह भ्रांतिपूर्ण है, द्रष्टा साक्षी नहींहै, बल्कि उसका केवल एक अंश है। और जब भीअंश स्वयं को पूर्ण मानता है, गलती शुरूहो जाती है।द्रष्टा का अर्थ है चेतनागत, और दृष्य का अर्थ है पदार्थगत, विषयगत।
द्रष्टा का अर्थ है :जो दृश्य के बाहर हो, और द्रष्टा का अर्थ है जो भीतर है।
भीतर और बाहर को विभाजित नहीं किया जा सकता, वे युगपत हैं, और युगपत ही हो सकते हैं।
जब इस युगपत्य का, या कहा जाये अद्वैत का अनुभव हो जाता है तो साक्षी का प्रादुर्भाव होता है।
साक्षी को तुम साध नहीं सकते। यदि तुम साक्षी को साधो, तो बस द्रष्टा को ही साध पाओगे, और द्रष्टा साक्षी नहीं है।फिर क्या करना है? पिघलना है, विलीन होना है।
जब एक गुलाब के फूल को देखो, तोबिल्कुल भूल जाओ कि एक विषय है जो देखा गया और एक चेतना है जो देखनेवाली है।
उस क्षण के सौंदर्य को, उस क्षण की धन्यता को तुम दोनों को अभिभूत कर लेनेदो, ताकि तुम और गुलाब भिन्न न रहो, बल्कि एक लय, एक गीत, एक मस्ती बन जाओ।प्रेम करते हुए, संगीत सुनते हुए, सूर्यास्त को देखते हुए, इसे बार- बार होने दो।
यह जितना हो उतना ही अच्छा, क्योंकि यह कोई कला नहीं बल्कि एक कौशलहै, एक गुर है।
तुम्हें इसका सूत्र - संकेत ग्रहण कर लेना है, एक बार तुम इसे पा लो तो इसे कहीं भी, कभी भी शुरू कर सकते हो।
जब साक्षी का प्रादुर्भाव होता है, तो नतो कोई देखने वाला बचता है, न देखा जाने वाला।
साक्षी एक निर्मल दर्पण है, जो कुछ भी प्रतिबिंबित नहीं करता।
यह कहना भी उचित नहीं है कि वह एक दर्पण है,यह कहना बेहतर होगा कि वह एक दर्पणत्व है।
वह तो पिघलने और विलीन होने की एक गत्यात्मक प्रक्रिया है, वह कोई जड़ घटना नहीं, एक प्रवाह है! तुम गुलाब तक पहुंच रहे हो, गुलाब तुममें पहुंच रहा है :यह अंतरात्मा का एक आदान-प्रदान है।
यह धारणा भूल जाओ कि साक्षी द्रष्टा है,वह द्रष्टा नहीं है।
द्रष्टा को साधा जा सकता है, साक्षी सहज घटना है। द्रष्टा तो एक प्रकार की एकाग्रता है, द्रष्टा तुम्हें अलग रखे रहता है।
द्रष्टा तो तुम्हारे अहंकार में अभिवृद्धि करेगा, उसे सशक्त करेगा।
जितने तुम द्रष्टा होते चले जाओगे उतना तुम्हें लगेगा जैसे एक द्वीप हो गए —विभाजित, एकाकी, सुदूर।युगों से, संसार भर के साधक द्रष्टा को साधते रहे हैं। वे भले ही इसे साक्षी कहते रहे हों, पर यह साक्षी नहीं है। साक्षी तो बिलकुल भिन्न है, गुणात्मक रूप से भिन्न है। द्रष्टा को साधा जा सकता है, प्रयासपूर्वक विकसित किया जा सकता है, उसे साधकर तुम बेहतर द्रष्टा बन सकते हो।वैज्ञानिक अवलोकन करता है, संत साक्षी रहता है। विज्ञान की पूरी प्रक्रिया ही अवलोकन की है : इतने तत्पर, सूक्ष्म और तीक्ष्ण ढंग से देखना होता है कि कुछ भी चूक न जाए। लेकिन वैज्ञानिक परमात्मा को नहीं जान पाता। यद्यपि उसका अवलोकन बहुत ही कुशल होता है, फिर भी वह परमात्मा से अनभिज्ञ रहता है। उसका कभी परमात्मा से मिलना नहीं होता, बल्कि वह परमात्मा के होने से इनकार करता है, क्योंकि जितना वह अवलोकन करता है —और यह पूरी प्रक्रिया अवलोकन की ही है —उतना ही वह अस्तित्व से अलग हो जाता है। सेतु टूट जाते हैं और दीवारेंखड़ी हो जाती है, वह अपने ही अहंकार में कैद हो जाता है।संत साक्षी रहता है। लेकिन स्मरण रखना, साक्षित्व एक घटना है, एक उप - उत्पत्तिहै —क्षण में, परिस्थिति में, अनुभव में समग्र होने का परिणाम है। समग्रता ही कुंजी है : समग्रता से ही साक्षी की धन्यता का जन्म होता है।अवलोकन के विषय में सब भूल जाओ, उससे तुम्हें अवलोकित विषय के संबंध में तो अधिक परिमार्जित सूचना मिल जाएगी, लेकिन तुम अपनी ही चेतना से बिलकुल अनभिज्ञ रह जाओगे।-           
        ओशो
       ध्यान योग