अगरबत्ती जलाना — परमात्मा को पाना या अपने वंश का नाश करना?
बांस का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। बांस एक बहु- उपयोगी लकड़ी है, घर, दुकान के छप्पर से लेकर खेत - खलिहान तक, हर जगह बांस बहुत उपयोगी साबित हुआ है। इसका महत्व तब और बढ जाता है जब कृष्ण इसकी बांसुरी बनाकर मधुर तान छेड़ते हैं और सारा जगत झूमने लगता है।
हमारे धर्म में बांस जलाने की मनाही है। बांस जलाने की लकड़ी के रूप में बिलकुल ही अनुपयोगी है। पुराने लोग कहते आये हैं कि 'बांस को जलाने से वंश जलता है।' अब बांस को जलाने से वंश के जलने का क्या संबंध? हमारे शास्त्रों ने या हमारे महापुरुषों ने जो भी महत्वपूर्ण बातें कही हैं, उसके पीछे अवश्य ही कोई न कोई वैज्ञानिक तथ्य छुपा होता है।
अब यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि बांस जलाने पर जो धुंआ होता है, वह धुंआ फेफड़ों से होकर जब खून में मिलता है, तो वह ऐसे तत्व छोड़ता है जो हमारी प्रजनन क्षमता को कम करता है। यानी आदमी को नपुंसकता की ओर धकेलता है, अर्थात नामर्दी की ओर धकेलता है।
फेफड़ों में धुंए के कण जमा होने के कारण शरीर को आक्सीजन बहुत कम मिलती है, जिससे शरीर कामवासना को पूरी तरह से जी नहीं पाता। भले शरीर कितना ही पुष्ट क्यों न हो, लेकिन फेफड़े कार्बन से मुक्त होंगे तभी वह कामवासना में गहरे जा सकेगा। क्योंकि कामवासना में बहुत ज्यादा आक्सीजन की जरूरत होती है, जो फेफड़ों में जमा धुंए के कारण कम पहुंच पाती है। कामवासना को पूरी तरह से न जी पाने के कारण ही हमारा चित्त उससे मुक्त नहीं हो पाता।
बांस का धुंआ हमारी प्रजनन क्षमता को प्रभावित करता है। इसीलिए पुराने लोगों ने कहा कि बांस को जलाने से वंश जलता है।
तो अगरबत्ती क्यों नहीं जलानी चाहिए? क्योकि अगरबत्ती में जो तीली (लकड़ी) होती है, वह बांस की बनी हुई होती है। यदि हम अगरबत्ती जलाते हैं तो 'बांस' को भी जलाते हैं। और बांस को जलाना अर्थात अपना वंश जलाना!
-स्वामी ध्यान उत्सव
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