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Monday, 21 March 2016

अंत में तुम हंसोगे—कि विधियां ध्यान नहीं है।किसी सद्गुरु के साथ, वैज्ञानिक विधियों से तुम बहुत सा समय, अवसर और उर्जा बचा ले सकते हो। और कई बार तो कुछ ही क्षणों में तुम्हारा इतना विकास हो

अंत में तुम हंसोगे—कि विधियां ध्यान नहीं है।किसी सद्गुरु के साथ, वैज्ञानिक विधियों से तुम बहुत सा समय, अवसर और उर्जा बचा ले सकते हो। और कई बार तो कुछ ही क्षणों में तुम्हारा इतना विकास हो जाता है कि जन्मों - जन्मों तक भी इतना विकास संभव नहीं हो पाता।

यदि सम्यक विधि का प्रयोग किया जाए तो विकास का विस्फोट हो जाता है —फिर इन विधियों का उपयोग हजारों वर्षों के प्रयोगों में हुआ है। किसी एक व्यक्ति ने इनकी रचना नहीं की थी, कई- कई साधकों ने इन्हें रचा था, और यहां केवल सार ही दिया जा रहा है।

लक्ष्य तक तुम पहुंच जाओगे, क्योंकि तुम्हारे भीतर की जीवन उर्जा तब तक आगेबढती रहेगी जब तक वह ऐसे बिंदु तक न पहुंच जाए जहां से और आगे बढ़ना संभव नहीं होगा, वह उच्चतम शिखर की ओर बढती चली जाएगी। यही कारण है कि व्यक्ति बार-बार जन्म लेता रहता है।

तुम पर छोड़ दिया जाए तो तुम पहुंच तो जाओगे लेकिन तुम्हें बहुत लंबी यात्रा करनी पड़ेगी, और यात्रा बहुत दुस्साध्य और उबाने वाली होगी।सभी विधियां सहयोगी हो सकती हैं लेकिन वे वास्तव में ध्यान नहीं हैं, वे तो अंधकार में टटोलने के समान हैं।

किसी दिन अचानक, कुछ करते हुए, तुम साक्षी हो जाओगे। सक्रिय, या कुंडलिनी, या दरवेश जैसा कोई ध्यान करते हुए एक दिन अचानक ध्यान तो चलता रहेगा लेकिन तुम उससे जुड़े नहीं रह पाओगे। तुम पीछे मौन बैठरहोगे, उसके द्रष्टा होकर —उस दिन ध्यान घटा, उस दिन विधि न बाधा रही, न सहायक रही।

तुम चाहो, तो एक व्यायाम की भांति उसका आनंद ले सकते हो, उससे तुम्हें एक शक्ति मिलती है, लेकिन अब उसकी कोई आवश्यकता न रही —वास्तविक ध्यान तो घट गया।ध्यान है साक्षित्व। ध्यान करने का अर्थ है साक्षी हो जाना। ध्यान बिलकुल भी कोई विधि नहीं है! यह तुम्हे बड़ा विरोधाभासी लगेगा क्योंकि मैं तो तुम्हें विधियां दिये ही चला जाता हूँ।

परम अर्थों में ध्यान कोई विधि नहीं है, ध्यान एक समझ है, एक होश है। लेकिन तुम्हें विधियों की जरूरत है क्योंकि वह जो परम समझ है तुमसे बहुत दूर है। तुम्हारे भीतर ही गहरे में है, लेकिन फिर भी तुमसे बहुत दूर है। इसी क्षण तुम उसे उपलब्ध हो सकते हो, लेकिन होओगे नहीं, क्योंकि तुम्हारा मन चलता चला जाता है। इसी क्षण यह संभव होते हुए भी यह असंभव है।

विधियां इस अंतरालको भर देंगी, वे अंतराल को भरने के लिए ही हैं।तो प्रारंभ में विधियां ही ध्यान होती है, अंत में तुम हंसोगे —कि विधियां ध्यान नहीं हैं। ध्यान तो अंतस सत्ता की एक अलग ही गुणवत्ता है, उसका किसी चीज से कुछ लेना - देना नहीं है। लेकिन यह अंत में ही होगा, ऐसा मत सोचना कि प्रारंभ में ही यह हो गया, वरना अंतराल कभी भी भर नहीं पाएगा।

-ओशोध्यान योग

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