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Wednesday, 16 March 2016

◆ जाकी रही भावना जैसी, हरि मूरत देखी तिन तैसी ◆ महावीर के लिए कहा जाता है - बड़ी झूठी बात लगेगी -कि वे जब रास्तों पर चलते थे, तो कांटे अगर सीधे पड़े हों, तो वे उलटे हो जाते थे। किसी कांटे को क्या प्रयोजन कि महावीर चलते हैं या कौन चलता है? और कांटे कैसे सीधे पड़े हों तोउलटे हो जाएंगे?

◆ जाकी रही भावना जैसी, हरि मूरत देखी तिन तैसी ◆

महावीर के लिए कहा जाता है - बड़ी झूठी बात लगेगी -कि वे जब रास्तों पर चलते थे, तो कांटे अगर सीधे पड़े हों, तो वे उलटे हो जाते थे।

किसी कांटे को क्या प्रयोजन कि महावीर चलते हैं या कौन चलता है? और कांटे कैसे सीधे पड़े हों तोउलटे हो जाएंगे?

और मैंने सुना है कि मोहम्मद के बाबत कहा जाता है कि जब वे अरब के गर्म रेगिस्तानों में चलते थे, तो एक बदली उनके ऊपर छाया किए रहती थी।

बदलियों को क्या प्रयोजन कि नीचे कौन चलता है?लेकिन मैं आपसे कहूं, ये बातें सच हैं। कोई कांटे उलटकर उलटे नहीं होते और कोईबदलियां नहीं चलतीं,

लेकिन इनमें हमने कुछ सचाइयां जाहिर की हैं। हमने यह कहना चाहा है कि जिस आदमी के हृदय में कोई कांटा नहीं रह गया,

इस जगत में उसके लिए कोई कांटा सीधा नहीं है। और हमने यह कहा है कि जिस आदमी के हृदय में उत्ताप नहीं रह गया, इस जगत में उसके लिए हर जगह एक छायादार बदली है और उसे कहीं कोई धूप नहीं है।

हमारे चित्त की स्थिति हम जैसी बनाए रखेंगे, यह दुनिया भी ठीक वैसी बन जाती है। न मालूम कौन - सा चमत्कार है कि जो आदमी भला होना शुरू होता है,

यह सारी दुनिया उसे एक भली दुनिया में परिवर्तित हो जाती है। और जो आदमी प्रेम से भरता है, इस सारी दुनिया का प्रेम उसकी तरफ प्रवाहित होने लगता है।

और यह नियम इतना शाश्वत है कि जो आदमी घृणा से भरेगा, प्रतिकार में घृणा उसे उपलब्ध होने लगेगी।

हम जो अपने चारों तरफ फेंकते हैं, वही हमें उपलब्ध हो जाता है। इसके सिवाय कोई रास्ता भी नहीं है।~

      ओशो

~(ध्यान सूत्र, प्रवचन #3)

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